राष्ट्रीय सहारा
दुनिया के अलग अलग क्षेत्रों में वैधानिक सत्ता के खिलाफ हिंसक संघर्ष करने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों को वार्ता की मेज पर बिठा लेने में माहिर क़तर की वैदेशिक नीतियां विरोधाभासों से घिरी हुई रही है। यही कारण है की 2017 में, सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,मिस्र और बहरीन ने,उस पर ईरान के क़रीब होने और अल जज़ीरा के माध्यम से क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाते हुए उसके साथ संबंध तोड़ दिए थे। दुनिया के सम्पन्न राष्ट्रों में शुमार साढ़े तीन लाख आबादी वाले इस देश में तालिबान और हमास जैसे आतंकी संगठनों के कार्यालय भी मिल जायेंगे,वहीं अल जजीरा जैसे चैनल के माध्यम से खाड़ी देशों की जनता को भ्रमित करने की कोशिशें भी दिख जाएगी। यह वहीं अल जजीरा है,जिसनें दुनिया को धमकाने के लिए पहली बार चरमपंथियों को लोगों का सिर काटते हुए दिखाया था।
दरअसल कतर में आठ भारतीय पूर्व नौसैनिकों को पिछलें साल सितम्बर में बंदी बनाने और उन्हें मौत की सजा सुनाने के मामले में कतर सरकार की भारत को लेकर जो नीतियां नजर आई है,वह अविश्वसनीय है। छल,कपट,द्वेष और प्रतिद्वंदिता की कूटनीति दुश्मन देशों के बीच तो सकती है,लेकिन कतर से इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। कतर और भारत के आर्थिक और राजनीतिक सम्बन्ध बेहतर रहे है लेकिन उसका भारत के पूर्व नौसैनिकों को लेकर किया गया व्यवहार बेहद असंगत नजर आता है। सितंबर 2022 में क़तर सरकार ने आठ पूर्व भारतीय नौसैनिकों को गिरफ़्तार करने की सूचना भारत सरकार को नहीं दी गई थी। यह समूचा मामला एक ट्विट के बाद संज्ञान में आया। जिन भारतीयों को कतर सरकार ने बंदी बनाया वे भारतीय नौ सेना के जिम्मेदार,बेदाग और रिटायर्ड अधिकारी थे। इन पूर्व नौसैनिकों पर आरोप है कि उन्होंने कथित तौर पर अति उन्नत इतावली पनडुब्बी को ख़रीदने से संबंधित क़तर के ख़ुफ़िया कार्यक्रम के बारे में इसराइल को जानकारी दी थी।
यह भी दिलचस्प है की अमानवीय कृत्यों के लिए कुख्यात आतंकियों और उनके संगठनों से बातचीत की हिमायत करने वाले कतर ने भारतीय नौसैनिकों को लेकर कैदियों के अंतराष्ट्रीय नियमों का पालन भी नहीं किया। न्याय को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई और न ही सूचनाएं साझा की गई। खाड़ी के देशों में न्याय को लेकर विभिन्न सरकारों का नजरियां मध्ययुगीन रहा है और संभवतः इसीलिए सम्पन्न होने के बाद भी यह इलाका हिंसा और रक्तपात से कभी उभर ही नहीं पाता है।
मध्यस्थता के रूप में वैश्विक पहचान बना चूके कतर ने भारत जैसे महान लोकतंत्र के नागरिकों को जिस प्रकार निशाना बनाने की कोशिश की है,उससे एक बार फिर यह साफ हो गया की इस देश की मानवाधिकारों को लेकर वैश्विक आलोचना क्यों होती है। क़तर दुनिया के सबसे धनी देशों में शामिल है और यहां गरीबी पर सार्वजनिक चर्चा करने को अपराध माना जाता है। मुख्य रूप से तेल और गैस से मिलने वाली आय के कारण क़तर का सकल घरेलू उत्पाद 180 अरब डॉलर का है। यही कारण है कि दसियों लाख अप्रवासी मज़दूर यहां के रेगिस्तान में बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए आकर्षित होते हैं।
