नवभारत टाइम्स
लगभग आठ शताब्दियों तक मुस्लिम शासन के अधीन रहे यूरोप के एकमात्र देश रहे स्पेन की भौगोलिक स्थिति, सरकार की उदार अप्रवासन नीतियां और मुस्लिम शरणार्थियों की इस देश में बस जाने की बैचेनी अब यूरोप को आतंकित कर रही है। स्पेन के एक सीमावर्ती शहर सेउटा से भागती हुई शरणार्थियों की भीड़ स्पेन की सुरक्षा व्यवस्था का संकट बढ़ा गयी है और इससे सम्पूर्ण यूरोप में दहशत जैसा माहौल है। उत्तरी अफ्रीका में मोरक्को की सीमा से लगा छोटा-सा शहर सेउटा यूरोप और अफ्रीका के बीच सबसे संवेदनशील स्थलीय सीमा माना जाता है। जब भी पश्चिमी या उप-सहारा अफ्रीका में युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी, जलवायु परिवर्तन या मानवीय संकट गहराता है, तो हजारों लोग बेहतर जीवन और सुरक्षा की तलाश में मोरक्को के रास्ते सेउटा पहुंचने का प्रयास करते है। स्पेन आज यूरोप के लिए केवल एक सीमावर्ती देश नहीं, बल्कि सुरक्षा, मानवीय दायित्व और सामाजिक एकीकरण के बीच संतुलन की सबसे कठिन परीक्षा बन चुका है। स्पेन का अतीत मुस्लिम साम्राज्य के प्रभावों वाला रहा है। 711 से 1492 ईस्वी तक स्पेन के बड़े हिस्से पर मुस्लिम शासन रहा था, जिसे इतिहास में अल-अंदलुस के नाम से जाना जाता है। यूरोप की चिंता यह भी है की कहीं स्पेन फिर से अपने अतीत की और न लौट जाएं। यूरोप के कई देशों में इस्लामवादी कट्टरपंथ से जुड़े आतंकवादी हमलों और सुरक्षा चिंताओं के कारण जनभावनाओं और राजनीतिक बहस में तीखापन आया है। फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया और ब्रिटेन जैसे देशों में पिछले वर्षों में हुए कुछ हमलों के बाद सरकारों ने कट्टरपंथ, ऑनलाइन उग्रवाद और विदेशी लड़ाकों के नेटवर्क पर निगरानी बढ़ाई है। इसके साथ ही कई दक्षिणपंथी दल कठोर आव्रजन नीति और सख्त सीमा नियंत्रण की मांग कर रहे है। लेकिन स्पेन पूरे यूरोप की चिंता बढ़ा रहा है ।
सेउटा के सहारे स्पेन में घुस आने वाली भीड़ के इरादें बेहद खतरनाक नजर आ रहे है,इस शहर का रणनीतिक महत्व उसकी भौगोलिक स्थिति से जुड़ा है। यह स्पेन का हिस्सा है, लेकिन अफ्रीकी महाद्वीप पर स्थित है। इसके कारण जो भी व्यक्ति सेउटा में प्रवेश करता है, उसके लिए यूरोपीय संघ तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। यही वजह है कि मानव तस्करी के अंतरराष्ट्रीय गिरोह भी इस मार्ग का उपयोग करने का प्रयास करते है। हाल के वर्षों में इस मार्ग पर प्रवासियों की बढ़ती संख्या ने स्पेन की सीमा सुरक्षा, शरणार्थी प्रबंधन और प्रशासनिक क्षमता पर अतिरिक्त दबाव डाला है। यूरोप की चिंता केवल अवैध प्रवासियों की संख्या तक सीमित नहीं है। बड़े पैमाने पर अनियमित प्रवासन से आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं पर भारी दबाव पड़ता है। इसके साथ ही प्रवासियों के सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण की चुनौती भी सामने आती है। यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती, तो सामाजिक तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण और राष्ट्रवादी राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है। यही कारण है कि कई यूरोपीय देशों में प्रवासन आज सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है।
सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। यूरोपीय सुरक्षा एजेंसियों को आशंका रहती है कि बड़े पैमाने पर होने वाले अनियमित प्रवासन का लाभ आईएसआई उठा सकता है। यूरोप में लोन वुल्फ हमले सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बन गए हैं। ऐसे हमलों में कोई व्यक्ति किसी बड़े आतंकवादी संगठन के प्रत्यक्ष निर्देश के बिना, लेकिन उसकी विचारधारा या ऑनलाइन प्रचार से प्रभावित होकर अकेले हमला करता है। ऐसे हमलावर चाकू, वाहन या घरेलू हथियारों जैसे आसानी से उपलब्ध साधनों का उपयोग करते है, जिससे उनकी पहचान पहले से कर पाना कठिन हो जाता है। पिछले एक दशक में फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया सहित कई यूरोपीय देशों में इस प्रकार के हमले सामने आए हैं। कई मामलों में हमलावरों ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से कट्टरपंथी सामग्री से प्रेरणा ली थी। अधिकांश लोन वुल्फ हमले इस्लामवादी विचारधारा से जुड़े हुए है और उसमे भी अधिकतम अप्रवासियों ने किए है। यूरोप में दक्षिणपंथी अतिवाद और नस्लीय घृणा ऐसी घटनाओं के कारण बड़ी है। यूरोप के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे हमलावर अक्सर किसी संगठित नेटवर्क का हिस्सा नहीं होते, जिससे पारंपरिक खुफिया निगरानी कम प्रभावी हो जाती है। इसलिए यूरोपीय देश ऑनलाइन कट्टरपंथ की निगरानी, सामुदायिक सहभागिता, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, प्रभावी खुफिया समन्वय और आतंकवाद-रोधी कानूनों को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। लोन वुल्फ हमले यह संकेत देते हैं कि आधुनिक आतंकवाद अब केवल संगठित नेटवर्क तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैचारिक कट्टरता से प्रेरित व्यक्तिगत हिंसा भी एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुकी है।
