सत्ताएं बदलती है, शासन बदलते है, कानून बदलते है,लेकिन जब कोई निहत्था नागरिक अन्याय के सामने खड़ा होकर कहता है की मैं नहीं डरता, तब गांधी फिर जीवित हो उठते है। दुनिया बदल गई है, सत्ता के तरीके बदल गए है, लेकिन सत्ता के सामने निर्भीक असहमति की ताकत आज भी वही है। शायद इसी कारण गांधीवादी प्रतिरोध से सत्ता तब भी डरती थी और आज भी डरती है।
आज दुनिया बहुत बदल चुकी है। औपनिवेशिक शासन का स्थान आधुनिक राष्ट्र-राज्यों ने ले लिया है। संविधान, संसद, चुनाव और न्यायपालिका लोकतांत्रिक शासन के प्रमुख आधार बन चुके है। लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में सत्ता और असहमति का संघर्ष अब भी जारी है। कहीं विपक्षी नेता जेल में है, कहीं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर कठोर कानून लगाए गए है और कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक विरोध की संभावनाओं को खत्म किया जा रहा है।
तुर्की के इस्तांबुल से पाकिस्तान के बलूचिस्तान तक, हांगकांग से बेलारूस और म्यांमार तक अलग-अलग रूपों में यही सवाल सामने आता है, क्या सत्ता अपने सबसे मुखर आलोचक को भी लोकतांत्रिक अधिकार देने के लिए तैयार है?तुर्की में इस्तांबुल के पूर्व मेयर एक्रेम इमामोग्लू की 2025 में भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों में गिरफ्तारी के बाद तुर्की में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इसे देश के लोगों ने एर्दोआन की लोकतंत्र को कुचलने की कोशिश बताया। इमामोग्लू का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां संघर्ष किसी सशस्त्र विद्रोह का नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति और न्यायिक कार्रवाई के बीच संबंधों का है। जब कोई लोकप्रिय विपक्षी नेता सत्ता के लिए चुनौती बनता है और उसके बाद उस पर कानूनी कार्रवाई होती है, तो लोकतंत्र की संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते है।
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मेहरंग बलोच का संघर्ष नागरिक अधिकारों और जबरन गायब किए जाने के आरोपों के खिलाफ आंदोलन से जुड़ा है। बलोच यकजेहती कमेटी के माध्यम से उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों और जन लामबंदी का नेतृत्व किया।2025 में हिरासत में लिए जाने के बाद इस साल जून में एक आतंकवाद विरोधी अदालत ने उन्हें एक अर्धसैनिक सैनिक की मौत से जुड़े मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष ने उन पर प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाया, जबकि उनके समर्थकों और मानवाधिकार संगठनों ने मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। यह मामला लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक कठिन परीक्षा को सामने लाता है। किसी आंदोलनकारी पर गंभीर आरोप हो तो उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन उसी के साथ शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति और नागरिक अधिकारों के प्रश्न को भी दबाया नहीं जाना चाहिए।
शांतिपूर्ण नागरिक लामबंदी और दमन के बावजूद मेहरंग बलोच का अपनी बात रखने का उनका तरीका गांधी के सत्याग्रह की व्यापक भावना की याद जरूर दिलाता है।हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के साथ जुड़े अनेक लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई तेज हुई है। मानवाधिकार संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों का तर्क है कि इन कानूनों ने राजनीतिक असहमति और नागरिक स्वतंत्रता के लिए उपलब्ध जगह को बहुत सीमित कर दिया है। जोशुआ वोंग, जो हांगकांग के लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे है, उन्हें विदेशी संस्थाओं के साथ मिलीभगत से संबंधित राष्ट्रीय सुरक्षा आरोप में दोषी ठहराया गया है और उन्हें अब आजीवन कारावास तक की सजा का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह तियानआनमेन की स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों से जुड़ी कार्यकर्ता चौ-हैंग-तुंग को भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल की सजा दी गई। हांगकांग का प्रश्न केवल एक शहर की राजनीतिक स्थिति का प्रश्न नहीं है। यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर दुनिया भर में चर्चा होती रही है।
बेलारूस में लंबे समय से लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर संघर्ष जारी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित एलेस बियालियात्स्की वर्षों तक जेल में रहे। उन्होंने कहा कि राजनीतिक कैदियों की रिहाई के बावजूद दमन की व्यवस्था समाप्त नहीं हुई है।बेलारूस के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने न्यायिक और प्रशासनिक तंत्र के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगाए है। सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है।
