आंध्र प्रदेश निवासी आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार ने हरियाणा में कई प्रमुखों स्थानों पर अपनी सेवाएं दी थी। वे अंबाला और रोहतक रेंज के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस यानी आईजीपी रह चुके थे,साथ ही उन्होंने होम गार्ड्स,टेलीकॉम, डायल-112 इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्रोजेक्ट जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व किया। पूरन कुमार ने इस वर्ष अक्टूबर में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों और हरियाणा के डीजीपी पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। पूरन कुमार ने अपने दर्द को साझा करते हुए कहा की उन्हें सेवा में कई बार अपने वरिष्ठ अधिकारियों के उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ा। पूरन कुमार ऐसे अधिकारी माने जाते थे जो सरकारी वाहनों के दुरूपयोग,अवैध धार्मिक निर्माण,पदोन्नति व रैंक मान्यता में भेदभाव जैसे मसलों को उठाते थे। यदि उन्होंने आत्महत्या नहीं की होती,तो ये आवाज़ और मजबूत हो सकती थी। वे उन दलितों व अन्य कर्मचारियों के लिए प्रेरणा बन सकते थे, जो डर के चलते आवाज़ नहीं उठा पाते। अगर उन्होंने ज़िंदा रहते हुए लड़ाई जारी रखी होती,तो यह न केवल उनके लिए बल्कि करोड़ो कई लोगों के लिए एक मजबूत मिसाल बन सकती थी।
रोहित वेमुला का नाम हम सबकों पता है। वे हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पीएच.डी. स्कॉलर थे और वंचित वर्ग के लिए लिखते और बोलते थे। उनका लेखन,संगठन क्षमता और सामाजिक मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टि उन्हें विश्वविद्यालय की प्रगतिशील राजनीति का मजबूत चेहरा बनाती थी। वैज्ञानिक बनने के सपने से लेकर सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष तक,रोहित ने शिक्षा और समानता को जीवन का केंद्र बनाया था। रोहित वेमुला ने भी आत्महत्या की थी। उनकी आत्महत्या के मूल कारण संस्थागत भेदभाव,प्रशासनिक उत्पीड़न और राजनीतिक दबाव से गहराई से जुड़े थे। विश्वविद्यालय ने उन्हें और उनके साथियों को कथित शिकायतों के आधार पर निलंबित कर दिया था,हॉस्टल से बेदखल किया गया और आर्थिक सहायता भी रोक दी गई। यह कार्रवाई राजनीतिक हस्तक्षेप और वैचारिक ध्रुवीकरण का परिणाम मानी गई। लगातार अपमान,अलगाव और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला। अपने अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा कि वे मनुष्य होने की आकांक्षा से भी वंचित महसूस कर रहे थे। रोहित की मृत्यु ने भारतीय विश्वविद्यालयों में व्याप्त जातिगत और वैचारिक भेदभाव की गहरी संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा किया था।
मुथुकृष्णन,दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रतिभाशाली शोधार्थी थे। वे तमिलनाडु के एक साधारण दलित परिवार से आए थे और सामाजिक न्याय,समानता और हाशिए पर पड़े समुदायों की समस्याओं पर गहरी संवेदनशीलता रखते थे। उनकी पहचान केवल एक छात्र के रूप में नहीं, बल्कि एक विचारशील लेखक,सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय आवाज और विश्वविद्यालय परिसर में समानता के पक्षधर व्यक्तित्व के रूप में थी। उनके लेखन में सामाजिक विषमता,जातिगत दमन और अवसरों की असमानता की तीखी आलोचना साफ दिखाई देती थी। मार्च 2017 में उनकी संदिग्ध आत्महत्या ने पूरे देश में हलचल मचा दी। मुथुकृष्णन लगातार महसूस करते थे कि शिक्षा संस्थानों में जातिगत पक्षपात और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव अब भी गहराई से मौजूद है। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में फेसबुक पर पीड़ा लिखी की इस देश में समान अवसर नहीं है,वह उनके भीतर चल रही मानसिक वेदना को स्पष्ट करती है। उन्होंने बार-बार बताया कि विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति और वंचित समुदायों के छात्रों के साथ अदृश्य और सूक्ष्म भेदभाव किया जाता है, जिससे उनका आत्मसम्मान टूटता है। समाचार पत्रों में यह लिखा गया की यह सामाजिक उपेक्षा,संरचनात्मक भेदभाव और मानसिक तनाव का सम्मिलित बोझ था जिसने मुथुकृष्णन जैसी प्रतिभा को समाप्त कर दिया।
