अतिवादी राजनीति से अभिशिप्त आंतरिक सुरक्षा- हस्तक्षेप ,राष्ट्रीय सहारा

अतिवादी राजनीति के बीच क्या सुशासन स्थापित किया जा सकता है,भारत में यह सवाल बहुत पुराना है। आज़ाद भारत में विभिन्नता का सम्मान करते हुए एकता कायम करने की संविधानिक कोशिशों के साथ सियासी चक्रव्यूह भी बुने गए है। देश की एकता और अखंडता को चोट पहुँचाने का सवाल किसी क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित न हो होकर,इसका प्रभाव देश के अलग अलग स्थानों पर देखा गया है और यह समस्या कभी भी खत्म न होकर बदस्तूर जारी है। रोजगार की तलाश में कई सालों तक दुबई में रहने वाला पंजाबी युवा अमृतपाल सिंह कुछ समय पहले भारत आकर पृथकतावादी ताकतों को लामबंद करने की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा रहा है। वह पृथक सिख होमलैंड के बेहद संवेदनशील विषय को उभार कर जनसमर्थन हासिल करना चाहता है और आश्चर्यजनक रूप से उसे यह समर्थन मिलता भी दिखाई दे रहा है। अमृतपाल सिंह ने अपने एक साथी को थाने से छुड़ाने के लिए हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया। इस दौरान हथियार लहराते हुए हिंसक भीड़ से पुलिसकर्मी घायल भी हो गए। इस घटना के बाद भी अमृतपाल सिंह क़ानूनी शिकंजे से दूर है और उसे सरकार की और से कोई चुनौती मिलती हुई दिखाई भी नहीं दे रही है।
दरअसल अपराधियों,अलगाववादी ताकतों और आतंकियों को सत्ता द्वारा किसी भी प्रकार से ढील दिया जाना कितना घातक हो सकता है,इसके परिणाम देश ने बहुत देखे और भोगे है। फिर चाहे सिख अतिवाद के कारण इंदिरा गांधी की हत्या हो या बेअंतसिंह की हत्या। तमिलनाडू में राजीव गांधी के हत्यारों की सजा माफ़ करने के पक्ष में सत्ता की लामबंदी के दूरगामी परिणाम अंततः समूचे देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती देते हुए नजर आते है।
विशाल संरचना और संघात्मक शासन व्यवस्था वाले भारत के किसी भी क्षेत्र में सत्ता या किसी संगठन द्वारा अतिवाद का पालन पोषण समस्या का कारक बनता रहा है। खासकर पंजाब और जम्मू कश्मीर को लेकर इस संबंध में कानून और व्यवस्था की दृष्टि से बेहद सतर्कता की जरूरत होती है। पंजाब में खालिस्तान की आग के शांत होने के करीब दो दशक के बाद पुनःइस आंदोलन ने हाल ही में जिस प्रकार जोर पकड़ा है,वह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। खालिस्तान से जुड़े नेताओं को न केवल देश में,पर विदेश में भी समर्थन मिल रहा है और वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए संसद में भी पहुंचने में कामयाब हो रहे है।
पिछले साल पंजाब की संगरूर लोकसभा सीट से उपचुनाव में शिरोमणि अकाली दल अमृतसर के नेता सिमरनजीत सिंह मान विजयी हुए और वे देश की संसद में पहुंचने में कामयाब हो गए। यह वहीं शख्स है जिन्होंने 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में आईपीएस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था। 1994 में मान ने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई और फिर ये भड़काऊ भीड़ के बूते सत्ता के गलियारों की जरूरत बन गए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या समेत कई हिंसक कार्रवाइयों में इन्हें संदिग्ध माना गया और पांच साल की सजा हुई। अब सिमरनजीत सिंह संसद के एक माननीय सदस्य है। मान की पहचान एक कट्टर सिख नेता की है,जो खालिस्तान की बात अक्सर करते हैं।
खालिस्तान सिखों के लिए एक संप्रभु राष्ट्र की परिकल्पना है। मान से लेकर अमृतपाल, सब इसके पैरोकार बनते रहे है। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान खालिस्तान के कट्टर समर्थक नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले को भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया था। अमृतपाल सिंह उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर खालिस्तान के पक्ष में,वारिस पंजाब दे संगठन के बूते भारतीय एकता और अखंडता को चुनौती दे रहे है। वारिस पंजाब दे संगठन,किसान आंदोलन के दौरान चर्चा में आया था और अब वह सिख होमलैंड के नाम पर भारी जनसमर्थन जुटाने में कामयाब हो गया है। अमृतपाल सिंह ही इसके प्रमुख है।
