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बंगाल से तय होगी भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा

 राष्ट्र्वार्ता

        

शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बनी नई पश्चिम बंगाल सरकार के सामने अवैध घुसपैठ,सीमा सुरक्षा,अवैध प्रवासियों की पहचान और निष्कासन तथा तीस्ता नदी के जल बंटवारे जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक विषय बनने जा रहे है। ये केवल राज्य की आंतरिक प्रशासनिक चुनौतियां नहीं है,बल्कि भारत और बांग्लादेश के संबंधों की दिशा तय करने वाले रणनीतिक प्रश्न भी हैं।

पश्चिम बंगाल की लगभग पूरी पूर्वी सीमा बांग्लादेश से जुड़ी हुई है। यह सीमा ऐतिहासिक,सांस्कृतिक और भाषाई रूप से अत्यंत संवेदनशील रही है। विभाजन के बाद से ही सीमापार आवागमन,शरणार्थियों का आगमन और अवैध प्रवेश बंगाल की राजनीति का हिस्सा रहे है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन का विषय भी बन गया है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से यह मुद्दा उठाती रही है कि सीमापार से होने वाली अवैध घुसपैठ ने राज्य की सामाजिक संरचना,रोजगार,भूमि और सरकारी संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। भाजपा का यह भी आरोप रहा है कि वोट बैंक की राजनीति के कारण इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब जबकि राज्य में भाजपा के नेतृत्व में पहली बार और नई सरकार बनी है,यह संभावना  बढ़ गई है कि सीमा प्रबंधन को अधिक कठोर बनाया जाएगा। सीमावर्ती जिलों में निगरानी,पहचान पत्रों की जांच,अवैध निवासियों की पहचान और निष्कासन की प्रक्रिया तेज हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ेगा।

अवैध प्रवासियों के निष्कासन का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील है। इसको लेकर बांग्लादेश के राजनीतिक और कट्टरपंथी समूह मुखर होते रहे है। अर्थात् यदि बंगाल की सरकार इस पर सख्त रुख दिखाती है तो  इससे मानवाधिकार संगठनों,न्यायपालिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। वहीं बांग्लादेश की सरकार बड़े पैमाने पर अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के दावों को स्वीकार नहीं करती। इसी कारण पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे स्थापित करते हैं। इन सबके साथ तीस्ता नदी के जल बंटवारे का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग और क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में रही है। बांग्लादेश के उत्तरी क्षेत्रों की कृषि काफी हद तक तीस्ता के जल पर निर्भर करती है। इसलिए ढाका लंबे समय से भारत के साथ स्थायी जल समझौते की मांग करता रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल की सरकारों ने अब तक इस समझौते पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। पश्चिम बंगाल में माना जाता है की कि यदि अधिक जल बांग्लादेश को दिया गया तो उत्तर बंगाल के किसानों और स्थानीय जल आवश्यकताओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।  ममता बनर्जी ने भी कई बार इसी आधार पर तीस्ता समझौते पर आपत्ति जताई थी। अब यह देखना  दिलचस्प होगा कि शुभेंदु अधिकारी सरकार इस विषय पर क्या नीति अपनाती है। यदि नई सरकार केंद्र सरकार के साथ मिलकर तीस्ता समझौते को आगे बढ़ाती है,तो भारत और बांग्लादेश के संबंध और मजबूत हो सकते हैं। इससे व्यापार,संपर्क मार्ग,सीमा प्रबंधन और पूर्वोत्तर भारत की रणनीतिक परियोजनाओं को भी लाभ मिल सकता है। दक्षिण एशिया में चीन लगातार अपने आर्थिक और सामरिक प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है,ऐसे में भारत के लिए बांग्लादेश के साथ स्थिर और सहयोगपूर्ण संबंध बनाएं रखना जरुरी है,वहीं तीस्ता को लेकर शुभेंदु अधिकारी का कोई निर्णायक कदम राज्य के नागरिकों के लिए अप्रिय हो सकता है,अत: उनके लिए किसी राजनीतिक निर्णय पर पहुंचना आसान नहीं होगा।

पश्चिम बंगाल भारत की पूर्वी सुरक्षा,सीमाई राजनीति और दक्षिण एशियाई कूटनीति का केंद्रीय क्षेत्र बन चुका है। अवैध घुसपैठ,सीमा सुरक्षा,निष्कासन और तीस्ता जल बंटवारा जैसे मुद्दे बंगाल और भारत की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण विषय है। भारत और बांग्लादेश के स्थिर संबंध दक्षिण एशिया की सामरिक और आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग से सीमाई सुरक्षा, आतंकवाद नियंत्रण, अवैध घुसपैठ रोकने और पूर्वोत्तर भारत की संपर्क व्यवस्था को मजबूती मिलती है। बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों की स्थिरता भी इन संबंधों पर निर्भर करती है। यदि दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो इसका लाभ चीन जैसी बाहरी शक्तियां उठा सकती हैं। इसलिए भारत और बांग्लादेश के बीच विश्वास,जल बंटवारा, व्यापार और सुरक्षा सहयोग केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की शांति और संतुलन का आधार है। अब देखना होगा की शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल की आंतरिक राजनीति में खुद को मजबूत करते हुए भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक संबंधों को किस ओर ले जायेंगे। इससे यह भी तय होगा की  भारत और बांग्लादेश सहयोग,विश्वास और स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ते है या दोनों देशों के बीच तनाव और संदेह की राजनीति अधिक गहरी होती है।

 

 

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