ख्यात दार्शनिक जीन रोस्टैंड ने एक बार कहा था कि एक विवाहित जोड़ा तब उपयुक्त होता है जब दोनों एक ही समय में बहस की आवश्यकता महसूस करते हैं। भारत की नई सरकार के महत्वपूर्ण भागीदार नीतीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू विवाह की रस्मों को तो निभा गए लेकिन इसके बाद के सफर को लेकर बहुत सारे सवाल बरकरार है। खासकर पाकिस्तान को लेकर। नरेंद्र मोदी की बहुमत वाली भाजपा सरकार के पिछले दस साल के कार्यकाल में पाकिस्तान को लेकर बेहद सख्त नीतियां देखी गई। भारत में आतंकवाद फ़ैलाने में पाकिस्तान की भूमिका के चलते इस पड़ोसी राष्ट्र से वैदेशिक सम्बन्ध खत्म कर दिए गए। पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टों की भारत यात्रा के दौरान भी दोनों देशों के बीच तल्खी देखने को मिली। राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर ने पाकिस्तान को घेरने में कभी संकोच नहीं दिखाया। दोनों देशों के बीच आर्थिक सम्बन्ध तो खत्म ही है,लेकिन सामाजिक,सांस्कृतिक और धार्मिक समूहों की दोनों देशों को जोड़ने की कोशिशों पर भी मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल के दौरान विराम लग गया है।
अब भारत में बहुमत की सरकार नहीं है और गठबन्धन सरकार के दो महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू पाकिस्तान के प्रति मोदी सरकार के कड़े रुख का समर्थन करें,इसकी उम्मीद कम ही है। भारत की राजनीति में यह विश्वास किया जाता है की पाकिस्तान से बेहतर संबंध कायम करने का सकारात्मक असर मुस्लिम वर्ग पर होता है। नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक हसरतों को पूरा करने के लिए 2012 में पाकिस्तान गए थे। इस दौरान सिंध का पूरा मंत्रिमंडल ही नीतीश बाबू का स्वागत करने एयरपोर्ट पर आ गया था। उस दौरान भी नीतीश कुमार भाजपा के सहयोगी थे लेकिन उन्हें जदयू की अलग धर्मनिरपेक्ष पहचान दिखाने की इतनी ललक थी की नीतीश बाबू ने मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर फूल चढ़ाने से भी परहेज नहीं किया जबकि भारत में जिन्ना को विभाजन का जिम्मेदार माना जाता है। नीतीश बाबू की पार्टी जनता दल यूनाईटेड को बिहार में मुस्लिम मतदाताओं को अच्छा खासा समर्थन हासिल है,इसका असर अब पाकिस्तान को लेकर भारत की वैदेशिक नीति में भी दिख सकता है। बिहार में 2025 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने वाले है,क्या पता नीतीश बाबू एक बार फिर पाकिस्तान की यात्रा करने का मन बना ले या पाकिस्तान के किसी प्रतिनिधिमंडल को बिहार आमंत्रित कर ले। यह भी हो सकता है की नीतीश बाबू विधानसभा चुनाव के पहले भारत पाकिस्तान के बीच क्रिकेट कूटनीति बहाल करवा कर महफ़िल लूट ले। नीतीश बाबू की गुणा भाग की राजनीति में ऊंट किस करवट बैठ जाएं,यह अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है।
एनडीए सरकार के एक और महत्वपूर्ण साझेदार चन्द्रबाबू नायडू की भूमिका करीब दो दशक पहले अटल बिहारी सरकार में भी किंग मेकर की हुआ करती थी। चन्द्रबाबू नायडू पिछले कुछ सालों में मुस्लिम वर्ग के बीच कई बार सार्वजनिक मंचों से प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना चूके है। चन्द्रबाबू नायडू की राजनीति पार्टी का अच्छा खासा असर आंध्रप्रदेश में है। दक्षिण भारत के लोगों के लिए रोजगार के लिए खाड़ी देशों को मुफीद समझा जाता है। खाड़ी के देशों में क़रीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं। आंध्रप्रदेश से खाड़ी देशों में जाने वाले लोगों की संख्या अच्छी खासी है। खाड़ी देशों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति बेहद दिलचस्प रही है। 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत से खाड़ी के देशों से रिश्ते मज़बूत हुए हैं। मोदी ने खाड़ी के इस्लामिक देशों से संबंधों को मज़बूत करने को काफ़ी गंभीरता से लिया है। मोदी की एक मज़बूत नेता वाली शैली सऊदी और यूएई के दोनों प्रिंस पसंद करते हैं। नरेंद्र मोदी को सऊदी अरब, यूएई और बहरीन ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाज़ा था। दो साल पहले पीएम मोदी ने जब अबूधाबी एयरपोर्ट पर लैंड किया तो यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान अगवानी में पहले से ही खड़े थे। यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान का पीएम मोदी के स्वागत में एयरपोर्ट पर खड़ा रहना प्रोटोकॉल के ख़िलाफ़ था और उन्होंने इसे भारतीय प्रधानमंत्री के लिए तोड़ा था।