इन कामगारों की ग़रीबी को छुपाने के लिए इन्हें अलग-थलग और बहुत दुर्गम को जगहों पर रखा जाता है। क़तर की सरकार ने फीफा विश्व कप के लिए स्टेडियमों को बनाने के लिए तीस हजार विदेशी कामगारों को काम पर रखा गया था। इनमें से अधिकांश बांग्लादेश,भारत,नेपाल और फ़िलीपींस से थे । विश्वकप की तैयारी के दौरान मरने वाले कामगारों की संख्या को लेकर काफ़ी विवाद रहा है। क़तर में स्थित तमाम देशों के दूतावासों से मिले आंकड़े बताते हैं कि साल 2010 में जबसे वर्ल्ड कप की मेज़बानी क़तर को सौंपी गई,तबसे भारत,पाकिस्तान,नेपाल,बांग्लादेश और श्रीलंका के साढ़े छह हजार कामगारों की मौत हुई। जबकि कतर ने इसे भ्रामक बताया था। महिलाओं को लेकर भी इस देश में बेहद क्रूर व्यवहार अपनाया जाता है। यहां पर महिलाओं अपनी ज़िंदगी के हर ज़रूरी और अहम फ़ैसले के लिए अपने पुरुष गार्जियन की लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होता है। अगर आपके पास ये अनुमति नहीं है तो आप फ़ैसला नहीं ले सकते हैं,चाहे फिर ये कॉलेज में दाख़िला लेना है, विदेश में पढ़ना हो,शादी करनी हो या फिर तलाक़ लेना हो।
हालांकि भारतीय नौसैनिकों को लेकर कतर के अमानवीय दृष्टिकोण के साथ साथ उसकी इस्लामिक देशों में बढ़त बनाने की कूटनीति से भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व को सऊदी अरब,ईरान और तुर्की के बीच कड़ी प्रतिद्वंदिता चलती रही है लेकिन कतर ने गृह युद्द से जूझते इस्लामिक देशों में अपनी जो पहचान बनाई है,वह उसकी कुटिलता को सामने लाती है। क़तर ने 2008 में यमन की सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच मध्यस्थता की। 2008 में लेबनान के युद्धरत गुटों के बीच वार्ता में मध्यस्थता की,जिसके बाद वहां 2009 में गठबंधन की सरकार बनी। 2009 में ही सूडान और चाड के बीच विद्रोहियों के मुद्दे पर बातचीत में भाग लिया। जिबूती और इरिट्रिया के बीच सीमा पर सशस्त्र संघर्ष के बाद कतर की मध्यस्थ की भूमिका के साथ 2011 में सूडान की सरकार और विद्रोही समूह के बीच दारफ़ूर समझौता कराया,जिसे दोहा समझौता भी कहा जाता है। 2012 में हमास और फ़तह समूहों के बीच भी,शांति और अंतरिम सरकार बनाने के समझौते में क़तर की अहम भूमिका थी और इस समझौते पर भी हस्ताक्षर दोहा में ही किए गए थे। वहीं तालिबान और अमेरिका के बीच अफ़ग़ानिस्तान से वापसी का समझौता करवाकर भी कतर ने मिसाल कायम कर दी थी।
इस समय हमास और इजराइल में भीषण युद्द चल रहा है और भारत ने इजराएल का पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाते हुए खाड़ी देशों को भी चौंका दिया है। यह भारत की फिलिस्तीन नीति को लेकर पारम्परिक रुख से अलग बताया जा रहा है। कतर ने भारतीय अधिकारियों पर इजराएल के लिए जासूसी का आरोप लगाकर खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों की विश्वसनीयता का संकट खड़ा कर दिया है। कतर की भारत पर दबाव बनाने की यह कोशिश भी हो सकती है की वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इजराएल को गजा पर हमला करने से रोके। 2008-2009 के इज़राइल-गाजा संघर्ष को लेकर कतर ने अरब राज्यों और ईरान के एक आपातकालीन सम्मेलन की मेजबानी की थी। कतर और इजराएल के राजनयिक सम्बन्ध नहीं है। इजराइल,हमास को लेकर बेहद गुस्से में है। जाहिर है कतर, इजराइल के मित्र देश भारत पर मनौवैज्ञानिक दबाव डालने की कोशिश कर रहा है। भारत के लिए अपने नागरिकों को बचाना बड़ी चुनौती होगी वहीं यह कूटनीतिक बदलावों के लिए सबक भी हो सकता है।
कतर की कुटिलता, राष्ट्रीय सहारा