अनीता,तमिलनाडु के अरियालुर जिले के एक बेहद गरीब दलित परिवार की प्रतिभाशाली छात्रा थीं। उनका सपना डॉक्टर बनने का था,जिसे उन्होंने अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रखा था। अनीता ने बारहवीं कक्षा में विज्ञान वर्ग से शानदार अंक प्राप्त किए और तमिलनाडू मेडिकल प्रवेश प्रणाली के तहत मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने की पूरी योग्यता रखती थीं। लेकिन 2017 में नीट को अनिवार्य करने के फैसले ने उनके सपने और संघर्ष को गहरा झटका दिया। अनीता ने राज्य बोर्ड की परीक्षा से टॉप करने के बावजूद नीट के लिए पर्याप्त संसाधन न होने,कोचिंग की सुविधा न मिल पाने और परीक्षा के पैटर्न में भारी अंतर के कारण असमान शैक्षणिक प्रतियोगिता का सामना किया। इससे उनका आत्मविश्वास टूटने लगा। अनीता ने सुप्रीम कोर्ट में नीट के खिलाफ याचिका दायर की थी,उनका तर्क था कि यह परीक्षा गरीब,ग्रामीण,दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए अनुचित है। लेकिन जब निर्णय उनके पक्ष में नहीं आया तो उनके भीतर असफलता,निराशा और भविष्य के सपनों के टूटने का बोझ असहनीय हो गया। सितंबर 2017 में उनकी आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया।
डॉ.पायल तड़वी एक प्रतिभाशाली आदिवासी समुदाय से आने वाली युवा डॉक्टर थीं,जिन्होंने कठिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को पार करते हुए मेडिकल क्षेत्र में अपना स्थान बनाया था। वे मुंबई के टॉपिवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज और बीवाईएल नायर अस्पताल में स्त्रीरोग विभाग की पीजी छात्रा थीं। पायल न केवल अपने परिवार की पहली महिला डॉक्टर थीं बल्कि आदिवासी समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत भी थी। मई 2019 में उनकी आत्महत्या ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया। पायल लम्बे समय से अपने विभाग में वरिष्ठ रेज़िडेंट डॉक्टरों द्वारा जातिगत टिप्पणियों,अपमानजनक व्यवहार,पेशेवर बहिष्कार और निरंतर मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रही थीं। कई रिपोर्टों में बताया गया कि उन्हें ऑपरेशन थिएटर से बाहर रखा जाता,काम के दौरान नीचा दिखाया जाता और उनकी जाति पर अपमानजनक टिप्पणियां की जाती थीं। यह संस्थागत जातिगत उत्पीड़न धीरे-धीरे उनके आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा था। यह मानसिक,सामाजिक और पेशेवर उत्पीड़न का मिला,जुला दबाव था जिसने उन्हें आत्महत्या जैसे चरम कदम की ओर धकेला।
आधुनिक और स्वतंत्र भारत में दलित और वंचितों की सुरक्षा के लिए अनेक संविधानिक प्रावधानों के बाद भी प्रतिभाशाली अधिकारियों और विद्यार्थियों की जातिगत भेदभाव के चलते आत्महत्याएं समाज को शर्मसार करने वाली है। लेकिन यह वंचित वर्ग के पढ़े लिखे युवाओं की संघर्ष क्षमता में कमी को भी दर्शाता है,और फिर डॉक्टर आंबेडकर के अनुयायी होने का दावा करने वाले युवाओं के लिए तो आत्महत्या की स्वीकार्यता हो ही नहीं सकती। डॉ.भीमराव आंबेडकर के सामने चुनौतियां कम नहीं थीं, लेकिन वे हर परिस्थिति में अडिग रहे। उनके संघर्ष का विस्तार और गहराई इतनी बड़ी थी कि किसी भी सामान्य व्यक्ति को तोड़ सकती थी, लेकिन आंबेडकर ने हर कठिनाई को अपने मिशन की ऊर्जा बना दिया। डॉ.आंबेडकर के समय और आज का समय मूलभूत रूप से भिन्न हैं। आंबेडकर ने ऐसे दौर में संघर्ष किया,जब अस्पृश्यता,जातिगत भेदभाव,सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक शोषण व्यापक रूप से स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा थे। उनके समय में शिक्षा, संसाधन,अवसर और अभिव्यक्ति की आज़ादी दलितों सहित वंचित समुदायों के लिए लगभग बंद दरवाज़े थे। शिक्षा,सामाजिक सम्मान हो या राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अधिकार, आंबेडकर को कड़े संघर्ष,विरोध और अपमान झेलकर हासिल करना पड़ा।
डॉ.आंबेडकर ने अपने जीवन में वे सभी अत्याचार,अपमान, उपेक्षा और भेदभाव झेला,जिनसे कोई भी व्यक्ति टूट सकता था। लेकिन उन्होंने कभी हार मानने या जीवन से भागने को विकल्प नहीं बनाया। जिस समाज ने उन्हें पानी तक नहीं छूने दिया,उन्होंने उसी समाज का संविधान लिखा। जिन लोगों ने उनका रास्ता रोका,उन्होंने उन्हें अपनी बुद्धि और कर्म से पीछे छोड़ दिया। जिन जातिगत दीवारों ने उन्हें रोकने की कोशिश की,उन्होंने ज्ञान और संघर्ष से उन दीवारों को तोड़ दिया।
आज संविधान,कानून,शिक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाएं दलितों के पास ताकत का औज़ार बनकर खड़ी हैं। समस्याएं आज भी हैं, लेकिन वे आंबेडकर के दौर जैसी भयावह,निराशाजनक और सर्वव्यापी नहीं हैं। आंबेडकर हमेशा जीवन को जीने, समाज बदलने और सशक्त बनने की प्रेरणा देते हैं। अगर डॉ. आंबेडकर ने आत्महत्या की होती,तो यह करोड़ो लोगो के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा का संकट बन जाता। बहरहाल जिंदगी में आंबेडकर को ढूँढ़िए। आंबेडकर के जीवन में आत्मविश्वास, संघर्ष और बेहतर भविष्य की रोशनी मिलेगी।