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इस्लामी दुनिया में नई धुरी गढ़ने की पाकिस्तान की कवायद

An Iranian cleric and his son, dressed in military fatigues take part in celebrations following a ceasefire between Iran and Israel at Enghlab Square in the capital Tehran on June 24, 2025. A fragile ceasefire in the Iran-Israel war appeared to be holding on June 24, after 12 days of strikes that saw Israel and the United States pummel the Islamic republic's nuclear facilities. (Photo by ATTA KENARE / AFP)

     सत्ता मेल 
                                                      इस्लामी सहयोग संगठन यानि ओआईसी की स्थापना  उन्नीस सौ उनहत्तर में विश्व के मुस्लिम देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। यह चार महाद्वीपों में फैले सत्तावन सदस्य देशों का एक प्रमुख अंतर-सरकारी संगठन है, जिनमें अधिकांश मुस्लिम-बहुल राष्ट्र हैं। ओआईसी स्वयं को  मुस्लिम विश्व की सामूहिक आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है और सदस्य देशों के हितों की रक्षा, इस्लामी एकजुटता को सुदृढ़ करने तथा अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है। संगठन का स्थायी मुख्यालय जेद्दा (सऊदी अरब) में स्थित है। संयुक्त राष्ट्र के बाद सदस्य देशों की संख्या के आधार पर यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन माना जाता है और पश्चिम एशिया, अफ्रीका तथा एशिया की राजनीति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

पाकिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को कभी-कभी इस्लामिक बम की अवधारणा से जोड़कर मुस्लिम देशों के बीच अपनी रणनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य स्वयं को इस्लामी जगत की एक प्रमुख सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करना था। हालांकि, इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) में पाकिस्तान को हमेशा अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप समर्थन नहीं मिला। अनेक अवसरों पर ओआईसी के प्रभावशाली सदस्य देशों, विशेषकर खाड़ी देशों ने भारत के साथ अपने बढ़ते आर्थिक, ऊर्जा और सामरिक संबंधों को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप, भारत से जुड़े कई मुद्दों पर पाकिस्तान को वह सामूहिक समर्थन नहीं मिल सका जिसकी उसे अपेक्षा थी। यही कारण है कि समय-समय पर पाकिस्तान ने ओआईसी की भूमिका और उसके रवैये पर सार्वजनिक रूप से असंतोष भी व्यक्त किया।

अब पाकिस्तान ने आर-4 नामक संगठन की स्थापना कर ओआईसी को ही खत्म करने की साजिश रच दी है. दरअसल हाल ही में मिस्र के काहिरा में आर-4 यानि पाकिस्तान, मिस्र,सऊदी अरब और तुर्किये ने एक बैठक कर क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान-अमेरिका समझौते, गाज़ा, लेबनान तथा फिलिस्तीन के मुद्दों पर संयुक्त विचार-विमर्श किया और सहयोग को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। आर-4 की अब तक चार विदेश मंत्री स्तरीय बैठकें हो चुकी हैं। इसके पहले 19 मार्च 2026  को सऊदी अरब के रियाद, 29 मार्च 2026 को इस्लामाबाद ,पाकिस्तान तथा 18 अप्रैल 2026 को तुर्किये के अंताल्या में बैठकें हो चूकी है। आर-4 अभी कोई औपचारिक संधि-आधारित संगठन नहीं है, बल्कि चार देशों पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्किये का एक परामर्श मंच है। इसके गठन के पीछे प्रमुख कारण  जो बताएं गये है वह पश्चिम एशिया पर समन्वित कूटनीति,चार प्रभावशाली मुस्लिम देशों के बीच नियमित विदेश मंत्री स्तर की वार्ता,ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों, आपूर्ति  श्रृंखलाओं और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग तथा अधिक तेज़ और समन्वय है।

लेकिन आर-4 के के पीछे कई गहरे सामरिक और कूटनीतिक उद्देश्य भी दिखाई देते है। इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) के समानांतर एक अधिक छोटा, सक्रिय और प्रभावी परामर्श मंच विकसित करना हो सकता है। ओआईसी में सत्तावन सदस्य देशों के कारण निर्णय प्रक्रिया अक्सर धीमी और जटिल हो जाती है, जबकि सीमित सदस्यता वाला आर-4 त्वरित समन्वय और साझा रणनीति बनाने में अधिक सक्षम हो सकता है।