चन्द्रबाबू नायडू प्रधानमंत्री मोदी की खाड़ी देशों से मजबूत सम्बन्धों और उनकी बेहतर छवि के कायल हो सकते है लेकिन उनका जायका इजराइल को लेकर मोदी का विशेष अनुराग बिगाड़ सकता है। मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने इसराइल का दौरा किया था। जुलाई 2017 में,मोदी तेल अवीव की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे और खुद इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया था। आलोचना के बावजूद इस दौरान मोदी इजरायल की यात्रा के दौरान फिलिस्तीन नहीं गए थे। इसे भारतीय विदेश नीति में क्रांतिकारी बदलाव की तरह लिया गया था।
मोदी सरकार ने भारत इजराइल संबंधों के आयाम ही बदल दिए है। 2018 में, नेतन्याहू की भारत यात्रा के दौरान मोदी सरकार ने नई दिल्ली में प्रतिष्ठित तीन मूर्ति चौक का नाम बदलकर तीन मूर्ति हाइफ़ा चौक रख दिया। हाइफ़ा इजरायल का एक शहर है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए इज़राइल के हाइफा शहर को आज़ाद कराया था। भारतीय सैनिकों की टुकड़ी ने तुर्क साम्राज्य और जर्मनी के सैनिकों से मुकाबला किया था। माना जाता है कि इज़राइल की आज़ादी का रास्ता हाइफा की लड़ाई से ही खुला था।
प्रधानमंत्री मोदी ने अरब से रिश्ते मज़बूत करने के लिए इजरायल की उपेक्षा नहीं की। मोदी सरकार ने इजरायल और खाड़ी के देशों के साथ कई स्तरों पर आर्थिक और रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाया। पिछले साल इजराइल पर हमास के हमलें के कुछ घंटों बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विट कर कहा की मुश्किल घड़ी में भारत इजराइल के साथ खड़ा है। इजरायल और फ़लीस्तीनी क्षेत्र का विवाद भारत की आज़ादी से भी पुराना है और भारत हमेशा से अरब देशों का हिमायती रहा था। अरब देश अलग फ़लीस्तीनी की मांग उठाते रहे है पर अब भारत इस मामलें को लेकर उदारता दिखा रहा है। भारत और इज़राइल रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में काफ़ी सहयोग कर रहे हैं। इसके तहत हथियारों की ख़रीद फ़रोख़्त,सेनाओं के बीच तालमेल और आतंकवाद से मुक़ाबले में सहयोग शामिल है। पिछले एक दशक के दौरान भारत,इज़राइल में बने हथियारों का सबसे बड़ा ग्राहक बन गया है और इस मामले में उसने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है जो पश्चिमी एशिया में इज़राइल का मुख्य सहयोगी है। इज़राइल के सेंसर,हेरोन ड्रोन,हाथ में पकड़कर चलाए जा सकते वाले थर्मल इमेजिंग के उपकरणों और रात में देखने में मदद करने वाले औज़ारों ने भारत को नियंत्रण रेखा के उस पार से घुसपैठ रोकने और कश्मीर घाटी में आतंकवाद के ख़िलाफ़ अभियानों में काफ़ी मदद दी है। भारत,इज़राइल से जो हथियार ख़रीदता है,उनमें मानवरहित विमान,मिसाइलें और रडार सिस्टम का दबदबा है।
इजराइल और हमास के बीच फ़लीस्तीनी क्षेत्र में भीषण युद्द चल रहा है। इजराइल पर इस युद्द में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे है। वैश्विक आलोचनाओं के बाद भी इजराइल का अभियान थमता दिखाई नहीं दे रहा है। वह बंधकों की वापसी तक युद्धविराम भी नहीं चाहता। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के विरोध के प्रस्तावों पर भारत ने अब तक दूरी बनाई हुई है। भविष्य में इजराइल के खिलाफ किसी वैश्विक प्रस्ताव पर मोदी सरकार की आगामी नीतियां भारत की वैदेशिक नीतियों की दिशा भी तय करेगी। इसका असर भारत अमेरिकी सम्बन्धों पर भी निश्चित ही पड़ेगा। इस गठबन्धन सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ध्यान में नेपोलियन का वह कथन अवश्य होगा की,आवश्यकता ने कभी अच्छा सौदा नहीं किया। अंततः राजनीतिक साझेदारियां अस्थाई होती है जबकि विदेश नीति को निरन्तरता की दरकार होती है।