यूरोप लंबे समय से इस्लामिक स्टेट जैसे जिहादी संगठनों के लिए एक प्रमुख लक्ष्य रहा है। इसका कारण केवल यूरोप का वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक महत्व नहीं, बल्कि इसका खुला लोकतांत्रिक ढांचा, बड़ी आबादी वाले शहर और व्यापक अंतरराष्ट्रीय संपर्क भी हैं। पिछले एक दशक में फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी और ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों में आईएसआईएस से प्रेरित या उससे जुड़े आतंकवादी हमले हो चुके हैं। वर्तमान में सुरक्षा एजेंसियों की चिंता यह है कि अफ्रीका के साहेल क्षेत्र, लीबिया और मध्य पूर्व में सक्रिय आईएसआईएस की शाखाएं अस्थिरता का लाभ उठाकर अपने नेटवर्क का विस्तार करने का प्रयास कर सकती हैं। इसके साथ ही, बड़े पैमाने पर अनियमित प्रवासन के दौरान सीमाओं पर बढ़ा दबाव सुरक्षा जांच को अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है।
स्पेन की भौगोलिक स्थिति उसे यूरोप का सबसे संवेदनशील प्रवेश द्वार बनाती है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के सबसे संकरे हिस्से में अफ्रीका और यूरोप के बीच की दूरी केवल लगभग 14 किलोमीटर है। यही निकटता स्पेन को अफ्रीका में पैदा होने वाले हर संकट का पहला प्रभावित देश बना देती है। इसलिए जो प्रवासन संकट स्पेन में शुरू होता है, उसका प्रभाव धीरे-धीरे फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम और अन्य यूरोपीय देशों तक पहुंच जाता है। बड़े पैमाने पर अनियमित प्रवासन से आवास, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं पर भारी दबाव पड़ता है।
यदि प्रवासियों का प्रभावी सामाजिक एकीकरण नहीं हो पाता, तो सामाजिक तनाव, सांस्कृतिक टकराव और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। इसी कारण कई यूरोपीय देशों में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दलों का जनाधार तेजी से बढ़ा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी लंबे समय से यूरोपीय संघ से कठोर सीमा नियंत्रण और अवैध प्रवासन के विरुद्ध सामूहिक नीति अपनाने की मांग करती रही हैं। वहीं स्पेन की समाजवादी सरकार की उदार प्रवासन नीतियां स्पेन को प्रवासियों के लिए अधिक आकर्षक बना रही है। अधिकांश मुस्लिम प्रवासी युद्ध, हिंसा, उत्पीड़न और गरीबी से बचकर सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की तलाश में यूरोप पहुंचते है। चुनौती तब पैदा होती है जब ये कट्टरपंथी घटनाओं में शामिल हो जाते है। इसलिए सुरक्षा चिंताओं और मानवीय दायित्वों के बीच संतुलन बनाना यूरोप की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।
स्पेन एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और यूरोपीय संघ का मजबूत सदस्य देश है। यहां अनियंत्रित प्रवासन, सीमा सुरक्षा, सामाजिक एकीकरण और मानवीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करना बड़ी चुनौती है। स्पेन को यह समझना होगा कि यदि वह आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर अनियमित या अपर्याप्त रूप से नियंत्रित प्रवासन पर निर्भर रहता है, तो इसके दूरगामी परिणाम केवल उसके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के लिए चुनौती बन सकते हैं। श्रमशक्ति की कमी दूर करने और आर्थिक विकास के लिए प्रवासियों की आवश्यकता अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ प्रभावी सीमा प्रबंधन, कठोर पहचान सत्यापन, सफल सामाजिक एकीकरण और संतुलित आव्रजन नीति भी उतनी ही आवश्यक है। अनियंत्रित प्रवासन सामाजिक तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ा सकता है, जिसका प्रभाव पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ेगा। इसलिए स्पेन की प्रवासन नीति केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि यूरोप की सामूहिक सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा विषय बन चुकी है। यूरोप के कई देशों में बढ़ते अनियमित प्रवासन और कट्टरपंथ को लेकर राजनीतिक चिंता लगातार बढ़ रही है। इटली, हंगरी, पोलैंड और अन्य देशों में दक्षिणपंथी दल कठोर सीमा नियंत्रण और सख्त आव्रजन नीति की मांग कर रहे हैं। यदि स्पेन अपनी सीमा सुरक्षा और प्रवासन प्रबंधन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाता, तो उस पर यूरोपीय संघ के भीतर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है और साझा प्रवासन नीति को लेकर गंभीर मतभेद उभर सकते है। यदि स्पेन की सरकार ने सुधार नहीं किया तो उसे यूरोपीय संघ से बेदखल भी किया जा सकता है।\
https://navbharattimes.indiatimes.com/world/rest-of-europe/morocco-migrants-take-over-spain-ceuta-expert-big-warning-for-europe-on-islamic-rule-isis-military-deployed/articleshow/132764143.cms
इस्लामिक देश बनने की राह पर है स्पेन


