नवभारत टाइम्स
भारत को बदलनी होगी अपनी समुद्री सुरक्षा रणनीति
हिन्द महासागर में आर-4 की दस्तक
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में दुनिया में समुद्री रणनीति के लिए ख्याति अर्जित करने वाले अमेरिकी नौसैनिक रणनीतिकार अल्फ्रेड थायर महान ने कहा था की जो हिन्द महासागर पर नियंत्रण रखेगा,वही एशिया पर प्रभाव स्थापित करेगा और जो एशिया को प्रभावित करेगा,वही विश्व व्यवस्था को दिशा देगा। यह कथन भारत की समुद्री सुरक्षा नीति के लिए भी बेहद अहम रहा है। हिन्द महासागर वैश्विक व्यापार,ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा,आर्थिक समृद्धि और वैश्विक रणनीतिक भूमिका इसी महासागर से जुड़ी हुई है। लेकिन बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच पाकिस्तान द्वारा तुर्किये,सऊदी अरब और मिस्र के साथ बनाए गए आर-4 परामर्श समूह ने हिन्द महासागर में भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियों की आशंका पैदा कर दी है। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा रणनीति को बदलने को मजबूर होना पड़ सकता है।

हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसके उत्तर में दक्षिण एशिया, पश्चिम में अफ्रीका,पूर्व में ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण में अंटार्कटिका स्थित है। यह महासागर पश्चिम में होर्मुज जलडमरूमध्य और से लेकर पूर्व में मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों को जोड़ता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा इन्हीं समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है। इसलिए हिन्द महासागर पर प्रभाव रखने वाला देश वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

भारत की लगभग सात हजार पांच सौ किलोमीटर लंबी तटीय सीमा,अंडमान-निकोबार तथा लक्षद्वीप जैसे सामरिक द्वीप समूह और हिन्द महासागर के मध्य में स्थित उसकी भौगोलिक स्थिति उसे स्वाभाविक समुद्री शक्ति बनाती है। भारत का लगभग पंचानवे फीसदी विदेशी व्यापार तथा लगभग अस्सी फीसदी कच्चे तेल का आयात समुद्री मार्गों से होता है। यही कारण है कि हिन्द महासागर भारत की ऊर्जा सुरक्षा,समुद्री व्यापार,आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है। भारत की समुद्री रणनीति अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है,बल्कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त एवं सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करना भी उसका प्रमुख उद्देश्य है।
अब पाकिस्तान ने आर-4 नामक एक नया समूह बनाया है जिसका प्रभाव भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस समूह में पाकिस्तान के साथ तुर्किये, सऊदी अरब और मिस्र शामिल हैं। यह सैन्य गठबंधन नहीं है लेकिन फिर भी रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा,सैन्य प्रशिक्षण और रणनीतिक समन्वय के क्षेत्र में इसकी संभावित भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि भविष्य में यह सहयोग नौसैनिक स्तर तक विस्तारित होता है, तो हिन्द महासागर के शक्ति-संतुलन पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
इन चारों देशों की भौगोलिक और सामरिक स्थितियां अलग अलग है लेकिन सामूहिक रूप से ये हिन्द महासागर में भारत की सामरिक बढ़त को बाधित कर सकते है। पाकिस्तान का अरब सागर तट,ग्वादर बंदरगाह और चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा उसे हिन्द महासागर की सामरिक राजनीति का प्रमुख खिलाड़ी बनाते है। चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति और ग्वादर का विकास भारत की सुरक्षा चिंताओं को पहले ही बढ़ा रहा है। तुर्किये हिन्द महासागर से सीधा जुड़ा हुआ नहीं है,लेकिन सोमालिया में उसका सैन्य अड्डा, अफ्रीका में बढ़ती सक्रियता तथा पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग उसे इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण बना देता है। सऊदी अरब विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा निर्यातकों में से है और उसका अधिकांश तेल हिन्द महासागर के समुद्री मार्गों से एशिया पहुँचता है। इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा उसके आर्थिक हितों से जुड़ी हुई है। वहीं मिस्र स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के कारण वैश्विक समुद्री व्यापार की धुरी है। इन मार्गों में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का प्रभाव भारत सहित पूरी विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। सऊदी अरब और मिस्र के भारत के साथ मजबूत आर्थिक,ऊर्जा और कूटनीतिक संबंध हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान और तुर्किये की भारत-विरोधी रणनीतिक निकटता तथा चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता को देखते हुए भारत के लिए सतर्क रहना आवश्यक है। भविष्य की चुनौती किसी एक समूह से अधिक,हिन्द महासागर में बढ़ती बहुध्रुवीय प्रतिस्पर्धा से है।
भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा रणनीति में कई स्तरों पर बदलाव करने होंगे। भारतीय नौसेना का तीव्र आधुनिकीकरण, विमानवाहक पोतों, पनडुब्बियों, लंबी दूरी की समुद्री निगरानी प्रणाली तथा मानव रहित समुद्री प्रणालियों की क्षमता बढ़ानी होगी। अंडमान-निकोबार कमान और लक्षद्वीप की सामरिक उपयोगिता को और मजबूत करना होगा, जिससे मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर अरब सागर तक प्रभावी निगरानी रखी जा सके। भारत को आधुनिक तकनीक, उपग्रहों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से समुद्र में होने वाली हर गतिविधि पर चौबीसों घंटे प्रभावी निगरानी रखने की क्षमता विकसित करनी होगी,जिससे किसी भी सुरक्षा खतरे का समय रहते पता लगाकर उसका सामना किया जा सके।
हिन्द महासागर में भारत की सामरिक बढ़त भौगोलिक स्थिति के साथ हमारी सुदृढ़ नौसैनिक अवसंरचना, द्वीपीय ठिकानों और मित्र देशों के साथ विकसित रणनीतिक साझेदारियों पर भी आधारित है। भारत के प्रत्यक्ष सैन्य अड्डे घरेलू क्षेत्र में स्थित हैं, जबकि विदेशों में उसने स्थायी सैन्य अड्डों के बजाय लॉजिस्टिक सहयोग, बंदरगाह पहुँच, हवाई सुविधाओं और तटीय निगरानी नेटवर्क का व्यापक तंत्र विकसित किया है। यह मॉडल भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय सहयोग की नीति के अनुरूप है।
भारत की समुद्री सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र अंडमान एवं निकोबार कमान है, जो पोर्ट ब्लेयर में स्थित देश की एकमात्र त्रि-सेवा कमान है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण यह कमान पूर्वी हिन्द महासागर में भारत की सामरिक शक्ति का सबसे बड़ा आधार है। लक्षद्वीप,कारवार,कोच्चि और विशाखापत्तनम जैसे नौसैनिक अड्डे अरब सागर, दक्षिणी समुद्री क्षेत्र और बंगाल की खाड़ी में भारत की परिचालन क्षमता को सुदृढ़ बनाते हैं। कारवार स्थित आईएनएस कदंब भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक और बड़े अड्डों में शामिल है। भारत ने मित्र देशों के सहयोग से हिन्द महासागर में अपनी रणनीतिक पहुँच का भी विस्तार किया है। मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर विकसित हवाई पट्टी और जेटी भारतीय नौसेना तथा वायुसेना की परिचालन क्षमता को पश्चिमी हिन्द महासागर तक विस्तारित करती हैं। ओमान के दुक्म बंदरगाह तक भारत की पहुँच फारस की खाड़ी,अरब सागर और अफ्रीका के पूर्वी तट पर समुद्री गतिविधियों की निगरानी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त मालदीव, मॉरीशस, मेडागास्कर और सेशेल्स में स्थापित तटीय रडार नेटवर्क भारत की समुद्री डोमेन जागरूकता को मजबूत बनाते है और समुद्र में होने वाली गतिविधियों की वास्तविक समय में निगरानी संभव करते है।
आर-4 से मुकाबला करने के लिए कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर भी सक्रिय रहना होगा। हिन्द महासागर में बदलते सामरिक समीकरणों के बीच भारत के लिए क्वाड को और सशक्त बनाना आवश्यक है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच समुद्री सुरक्षा, संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, रक्षा सहयोग और समुद्री निगरानी बढ़ाकर संतुलन बनाएं रखना होगा ,जिससे भारत के सामरिक हितों और समुद्री सुरक्षा को मजबूती मिल सकती है। आसियान, फ्रांस, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान तथा अफ्रीकी तटीय देशों के साथ समुद्री सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में कदम उठाने होंगे। हिन्द महासागर क्षेत्र के छोटे द्वीपीय देशों के साथ विकास, सुरक्षा और क्षमता निर्माण के कार्यक्रमों को गति देकर भारत को अपने पारंपरिक प्रभाव को बनाएं रखना होगा। बदलते सामरिक परिवेश में भारत को अपनी समुद्री उपस्थिति और अधिक व्यापक बनानी होगी। इसके लिए फ्रांस,जापान,दक्षिण कोरिया तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदारों के साथ लॉजिस्टिक सहयोग समझौतों का प्रभावी उपयोग आवश्यक है। फ्रांस के रीयूनियन द्वीप, अमेरिका की सुविधाओं तथा हिन्द महासागर क्षेत्र के अन्य मित्र देशों के बंदरगाहों तक नियमित पहुँच भारत की परिचालन क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती है।
भारत को सेशेल्स के अजंपशन द्वीप, इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह, वियतनाम तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों के साथ समुद्री सहयोग को भी नई गति देनी होगी। इससे हिन्द महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य तक भारत की रणनीतिक पहुँच और निगरानी क्षमता मजबूत होगी। साथ ही ग्रेट निकोबार और कार निकोबार में एयरफील्ड, नौसैनिक जेटी, पनडुब्बी अड्डों तथा आधुनिक सैन्य अवसंरचना के विकास को प्राथमिकता देना आवश्यक है। इसके लिए भारत को स्वदेशी नौसैनिक शक्ति में ज्यादा और निरंतर निवेश करना होगा। विमानवाहक पोत, परमाणु पनडुब्बियां , लंबी दूरी के समुद्री टोही विमान, मानव रहित समुद्री प्रणालियां तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित समुद्री निगरानी तंत्र भविष्य की समुद्री सुरक्षा के प्रमुख आधार होंगे। आने वाले वर्षों में हिन्द महासागर वैश्विक शक्ति-प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना रहेगा। चीन की विस्तारवादी समुद्री नीति, पाकिस्तान की सामरिक सक्रियता तथा आर-4 जैसे उभरते क्षेत्रीय मंच इस महासागर के शक्ति-संतुलन को नई दिशा दे सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में भारत के लिए केवल अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि हिन्द महासागर में अपने दीर्घकालिक सामरिक, रणनीतिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा।
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