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भारत के लिए जी-7 महत्वपूर्ण है या ब्रिक्स

  दैनिक नवसंदेश,पटना          

                                                                                                                                             

जी-7 में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान शामिल है। यूरोपीय संघ भी इसकी बैठकों में पूर्ण भागीदार के रूप में शामिल होता है। भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, फिर भी उसे विभिन्न बैठकों में अतिथि देश के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है। भारत के लिए जी-7 की उपयोगिता इसलिए अधिक है, इसके सदस्य देशों के साथ उसके व्यापक आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध है। जी-7 में भारत का किसी सदस्य देश के साथ सीमा विवाद या प्रत्यक्ष भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं है। इसलिए यहां भारत की प्राथमिकता साझेदारी और सहयोग बढ़ाने की रहती है। व्यापार, निवेश, तकनीक, ऊर्जा, आपूर्ति-श्रृंखला, रक्षा, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था जैसे विषयों पर भारत इन देशों के साथ मिलकर काम कर सकता है। भारत के लिए यह विकसित अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ने और अपनी आर्थिक क्षमता को व्यापक वैश्विक बाजार से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है।

जी-7 के देशों में अमेरिका का महत्व सबसे व्यापक है। अमेरिका भारतीय वस्तुओं और सेवाओं का बड़ा बाजार है। औषधि, अभियांत्रिकी उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वस्त्र और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं में भारत की बड़ी उपस्थिति है। निवेश और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में भी दोनों देशों के संबंध महत्वपूर्ण है। भारत के लिए अमेरिका के साथ संबंधों का महत्व व्यापार के आंकड़ों से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, रक्षा और आपूर्ति-श्रृंखला तक जाता है। जापान भारत के लिए पूंजी, तकनीक, विनिर्माण, अवसंरचना और औद्योगिक निवेश का महत्वपूर्ण साझेदार है। जर्मनी के साथ मशीनरी, वाहन, रसायन, अभियांत्रिकी और हरित तकनीक के क्षेत्र में सहयोग है। फ्रांस के साथ रक्षा, विमानन, अंतरिक्ष, ऊर्जा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में संबंध महत्वपूर्ण हैं। ब्रिटेन के साथ वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी, औषधि, वस्त्र और पेशेवर सेवाओं में व्यापक संभावनाएं है। इटली के साथ मशीनरी, अभियांत्रिकी, विनिर्माण, चमड़ा और वस्त्र क्षेत्र महत्वपूर्ण है। कनाडा के साथ कृषि उत्पाद, दालें, ऊर्जा, खनिज और निवेश के क्षेत्र में संबंध है। इस प्रकार जी-7 भारत को विकसित दुनिया के बाजार, पूंजी और तकनीक से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मंच है। भारत की अर्थव्यवस्था को उच्च तकनीक, उन्नत विनिर्माण और वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं से जोड़ने में इन देशों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

ब्रिक्स का स्वरूप इससे अलग है। भारत इसके संस्थापक सदस्यों में है और चीन भी इसका प्रमुख सदस्य है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, क्षेत्रीय प्रभाव और वैश्विक व्यवस्था को लेकर मतभेद है। इसलिए ब्रिक्स में भारत की स्थिति सहयोग और प्रतिस्पर्धा, दोनों के बीच संतुलन साधने की मांग करती है। ब्रिक्स भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे माल, नए बाजार और वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग का महत्वपूर्ण मंच है। रूस भारत के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। चीन औद्योगिक वस्तुओं, मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक सामान की आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। पश्चिम एशिया के सदस्य देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार और निवेश संबंध भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। ब्रिक्स के विस्तार ने भारत के लिए अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका के बाजारों तक पहुंच के अवसर भी बढ़ाए है। पर ब्रिक्स के साथ भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती व्यापार असंतुलन है। भारत ब्रिक्स देशों से बड़ी मात्रा में आयात करता है और उसके मुकाबले निर्यात कम है। चीन के साथ यह अंतर विशेष रूप से बड़ा है। ऐसे में ब्रिक्स के भीतर व्यापार बढ़ना तभी भारत के लिए अधिक उपयोगी होगा जब भारतीय उत्पादों के लिए इन बाजारों में पहुंच बढ़े और व्यापार घाटा नियंत्रित हो।