कथित स्वयम्भू सिख नेता अमृत पाल सिंह ने खालिस्तानी आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले के पैतृक स्थान पंजाब के मोगा ज़िले के रोडे गाँव में दस्तार बंदी समारोह आयोजित किया। यहां हजारों लोग पहुंचे और कथित तौर पर खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए। यह भी दिलचस्प है कि पिछले साल पंजाब में आप की सरकार के सत्ता में आने के बाद खालिस्तानी आंदोलन और हिंदू-सिख धर्मावलम्बियों के बीच टकराव की घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। अमृतसर के एक पुलिस थाने पर भीड़ के हमलें और कई पुलिसकर्मियों के घायल होने के बाद भी राज्य सरकार का वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए मूकदर्शक बने रहना,देश की आंतरिक सुरक्षा के संकट को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
लोकतंत्र को सुशासन की गारंटी माना जाता है लेकिन इसकी दूसरी हकीकत यह भी है कि यहां नेताओं के समर्थन के बूते हथियारबंद गिरोह काम करते है जो धर्म,आध्यात्म,भाषा,क्षेत्र और जातीय मुद्दों के बूते एक भीड़ तंत्र विकसित कर लेते है। ये लोग देश की आंतरिक शांति को भंग करने की कोशिशें करने लगते है। अमृतपाल सिंह या रामपाल कानून को चुनौती देने की जुर्रत बिना राजनीतिक समर्थन के नहीं कर सकते। 2014 में हरियाणा के बरवाला के सतलोक आश्रम के बाबा रामपाल को एक हत्या के मामलें में गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची तो बाबा के हथियार बंद गिरोह से जिस प्रकार पुलिस को कई दिनों तक जूझना पड़ा था,वह देश की कानून व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा था।
आध्यात्म के नाम पर मजबूत दीवारों के बीच बाबा की दुनिया इतनी विशाल और खौफनाक थी की हरियाणा पुलिस और सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के संयुक्त अभियान के बाद रामपाल को गिरफ़्तार करने में सफलता मिल सकी थी। पुलिस के मुताबिक पुलिस मानव चेन बनकर आश्रम के अंदर पहुंची और रामपाल को पकड़ने में कामयाब हुई। उस समय हिसार ज़िला अदालत में उनके समर्थकों ने काफ़ी हुड़दंग मचाया था और उनके चालीस हज़ार समर्थकों ने चंडीगढ़ में रेलवे स्टेशन को ठप कर दिया था। पुलिस जब बाबा को गिरफ्तार करने पहुंची तो गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे रामपाल के समर्थक हिसार के बरवाला कस्बे में स्थित सतलोक आश्रम के चारों ओर मानव श्रृंखला बनाकर बैठ गए थे,युवा समर्थकों ने हेलमेट पहन रखा है और उनके हाथों में लाठियां थी। इन सबके बाद भी स्थानीय स्तर पर लोगों और राजनेताओं का समर्थन बाबा को हासिल था और इसमें कभी कोई कमी नहीं आई।
भारत में राष्ट्र से ज्यादा क्षेत्रीय और स्थानीय हितों वाली राजनीति हावी रही है और इसी का परिणाम है कि राजनीतिज्ञों का ध्यान जनसमर्थन हासिल करने पर होता है। इसके लिए वे किसी भी स्तर पर जाकर किसी भी व्यक्ति या संस्था को समर्थन देने से नहीं चूकते है। पूर्वोत्तर में कई अलगाववादी संगठन काम करते है और स्थानीय राजनीति उनसे प्रभावित रहती है। उल्फा जैसे अलगाववादी और हिंसक संगठनों का उभार राजनीति से ही प्रेरित रहा है। जम्मू कश्मीर के क्षेत्रीय दलों द्वारा आतंकी संगठनों को समर्थन,आतंकियों को मिलने वाले जनसमर्थन की ही परिणिति है। महाराष्ट्र में पहले शिवसेना और बाद में महाराष्ट्र नवनिर्माण पार्टी द्वारा हिंदी भाषियों को निशाना बनाया गया लेकिन इन दोनों दलों के नेताओं पर कभी भी कड़ी कार्रवाई नहीं की गई।
जाहिर है, धर्म,जाति,क्षेत्र और भाषा के नाम पर पनपने वाले स्वयम्भू गुरु,नेता और संगठन,सत्ता के संरक्षण से फलते फूलते रहे है। इससे देश के अलग अलग क्षेत्रों में अशांति उत्पन्न होती है और आंतरिक सुरक्षा के लिए संकट बढ़ता है। अलग अलग स्तरों पर मिलने वाला सत्ता का यह समर्थन इतना व्यापक है कि खालिस्तान,नक्सलवाद,कट्टरतावाद,अलगाववाद और आतंकवाद पोषित होता है,स्थापित रहता है और आंतरिक सुरक्षा का संकट गहराता रहता है।

