तालिबान के प्रति बदलता रुख
article

तालिबान के प्रति बदलता रुख

जनसत्ता

 रणनीति की दृष्टि से जो नीति उपयुक्त हो,वहीं नीति सर्वोत्तम होगी। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में यथार्थवाद का सिद्धांत सबसे प्रभावकारी माना जाता है तथा तालिबान की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता में ताकतवर देशों का यथार्थवादी दृष्टिकोण साफ दिखाई दे रहा है।

हाल ही में तालिबान के महत्वपूर्ण नेता और आतंकी सिराजुद्दीन हक़्क़ानी ने अपने शिष्टमंडल के साथ संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा कर वहां के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ैद अल नह्यान से मुलाकात की है। इस दौरान संयुक्त अरब अमीरात ने अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोग करने का भरोसा दिया है। सिराजुद्दीन हक़्क़ानी को अमेरिका आतंकी मानता है और  उनके बारे में किसी भी तरह की जानकारी उपलब्ध कराने पर  दस मिलियन डॉलर तक का इनाम घोषित कर रखा है। संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका का अरब दुनिया में महत्वपूर्ण आर्थिक और सामरिक साझेदार है। हक्कानी की यात्रा गुपचुप भी  नहीं हुई है। अत: इसका संदेश साफ है की अब अमेरिका भी तालिबान की साथ सहयोग बढ़ाने पर विचार कर रहा है। अमेरिका के तालिबान के प्रति बदलते रुख में भारत की भूमिका भी हो सकती है क्योंकि अमेरिका और भारत एशिया प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोगी है। अफगानिस्तान पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी व मध्य एशिया को जोड़ने वाला एक अहम देश है। अफ़ग़ानिस्तान के साथ चीन के आर्थिक और सुरक्षा संबंधी हित जुड़े हुए हैं। अमेरिका  के तालिबान  सरकार के प्रति कठोर रवैया चीन को लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे में चीन के अफगानिस्तान में बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका,यूरोप,यूएई और भारत अब तालिबान के साथ सहयोग बढ़ाने को मजबूर हो गये है।
अमेरिका और यूरोप लोकतंत्र,समानता,स्वतंत्रता और मानवाधिकार के प्रति सजग रहे है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार इस पैमाने पर बिल्कुल खरी नहीं उतरती लेकिन इस दक्षिण एशियाई देश की राजनीतिक परिस्थितियों में  लोकतंत्र की उम्मीदें भी दूर दूर तक नजर नहीं आती। अमेरिका द्वारा 2021 में अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाने के बाद से यह देश तालिबान की गिरफ्त में है और चीन इसका भरपूर फायदा उठा रहा है। अफ़ग़ानिस्तान की पहाड़ियों और घाटियों में तांबा,बॉक्साइट,लौह अयस्क,सोना और मार्बल जैसे कई क़ीमती खनिज पदार्थ मौजूद हैं। अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद खनिज पदार्थों का मूल्य ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है। चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना में अफ़ग़ानिस्तान की अहम भूमिका है और इसी से मद्देनज़र दोनों देशों के बीच साल 2016 में एक अहम समझौता हुआ था।  यहां के खनिज संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिए चीनी कंपनियां पूरी तैयारी कर रही हैं।  इन खनिजों में अत्याधुनिक तकनीक के लिए ज़रूरी माइक्रोचिप में लगने वाले महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं।  चीनी कंपनियां इस इलाक़े में मौजूद संसाधनों का फायदा लेने के लिए तैयार है और सरकार भी  यहां खनन में निवेश करना चाहती है।  चीनी सामानों के लिये मध्य पूर्व के बाज़ारों में तेज़ी से और सुविधाजनक पहुँच के लिये अफगानिस्तान एक महत्वपूर्ण मार्ग हो सकता है।
अफगानिस्तान में चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए संकट बढ़ा रहा है।   यह भारत के आर्थिक और सामरिक हितों के खिलाफ भी है। इसका असर कई बहुउद्देशीय विकास परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है।   तापी गैस परियोजना तुर्कमेनिस्तान,अफगानिस्तान,पाकिस्तान तथा भारत के मध्य प्रस्तावित है। एशियाई विकास बैंक के द्वारा प्रदान की गई आर्थिक सहायता के माध्यम से इसका निर्माण किया जा रहा है। इसे इस प्रकार डिजाईन किया गया है कि प्रतिवर्ष  तीन दशमलव दो अरब घन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस की आपूर्ति चारों देशों में की जा सके। इसका  विस्तार तुर्कमेनिस्तान के गलकीनाइश तेल क्षेत्र से प्रारंभ होकर अफगानिस्तान के हेरात व कंधार तथा पाकिस्तान के क्वेटा व मुल्तान से होकर फाजिल्का तक होगा। चीन इस परियोजना को बाधित कर रूस और ईरान के सहयोग से प्राकृतिक गैस को दक्षिण एशिया तक पहुँचाना चाहता है।  चीन,ईरान और रूस की यह साझेदारी इस समूचे क्षेत्र में अमेरिकी हितों को प्रभावित कर सकती है।   अमेरिका तापी पाइपलाइन के माध्यम से मध्य एशियाई ऊर्जा को अपने प्रतिद्वंद्वियों से दूर दक्षिण एशिया की ओर निर्देशित करना चाहता है। मध्य और दक्षिण एशिया के बीच स्थित होने के कारण,अफ़गानिस्तान एक ऊर्जा पुल है और इस प्रकार अमेरिका के रणनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिका मध्य एशिया में एक सैन्य उपस्थिति भी स्थापित करना चाहता है। यह उसे रूस,चीन  और ईरान जैसे  प्रतिद्वंदियों पर निर्णायक सैन्य बढ़त दे सकती है। वहीं चीन अफगानिस्तान से आशंकित भी रहता है और वह मजबूत सहयोग से तालिबान को नियंत्रित करना चाहता है। चीन के शिन्जियांग की सीमा अफ़गानिस्तान से मिलती है और यहां क़रीब दस लाख वीगर मुसलमान रहते हैं। चीन को डर है कि वीगर मुसलमान और ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के सदस्य अफ़गानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल उसके ख़िलाफ़ गतिविधियों को अंजाम देने के लिए कर सकते हैं। शिंजियांग की सीमा दक्षिण में तिब्बत और भारत,पूर्व में मंगोलिया,उत्तर में रूस और पश्चिम में कजाकिस्तान,किरगिज़स्तान,ताजिकिस्तान,अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से मिलती हैं। चीन का सबसे बड़ा संकट शिंजियांग की पश्चिम की वह सीमा है जो मुस्लिम देशों से मिलती है और यही कारण है कि चीन अफगानिस्तान में मिलिट्री बेस भी बनाना चाहता है। इसके लिए दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू हो चुकी है। चीन ये आर्मी कैंप दूर-दराज के पहाड़ी इलाके वाखान कॉरीडोर के पास बनाना चाहता है। यहां पर चीन की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। चीन इस इलाके को प्रभाव में लेकर ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के प्रभाव को खत्म करना चाहता है। चीन का विश्वास है कि उइगर आतंकी इसी कॉरीडोर से उसके शिंजियांग प्रांत में घुसते हैं। उज्बेक, तुर्कमान और परशियन भाषा बोलने वाले अफगान चीन के वीगर मुसलमानों से आसानी से जुड़ जाते है। अफगानिस्तान में आईएसआईएस के उभार से चीन के अशांत शिंजियांग में आंतरिक अशांति और ज्यादा बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। इन सबसे निपटने के लिए चीन तालिबान से मजबूत रिश्तें बना रहा है।  पिछले वर्ष कई चीनी कंपनियों ने तालिबान सरकार के साथ कई मिलियन डॉलर के व्यापारिक सौदे किए है। इस सबके साथ बीजिंग ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए तालिबान को आधिकारिक रूप से अफगानिस्तान के दूत के रूप में भी मान्यता दे दी है। चीन की सहायता कूटनीति के चलते तालिबान पर वैश्विक प्रतिबंधों का असर प्रभावकारी नहीं हो रहा है और इस कारण तालिबान ने शासन में सुधार के कोई सकारात्मक कदम भी नहीं उठाएं है।