म्यांमार की परिस्थिति इन सभी उदाहरणों से कहीं अधिक जटिल और हिंसक है। 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद लोकतंत्र समर्थक नेताओं, कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के लोगों पर व्यापक कार्रवाई हुई। बाद में देश का राजनीतिक संकट सशस्त्र संघर्ष और गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियों में बदल गया।इसलिए म्यांमार को केवलजेल में बंद लोकतंत्र समर्थकोंकी कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वहां सवाल राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ नागरिक सुरक्षा, सैन्य हिंसा और देश के भविष्य का भी है।
तुर्की, बलूचिस्तान, हांगकांग, बेलारूस और म्यांमार में लोकतंत्र समर्थकों पर सत्ता ने नकेल कसने के लिए भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जेल में डाला दिया है, किसी पर हिंसा से जुड़े मामले है, कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू है और कहीं पूरा देश ही सशस्त्र संघर्ष में फंसा है।यहीं गांधी आज फिर प्रासंगिक हो जाते है।गांधी ने सत्ता से असहमति को हिंसा का पर्याय नहीं बनने दिया। उनके लिए विरोधी को समाप्त करना उद्देश्य नहीं था,अन्याय का प्रतिरोध करना उद्देश्य था। सत्याग्रह की शक्ति इसी में थी कि वह सत्ता के सामने खड़े होने का साहस देता था, लेकिन प्रतिरोध करने वाले को भी नैतिक अनुशासन में बांधता था। आज दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक संघर्षों की परिस्थितियां गांधी के समय से बिल्कुल अलग है। फिर भी नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और सत्ता की जवाबदेही जैसे प्रश्न आज भी उतने ही महत्वपूर्ण है।बापू ने सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की भारी कीमत चुकाई थी। अंग्रेजी शासन के सामने झुकने से इनकार करने की कीमत उन्होंने जेल, यातना, स्वास्थ्य संकट और अपने जीवन को दांव पर लगाकर चुकाई। चंपारण से असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह से भारत छोड़ो आंदोलन तक उनका राजनीतिक जीवन गिरफ्तारी और कारावास से भरा रहा। कई बार उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ा कि जीवन पर गंभीर संकट मंडराने लगा, लेकिन उन्होंने सत्य और अहिंसा के रास्ते से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
गांधी की विरासत सिर्फ सत्ता के विरोध तक सीमित नहीं रही। भारत में चिपको आंदोलन ने पेड़ों को बचाने के लिए सत्याग्रह को पर्यावरणीय संघर्ष से जोड़ा, नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विस्थापन और पर्यावरणीय न्याय के सवाल उठाए और कर्नाटक के अप्पिको आंदोलन ने जंगल बचाने के लिए अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता अपनाया। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर का नागरिक अधिकार आंदोलन, फिलीपींस का पीपल पावर आंदोलन, पोलैंड का सॉलिडैरिटी संघर्ष और दुनिया के अनेक परमाणु निरस्त्रीकरण आंदोलनों में भी गांधी की अहिंसक प्रतिरोध परंपरा की छाप दिखाई देती है। फिलीपींस में 1986 में फर्डिनांड मार्कोस शासन के विरुद्ध पीपल पावर आंदोलन नामक व्यापक जनआंदोलन में बड़े पैमाने पर अहिंसक जनभागीदारी हुई। इसे गांधी की व्यापक अहिंसक प्रतिरोध परंपरा से प्रभावित आंदोलनों में रखा जाता है। पोलैंड में कम्युनिस्ट शासन के विरुद्ध सॉलिडैरिटी आंदोलन में श्रमिकों और नागरिक समाज के संघर्ष में हड़ताल, जनसंगठन और अहिंसक प्रतिरोध महत्वपूर्ण रहे। गांधीवादी पद्धतियों को प्रभावित करने वाली वैश्विक अहिंसक परंपरा से इसकी तुलना की जाती है। चिली, अर्जेंटीना और पूर्वी यूरोप में तानाशाही और अधिनायकवादी व्यवस्थाओं के विरुद्ध अहिंसक जनआंदोलनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस तरह गांधी किसी एक देश या एक राजनीतिक आंदोलन के नेता भर नहीं रह जाते, वे उस वैश्विक विचार के प्रतीक बन जाते हैं जिसमें अन्याय के सामने हथियार उठाने से पहले सत्य, नैतिक साहस, जनभागीदारी और अहिंसक असहमति को शक्ति बनाया जाता है।गांधी के लिए जेल जाना पराजय नहीं था। यह अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने असहमति दर्ज कराने का नैतिक माध्यम था। उन्होंने दिखाया कि सत्ता का प्रतिरोध हथियारों से ही नहीं, सत्य, अहिंसा और नागरिक अवज्ञा से भी किया जा सकता है। यही गांधी की राजनीति की सबसे बड़ी विरासतों में से एक है।