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ईरान में सुधारवादियों को सजा-ए-मौत

   दैनिक प्रजातंत्र
 किसी भी देश के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन करने वाले खिलाड़ी राष्ट्र की पहचान,आत्मविश्वास और सम्मान के प्रतीक होते हैं। वे देश की वैश्विक छवि को मजबूत करते है और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनते है। लेकिन ईरान में हालात एक अलग ही तस्वीर पेश करते है,जहां खेल,राजनीति और न्याय व्यवस्था का टकराव कई बार त्रासदी का रूप ले लेता है। 19 वर्षीय पहलवान सालेह मोहम्मदी ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। उन्हें इस साल 19 मार्च 2026 को कोम शहर में सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। मोहम्मदी पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों की हत्या और मोहारेबह अर्थात् ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया गया। मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले में गंभीर प्रश्न  उठाते हुए कहा की यह जबरन कबूलनामा,निष्पक्ष सुनवाई की कमी और न्यायिक पारदर्शिता के अभाव को दिखाता है। ईरान में मृत्युदंड की बढ़ती संख्या बड़ी चिंता का विषय है। ईरान में मोहारेबह एक गंभीर कानूनी आरोप है,जिसका उद्देश्य मूलतःराज्य के खिलाफ हिंसक गतिविधियों और सशस्त्र विद्रोह को रोकना है। ईरान में इस कानून की व्याख्या कई बार इतनी व्यापक कर दी जाती है की सरकार विरोधी गतिविधियों या असहमति को भी इसके दायरे में शामिल कर लिया जाता है। मोहारेबह का उपयोग अक्सर राजनीतिक विरोध को दबाने के औजार के रूप में किया गया है। प्रदर्शनों के बाद कई युवाओं पर यह आरोप  लगाया गया और बाद में उन्हें फांसी पर टांग दिया गया। 21 वर्षीय कराटे खिलाड़ी सासन आजादवर को मई 2026 में फांसी दी गई। उन पर जनवरी के प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप थे। इसके पहले जनवरी 2026 में,मशहद के 33 वर्षीय स्पोर्ट्स कोच और बॉडी बिल्डर अली रहपरवर को फांसी दी गई। उन्हें प्रदर्शनों में सक्रिय भूमिका निभाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह सितंबर 2020 में,प्रसिद्ध पहलवान नवीद अफकारी को फांसी दी गई थी। उन पर 2018 के प्रदर्शनों के दौरान एक सुरक्षा गार्ड की हत्या का आरोप था।
ईरान में हाल के वर्षों में फांसी की सजाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। 2025 में करीब एक हजार छह सौ उनतालीस लोगों को फांसी दी गई,जो 2024 की तुलना में भारी वृद्धि दर्शाती है। ईरान की न्यायिक प्रणाली में मोहारेबह,बघी और एफसाद-फिल-अर्ज़ जैसे आरोपों का व्यापक उपयोग होता है। इनका उद्देश्य राज्य के खिलाफ हिंसक गतिविधियों को रोकना है,लेकिन इन कानूनों  को हथियार बनाकर शांतिपूर्ण विरोध भी बर्दाश्त नहीं किए जाते। फांसी पाने वालों में युवा,महिलाएं और अल्पसंख्यक शामिल है।  यह तथ्य सामाजिक और कानूनी असमानताओं की ओर संकेत करते है।
दरअसल ईरान असंतोष को नियंत्रित करने के लिए कठोर दमनात्मक उपाय अपना रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन घटनाओं की कड़ी आलोचना होती रही है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न देशों ने ईरान से सुधार की अपील की है,लेकिन  ईरान इसे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताकर इसे ख़ारिज कर देता है।  ईरान पर दुनिया ने कूटनीतिक दबाव,आर्थिक प्रतिबंध और सार्वजनिक निंदा जैसे उपाय आजमाएं है लेकिन धार्मिक सत्ता अभी भी बहुत मजबूत है। ईरान के ऐतिहासिक रूप से अमेरिका और इज़राइल के साथ ईरान के संबंध तनावपूर्ण रहे है। ऐसे में जब देश के भीतर आर्थिक संकट,राजनीतिक असंतोष या विरोध प्रदर्शन उभरते है,तो सरकार अक्सर बाहरी खतरे की धारणा को प्रमुखता देती है। इससे राष्ट्रवाद का एक ऐसा माहौल बनता है,जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा,संप्रभुता और विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ एकजुटता पर जोर दिया जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में भी ईरान की सरकार और सेना ने यही रणनीति अपनाई है,जहां बाहरी दुश्मन की छवि को उभारकर आंतरिक विरोध को खत्म करने की कोशिश की जा रही  है। इससे सरकार को वैचारिक समर्थन मिल रहा है और विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है। राष्ट्रवाद बनाम असहमति का फायदा ईरान की वर्तमान सरकार को खूब मिल रहा है।
ईरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और गश्त-ए-इरशाद जैसी नैतिक पुलिसिंग संस्थाएं  राज्य की वैचारिक और सुरक्षा संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सरकार का दृष्टिकोण यह है कि ये संस्थाएं केवल कानून-व्यवस्था बनाएं  रखने के लिए नहीं,बल्कि इस्लामी मूल्यों,सामाजिक अनुशासन और राष्ट्रीय पहचान की रक्षा के लिए आवश्यक है। ईरान में शासन व्यवस्था,धर्म और राजनीति के मिश्रण पर आधारित है,जहां सामाजिक नियमों को लागू करना राज्य की जिम्मेदारी माना जाता है। लेकिन इसी व्यवस्था का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली अत्यधिक कठोर और दमनात्मक है। महिलाओं के पहनावे और हिजाब से संबंधित नियमों को लागू करने में सख्ती और सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ा है।  वहीं नियमों के उल्लंघन पर त्वरित और कड़ी कार्रवाई से आम नागरिकों में भय और असुरक्षा  बढ़ी है। ईरान में शासन व्यवस्था द्वारा सामाजिक नियंत्रण और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा को प्राथमिकता दी जाती है  है,जबकि आमतौर पर नागरिक स्वतंत्रता,व्यक्तिगत अधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रश्न नकार दिए जाते है। जब कानून का क्रियान्वयन अत्यधिक कठोर हो जाता है,तो वह सामाजिक अनुशासन के बजाय दमन के रूप में देखा जाने लगता है। ईरान में राज्य की वैचारिक प्राथमिकताएं और नागरिकों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती लगातार बनी हुई है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव तथा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़ी आशंकाओं ने वैश्विक स्तर पर चिंता को काफी बढ़ा दिया है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है,जहां से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में किसी भी संभावित संघर्ष का असर केवल क्षेत्रीय नहीं,बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मुख्य ध्यान इस समय युद्ध को टालने और क्षेत्र में स्थिरता बनाएं रखने पर केंद्रित है। कूटनीतिक प्रयास,बैक-चैनल वार्ताएं और वैश्विक अपीलें इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन इस बाहरी संकट का एक आंतरिक प्रभाव भी दिखाई देता है। जब किसी देश पर बाहरी दबाव या युद्ध का खतरा बढ़ता है,तो अक्सर सरकारें राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं। ऐसे माहौल में सुधार,लोकतांत्रिक बदलाव या असहमति की आवाज़ें पीछे छूट जाती हैं। यही स्थिति वर्तमान में ईरान में भी देखने को मिल रही है, जहां सुधारवादी मांगें और राजनीतिक असंतोष अब धीमे पड़ते या दबते नजर आ रहे हैं।इसका एक कारण यह भी है कि युद्ध या संघर्ष की स्थिति में आम जनता का ध्यान भी सुरक्षा, स्थिरता और रोजमर्रा की जरूरतों पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे समय में सुधार की मांग को या तो स्थगित कर दिया जाता है या उसे राष्ट्रीय हित के खिलाफ बताकर कमजोर किया जाता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र ने ईरान में निष्पक्ष सुनवाई के बिना और राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए मौत की सजा के इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है।
यह भी दिलचस्प है की किसी भी समाज में परिवर्तन की मांग केवल बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती,बल्कि वह भीतर मौजूद असंतोष,आकांक्षाओं और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से संचालित होती है। जब किसी देश पर युद्ध या बाहरी तनाव का दबाव होता है,तब अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता का मुद्दा प्रमुख हो जाता है,जिससे आंतरिक विरोध अस्थायी रूप से दब जाता है। लेकिन यह दबाव स्थायी नहीं होता। ईरान में राजनीतिक व्यवस्था इस समय इसलिए मजबूत नजर आ रही है उनके पास मजबूत संस्थागत ढांचा,सुरक्षा तंत्र और वैचारिक आधार है। ईरान की व्यवस्था जटिल संरचना पर आधारित है।इसमें निर्वाचित संस्थाओं के साथ-साथ शक्तिशाली धार्मिक नेतृत्व,न्यायपालिका और सुरक्षा तंत्र शामिल है,जो मिलकर शासन को स्थिरता प्रदान करते है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स जैसी संस्थाएं  सुरक्षा के साथ आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्रों में भी प्रभाव रखती है।इस व्यवस्था का एक मजबूत वैचारिक आधार है,जो इस्लामी गणराज्य की अवधारणा से जुड़ा है। यह वैचारिक  ढांचा शासन को वैधता प्रदान करता है और समर्थकों के बीच एकजुटता बनाए रखता है। हालांकि  आम जनता के लिए यह व्यवस्था बहुत जटिल है क्योंकि इसमें सुधार की गुंजाइश खत्म हो गई है।
इस समय ट्रम्प के ईरान में फांसी रुकवाने के दावे पस्त पड़ चूके है और लोगों की आवाजें दबाई जा रही है। ईरान में सुधार की बहुत गुंजाइश है। ईरान की शासन व्यवस्था को सुधार करने ही होंगे,इस तंत्र के साथ ईरान लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकताईरान में जैसे ही बाहरी संकटों की तीव्रता  होगी वैसे ही आर्थिक कठिनाइयां,युवाओं की बेरोजगारी,महिलाओं के अधिकार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक सुधार जैसे मुद्दे फिर से उभरकर सामने आ जाएंगे। ईरान में बदलाव की चाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक वास्तविकता के रूप में उभरती रही है, जिसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समय-समय पर सामने आए विरोध प्रदर्शन,युवाओं की आकांक्षाएं,महिलाओं के अधिकारों की मांग और आर्थिक चुनौतियां इस इच्छा को दर्शाती हैं। इतिहास बताता है कि समाज के भीतर परिवर्तन की मांग धीरे-धीरे ही सही,पर लगातार बनी रहती है। इसलिए ईरान में सुधार की  संभावनाएं मौजूद हैं, जिन्हें दीर्घकाल  तक अनदेखा करना ईरान की इस व्यवस्था के लिए आत्मघाती ही साबित होगा।
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