तुर्किये लंबे समय से पश्चिम एशिया और व्यापक इस्लामी जगत में अपनी राजनीतिक तथा रणनीतिक भूमिका का विस्तार करना चाहता है। आर-4 उसे इस दिशा में एक नया मंच प्रदान कर सकता है। सऊदी अरब और मिस्र क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पारंपरिक केंद्रीय भूमिका बनाए रखना चाहते हैं, ताकि पश्चिम एशिया के शक्ति-संतुलन में उनका प्रभाव कायम रहे। पाकिस्तान इस मंच के माध्यम से स्वयं को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित देश के बजाय पश्चिम एशिया और हिन्द महासागर की रणनीतिक राजनीति के महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर सकता है। ये चारों देश कुछ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर अधिक स्वतंत्र नीति-समन्वय विकसित करना चाहते है, जिससे वे अपने हितों की रक्षा कर सकें।

आर-4 के चारों सदस्य देश मुस्लिम जगत में अलग-अलग कारणों से प्रभावशाली हैं। सऊदी अरब इस्लाम के दो पवित्र स्थलों का संरक्षक, ऊर्जा महाशक्ति और अरब जगत का प्रमुख आर्थिक केंद्र है। मिस्र स्वेज नहर का नियंत्रक, अफ्रीका और पश्चिम एशिया के बीच रणनीतिक सेतु तथा अरब दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक है। तुर्किये अपने विकसित रक्षा उद्योग, सक्रिय विदेश नीति और नाटो सदस्यता के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वहीं पाकिस्तान परमाणु शक्ति और बड़ी सेना के कारण सामरिक महत्व रखता है। यदि ये चारों देश साझा रणनीतिक मुद्दों पर  एक रुख अपनाते हैं, तो उनका व्यावहारिक प्रभाव कई मामलों में ओआईसी की औपचारिक घोषणाओं से अधिक प्रभावी हो सकता है। आर-4 को दुनिया में मुस्लिम नाटो कहा जा रहा है। पाकिस्तान अपने परमाणु बम का सुरक्षा अम्ब्रेला की तरह इस्तेमाल करके अपनी धाक जमाना चाहता है। पाकिस्तान इसके  माध्यम से अपनी परमाणु क्षमता और सैन्य शक्ति को एक रणनीतिक सुरक्षा छाते के रूप में प्रस्तुत कर मुस्लिम जगत में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर सकता है। इससे वह स्वयं को केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि व्यापक इस्लामी दुनिया के सुरक्षा साझेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। लेकिन यदि पाकिस्तान पर भरोसा किया गया तो वह अमेरिका का पिछलग्गू बनकर इस्लामिक दुनिया की एकता को कभी भी तार तार कर सकता है।
पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति कई अवसरों पर इस्लामी एकजुटता के बजाय बदलते सामरिक हितों से संचालित रही है। शीत युद्ध के दौरान उसने अमेरिका के साथ घनिष्ठ सैन्य सहयोग किया, जबकि बाद में आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में भी वह अमेरिका का प्रमुख सहयोगी बना। वहीं तुर्किये, सऊदी अरब, ईरान और अन्य मुस्लिम देशों के बीच संतुलन बनाने की उसकी नीति भी समय-समय पर बदलती रही है। यही कारण है कि पाकिस्तान ने कई बार व्यापक इस्लामी हितों से अधिक अपने राष्ट्रीय और सामरिक हितों को प्राथमिकता दी, जिससे उसकी नीतियों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे। यदि मुस्लिम दुनिया की राजनीति की बात करें तो ईरान को बाहर रखकर कोई भी मंच सम्पूर्ण इस्लामी प्रतिनिधित्व का दावा नहीं कर सकता। संयुक्त अरब अमीरात,क़तर और इंडोनेशिया जैसे महत्वपूर्ण मुस्लिम देश भी इसमें नहीं हैं। बहरहाल आर-4 के अन्य सदस्य यानि सऊदी अरब, मिस्र और तुर्किये,किसी भी दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था में पाकिस्तान की भूमिका का आंकलन अपने-अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर ही करेंगे,ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।   

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