अगस्त 2021 में अफगानिस्तान पर नियंत्रण करने के बाद से तालिबान ने महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों पर लगातार और व्यापक हमला किया है,तथा इन अधिकारों के लगभग हर पहलू का उल्लंघन किया है। अफ़गान  महिलाएं तालिबान के कड़े नियमों को झेलने को मजबूर है और नारकीय जीवन जी रही है।  तालिबान शासन के तहत,अफ़गानिस्तान की महिलाओं को अपने देश के राजनीतिक,आर्थिक या सामाजिक जीवन में शामिल होने के अवसर से वंचित कर दिया गया है। उन्हें समान न्याय,शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकारी से भी वंचित कर दिया गया है। अफगानिस्तान में आधी आबादी को विकास से दूर रखने के कारण अफगानिस्तान में गरीबी और बदहाली से आम जनता पस्त है।  यह देश भुखमरी की कगार पर पहुंच गया है।  अमेरिका के सहयोगी संयुक्त अरब अमीरात  का मानना है की अगर आधी आबादी को भागीदारी से बाहर रखा गया तो अफ़गानिस्तान की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना संभव नहीं होगा। इसलिए,अफगानिस्तान में  महिलाओं की पूर्ण भागीदारी पर जोर देना चाहिए। लेकिन तालिबान वैश्विक आलोचनाओं से बेपरवाह होकर चीन जैसे देश से आर्थिक और रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। अफगानिस्तान की संसद की पूर्व उपाध्यक्ष फ़ॉज़िया कूफ़ी कहती हाउ  कहती है कि अफ़गानिस्तान के लोग निराश,भयभीत और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं क्योंकि दुनिया अभी भी अफ़गानिस्तान में तालिबान के शासन में मौजूदा लैंगिक भेदभाव के बारे में मुखर नहीं है।

