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नेपाल में चीन का प्रभाव

दैनिक जागरण

 

                                                                   

ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव या जीएसआई,एशिया के सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की चीन की नई रणनीतिक पहल है। क्वाड जैसे सामरिक संगठनों  का प्रतिरोध करने और  वन बेल्ट वन परियोजना के सपने को साकार करने के लिए चीन एशिया के देशों को लामबंद करना चाहता है। जाहिर है चीन की पहली नजर नेपाल पर है जो वामपंथी प्रभाव से चीन का विश्वसनीय साझेदार बन गया है। भौगोलिक और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण नेपाल को लेकर   चीनी दु:स्वप्न इतना गतिशील रहा है की उसने हिमालय भेदकर भारत के राजनीतिक,आर्थिक और सामरिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण नेपाल को आर्थिक रूप से अपनी जद में ले लिया है।

चीन हमेशा से ही नेपाल के साथ विशेष सम्बन्धों का पक्षधर रहा है,तिब्बत पर कब्जे के बाद उसकी सीमाएं सीधे नेपाल से जुड़ गयी है। चीन की नेपाल नीति का मुख्य आधार था की नेपाल में बाह्य शक्तियां अपना प्रभाव न जमा सके जिससे तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सुरक्षा हो सके तथा नेपाल में भारत के प्रभाव को कम किया जाये। उसने नेपाल में अनेक परियोजनाएं आक्रामक ढंग से शुरू कर तिब्बत से सीधी सड़क भारत के तराई क्षेत्रों तक बनाया,रेल मार्ग नेपाल की कुदारी सीमा तक बनाया,नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक और सैनिक मदद से चीन का समर्थन और आम नेपालियों में उनके द्वारा भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशें रची गयी। इसके साथ ही  चीनी सामानों की नेपाल के रास्ते भारत में डम्पिंग,माओवादी हिंसा के जरिये नेपाल से आंध्र तमिलनाडू तक रेड कॉरिडोर में भारत को उलझाएं रखना,पाक की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई का नेपाल में लगातार गतिविधियां,तस्करी और आतंकवादियों का भारत में प्रवेश सुलभ हुआ है।

नेपाल मे चीन प्रभाव इतना गतिशील है कि वहां होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का 90 फ़ीसदी अकेले चीन से आता है,ये निवेश हाइड्रो-पॉवरस,सीमेंट,हर्बल मेडिसिन और टूरिज़्म के क्षेत्र में है।  यह भी दिलचस्प है की प्रचंड ने सत्ता मे आने के बाद कहा था की वे नेपाल को केंद्र में रखकर दुनिया के देशों के साथ अपने संबंध बनाएंगे। प्रचंड की प्राथमिकता चीन के हितों का संवर्धन करना है जिसमें भारत के साथ अमेरिकी हित भी प्रभवित हो की आशंका गहरा गई है।  नेपाल और अमेरिकी की साझेदारी को चीन ने स्वार्थी एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली प्रतिरोधी कूटनीति और  कार्य कहकर निशाना साधा है। इस समय नेपाल चीन से सबसे ज्यादा दूरसंचार उपकरण और पुर्जे,वीडियो,टेलीविजन,केमिकल फर्टिलाइजर,बिजली का सामान,मशीनरी,कच्चा सिल्क,रेडीमेड गारमेंट्स और जूते खरीदता है।

यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि बीजिंग नेपाल  में वामपंथ की मजबूती में मददगार रहा है। इस समय नेपाल में वामपंथी सरकार है और चीनी कूटनीति के लिए इसमें व्यापक अवसर दिखाई पडते है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने नेपाल से रणनीतिक साझेदारियों को तेजी से बढ़ाकर हिमालय में भारत की सामरिक चुनौतियों को बढ़ाया है। प्रचंड के सत्ता में आने के अगले ही दिन,नेपाल-चीन के बीच रेल संपर्क स्थापित करने के व्यावहारिक पहलू के अध्ययन के लिए चीन की एक तकनीकी टीम काठमांडू पहुंच गई । इसके एक दिन बाद ही चीनी पक्ष ने रसुवागढी-केरुंग क्रॉसिंग को खोलने का फ़ैसला किया। केरुंग को काठमांडू से जोड़ने वाली रेलवे को संचार नेटवर्क के बुनियादी ढांचे के रूप में लिया गया है,जिसे नेपाल में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत लागू किया जा सकता है। जो एक चीनी बुनियादी ढांचा परियोजना है, जिसमें नेपाल 2017 में शामिल हुआ था।

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत नेपाल मे ढांचागत निर्माण कर चीन उसे कर्ज के  जाल में उलझाने की और है। नेपाल एक छोटा सा देश है और आर्थिक मामलों को लेकर भारत पर उसकी निर्भरता है। चीन भारत पर निर्भरता को खत्म करने के लिए नेपाल मे शिक्षा और विकास की परियोजनाओं पर अरबों रुपया दांव पर लगा रहा है। बहरहाल चीन की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को दरकिनार करने की नेपाल की वामपंथी सरकार की नीति इस क्षेत्र की सामरिक समस्याओं को बढ़ाने वाली है।

#ब्रह्मदीप अलूने

#brahmadeep alune

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