बापू की तीन बहनें थी मूली बेन,पानकुंवर और रलियत बेन। लेकिन बापू के सामाजिक और राजनीतिक सफर में सहभागी बनी मीरा बेन,राजकुमारी अमृत कौर,आभा और मनु का स्थान किसी से कम नहीं था। ये सभी बापू की बहनें भी थी और बेटियां भी।

मीरा बेन का जन्म इंग्लैंड में हुआ था। उनका असली नाम मेडेलीन स्लेड था। मेडेलीन मुंबई के नौसेना के ईस्ट इंडीज स्क्वाड्रन में कमांडर इन चीफ के पद पर तैनात सर एडमंड स्लेड की बेटी थीं। मीरा बेन ने अपनी आत्मकथा “द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज” में उनकी और महात्मा गांधी की पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए बताया है कि उस समय महात्मा गांधी ने उनसे कहा था कि तुम मेरी बेटी बनकर रहोगी। स्वतंत्रता संग्राम में मेडेलिन ने भी अपना जीवन समर्पित कर दिया। महात्मा गांधी ने उन्हें मीरा बेन नाम दिया। मीरा बेन ने भारत को ही अपना घर बना लिया। मीरा बेन को उनके योगदान के लिए आजादी के बाद 1982 में देश की ओर से पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
राजकुमारी अमृत कौर पंजाब के कपूरथला के राजा सर हरनाम सिंह की बेटी थीं। राजकुमारी अमृत कौर की पढ़ाई इंग्लैंड में हुई थी। राजकुमारी अमृत कौर को गांधी की सबसे क़रीबी सत्याग्रहियों में गिना जाता था। नमक सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वो जेल भी गईं। बापू उन्हें प्यारी बेटी कहा करते थे। राजकुमारी अमृत कौर ने गांधीजी के व्यक्तित्व पर कहा था की हमने उनमें बापू नहीं एक बुद्धिमान पिता, और उससे अधिक एक मूल्यवान मां का रूप पाया।
आभा बंगाल से थी और उनकी शादी गांधीजी के परपोते कनु गांधी से हुई।गांधी की प्रार्थना सभाओं में आभा भजन गाती थीं और कनु फोटोग्राफी करते थे। आभा नोआखाली में गांधी के साथ रहीं। ये वो दौर था,जब पूरे मुल्क में दंगे भड़क रहे थे और गांधी हिंदू-मुस्लिम के बीच शांति स्थापित करने की कोशिश में जुटे हुए थे। नाथूराम गोडसे ने जब गांधी को गोली मारी,तब वहां आभा भी मौजूद थीं।
मनु महात्मा गांधी की दूर की रिश्तेदार थीं। गांधी मनु को अपनी पोती कहते थे। नोआखाली के दिनों में आभा के अलावा ये मनु ही थी,जो अपने बापू के बू़ढ़े शरीर को कांधा देकर चलती थी।
यह भी दिलचस्प है कि इन महिलाओं की ज़िंदगी में गांधी का गहरा असर रहा और जिस रास्ते पर महात्मा ने चलना शुरू किया था,ये महिलाएं उसी रास्ते पर चलते हुए अपनी-अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ीं। दरअसल बापू आज़ादी के आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर लगातार कोशिशें करते रहे. कस्तूरबा का इसमें अहम योगदान रहा,बाद में बापू के स्नेह का नतीजा यह हुआ की लाखों महिलाएं आज़ादी के संघर्ष में कूद पड़ी।
महिलाओं के प्रति यह बापू का सम्मान ही था की उन्होंने खादी को कातना शुरू किया था। बापू कहते है,मैं बिहार के चंपारण जिले के एक गांव में गया था। मैंने कुछ महिलाओं को बहुत गंदे कपड़े पहने देखा। इसलिए मैंने अपनी पत्नी से कहा कि वह उनसे पूछें कि उन्होंने अपने कपड़े क्यों नहीं धोए। उसने उनसे बात की। उनमें से एक महिलाएँ उसे अपनी झोंपड़ी में ले गईं और बोलीं,देखो अब यहाँ कोई बक्सा या अलमारी नहीं है जिसमें अन्य कपड़े हों। मैंने जो साड़ी पहनी है वह मेरे पास एकमात्र है। मैं इसे कैसे धोऊं? महात्माजी से कहो कि मुझे दूसरी साड़ी दिलवा दें,और फिर मैं प्रतिदिन स्नान करने और साफ कपड़े पहनने लगूंगी। बाद में बापू ने कताई का काम शुरू किया ताकि हर गरीब महिला को कपड़े मिल सकें और उन्होंने खादी के उत्पादन को एक आर्थिक गतिविधि के रूप में बढ़ावा दिया।
आधुनिक युग में बापू संभवतः ऐसे पहले राजनेता थे जिन्होंने महिला स्वातन्त्र्य की कड़ी वकालत की थी। अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में बापू ने समाज से गैर बराबरी खत्म करने पर कई बार जोर दिया। बापू ने अपने भाषणों और कार्य में हमेशा महिलाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया और देश की प्रगति में महिलाओं को अहम भूमिका निभाने के लिए सदैव प्रेरित करते रहे।23 दिसंबर, 1936 को अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में उनका संदेश था: “जब महिला, जिसे हम अबला कहते हैं, सबला बन जाएगी , तो वे सभी जो असहाय हैं, शक्तिशाली बन जाएंगी।”
#ब्रह्मदीप अलूने
(गांधी है तो भारत है,किताब के लेखक)