इन सबके बीच अफगानिस्तान के भू रणनीतिक महत्व को देखते हुए अमेरिका,भारत और यूरोप के लोकतांत्रिक देश यह बखूबी समझ गए है की अब अफ़ग़ानिस्तान में प्रतिरोध की कोई मज़बूत आवाज़ दिखाई नहीं देती तथा इस देश में ऐसी ताक़त नहीं दिखती कि वो तालिबान से लड़ाई लड़े। तालिबान से सहयोग बढ़ाकर ही अफगानिस्तान में अपने हित सुरक्षित रखे जा सकते है तथा तालिबान की शासन व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जगाई जा सकती है।  2021 में तालिबान के फिर से सत्ता में आने के बाद कई देशों समेत भारत ने अफगानिस्तान से सारे  कूटनीतिक संबंध तोड़ दिए थे।  भारत भी तालिबान के प्रति अपने रुख में नर्मी के संकेत दे चूका है।  इस वर्ष 26 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय दूतावास ने गणतंत्र दिवस समारोह में अफगान के कार्यवाहक दूत बदरुद्दीन हक्कानी को आमंत्रित भी किया था। रूस, ईरान, तुर्की और भारत सहित कई अन्य देशों ने न केवल मानवीय परियोजनाओं पर बल्कि काबुल में अपने राजनयिक मिशनों को फिर से खोलकर भी तालिबान के साथ जुड़ने का प्रयास किया है।
इस समय तालिबान अफगानिस्तान में निरंकुशता से शासन व्यवस्था का संचालन कर रहा है। तालिबान का विरोध करने वाले देश में बूरी तरह कुचल दिए गए है। सामाजिक और राजनीतिक विरोध नहीं होने से देश    गंभीर मानवीय और मानवाधिकार संकट का सामना कर रहा है। व्यापारिक,शिक्षा और संविधानिक संस्थानों के बंद होने से न केवल देश में अव्यवस्था बढ़ी है बल्कि लाखों लोगों की ज़िंदगी और आजीविका पर भी संकट गहराया हुआ है। संयुक्तराष्ट्र इस देश में मदद तो कर रहा है लेकिन वह भी तालिबान शासन के संगीनों के साये में हो रही है।  तालिबान नागरिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है,असहमति पर अंकुश है और किसी भी प्रकार की राजनीतिक भागीदारी को स्वीकार नहीं करना चाहता।  संयुक्त राष्ट्र के प्राथमिक लक्ष्य वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखना,दुनिया के लोगों की भलाई को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय और मैत्रीपूर्ण सहयोग के माध्यम से इन लक्ष्यों को प्राप्त करना है। अफगानिस्तान की तालिबान शासन व्यवस्था इस किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रति गंभीर नहीं है लेकिन फिर भी दुनिया मजबूर  होकर तालिबान को स्वीकार कर रही है। जाहिर है दुनिया की बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों में मानवाधिकार कहीं पीछे छूट रहा है तथा आर्थिक और सामरिक प्रतिबद्धताएं महत्वपूर्ण हो गई है।

Leave feedback about this

  • Quality
  • Price
  • Service

PROS

+
Add Field

CONS

+
Add Field
Choose Image
Choose Video
X