चीन का प्रभाव ब्रिक्स की आंतरिक राजनीति को भी प्रभावित करता है। चीन समूह की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है और उसके पास व्यापक आर्थिक प्रभाव है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह चीन के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने हितों की रक्षा करे और ब्रिक्स को किसी एक शक्ति के प्रभाव वाला मंच बनने से रोकने में अपनी भूमिका निभाए। भारत ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण की आवाज और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए उपयोगी मंच के रूप में मजबूत करना चाहता है। ब्रिक्स भारत के लिए बड़ा व्यापारिक क्षेत्र बन चुका है, पर इसके साथ व्यापार असंतुलन की चुनौती भी जुड़ी हुई है। जी-7 के साथ भारत के व्यापार में स्थिति अलग है। यहां विकसित और उच्च क्रय क्षमता वाले बाजार भारत के लिए उपलब्ध है। भारतीय औषधि, अभियांत्रिकी उत्पाद, वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक सामान और सेवाओं के लिए इन देशों में बड़ा बाजार है। भारत के दीर्घकालीन आर्थिक हितों के लिए इन बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

यहीं जी-7 और ब्रिक्स के बीच भारत की रणनीतिक स्थिति स्पष्ट होती है। जी-7 में भारत का किसी सदस्य देश के साथ प्रत्यक्ष भू-राजनीतिक मुकाबला नहीं है। यहां साझेदारी, निवेश, तकनीक और बाजार की संभावनाएं प्रमुख है। ब्रिक्स में भारत को चीन के आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव के बीच अपने हितों का संतुलन साधना पड़ता है। भारत के लिए जी-7 विकसित अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ने का माध्यम है और ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर। जी-7 से भारत को पूंजी, तकनीक और उच्च मूल्य वाले बाजारों तक पहुंच मिलती है। ब्रिक्स से ऊर्जा सुरक्षा, नए बाजार और वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व की संभावनाएं मजबूत होती है।

भारत के लिए जी-7 और ब्रिक्स का महत्व आर्थिक और रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र, मानवाधिकार, विधि का शासन, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी जैसे मूल्यों के प्रश्न पर दोनों मंचों के बीच महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। भारत स्वयं एक बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इसलिए दीर्घकाल में उन देशों के साथ निकटता भारत के लिए स्वाभाविक महत्व रखती है, जहां लोकतांत्रिक संस्थाएं, राजनीतिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार है।

जी-7 के सदस्य देश विकसित लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं और उनके बीच लोकतंत्र, मानवाधिकार तथा विधि के शासन जैसे विषयों पर व्यापक वैचारिक समानता दिखाई देती है। जी-7 के आधिकारिक दस्तावेजों में भी लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा को महत्व दिया गया है। भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, फिर भी उसके अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कनाडा के साथ व्यापक लोकतांत्रिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध है। ब्रिक्स की स्थिति अधिक जटिल है। वर्तमान ब्रिक्स में चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे ऐसे देश शामिल है, जिनकी राजनीतिक व्यवस्थाएं भारत की बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था से काफी अलग हैं। चीन और रूस को राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के मामले में अत्यधिक सीमित व्यवस्था है। ईरान में निर्वाचित संस्थाओं के साथ शक्तिशाली अनिर्वाचित संस्थाएं भी राजनीतिक व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाती है। सऊदी अरब में राष्ट्रीय स्तर पर निर्वाचित राजनीतिक व्यवस्था नहीं है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात में सीमित निर्वाचन व्यवस्था है और राजनीतिक दलों की अनुमति नहीं है।

दीर्घकालीन दृष्टि से राजनीतिक मूल्यों का प्रश्न नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं, नागरिक स्वतंत्रता, स्वतंत्र न्याय व्यवस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक बहुलता उसकी वैश्विक पहचान का हिस्सा है। ऐसे में लोकतांत्रिक देशों के साथ गहरे और स्थायी संबंध भारत के आर्थिक हितों के साथ उसके राजनीतिक और संस्थागत हितों से भी जुड़े है। यही कारण है कि भारत के लिए जी-7 का महत्व व्यापार और तकनीक से आगे बढ़कर साझा राजनीतिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्थागत अनुभवों तक पहुंचता है। ब्रिक्स भारत को वैश्विक दक्षिण और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ जोड़ता है, जबकि जी-7 भारत को उन विकसित लोकतंत्रों के साथ संवाद का अवसर देता है जिनके साथ उसके राजनीतिक मूल्यों में अधिक निकटता है।

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