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बहुलतावादी बांग्लादेश की मतपेटी में इस्लामवाद

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दो साल पहले तक धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद की पहचान से दुनिया में झंडा बुलन्द करने वाले बांग्लादेश में हरे झंडे,पाकिस्तान से दोस्ती,भारत का विरोध,हिन्दुओं पर अत्याचार और शरिया कानून को लागू करने के मुद्दें आम चुनाव में हावी है।कट्टरपंथी जमातों से अभिशिप्त इस आम चुनाव से बांग्लादेश के भविष्य का फैसला होगा। शेख हसीना के अवामी लीग पर प्रतिबन्ध से उनके करीब पैंतीस फीसदी वोटरों का ध्रुवीकरण अर्थात् धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यकों वोटर जिधर जाएंगे,समझों उस पार्टी की सरकार बनना तय है।किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितना सुरक्षित और सम्मानित महसूस कराता है,बांग्लादेश के सामने भी यही ऐतिहासिक चुनौती खड़ी है।निर्वाचन आयोग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग बारह करोड़  मतदाता पंजीकृत हैं। तीन सौ  सदस्यीय जातीय संसद के लिए चुनाव में करीब इक्यावन राजनीतिक दल मैदान में हैं और विभिन्न दलों तथा निर्दलीयों को मिलाकर करीब दो हजार उम्मीदवार चुनावी प्रतिस्पर्धा में भाग ले रहे हैं। संख्यात्मक रूप से यह लोकतंत्र की व्यापक भागीदारी का संकेत है,किंतु वैचारिक स्तर पर विकल्पों का सिमटना चिंता का विषय बन रहा है।बांग्लादेश की जनसंख्या में लगभग नब्बें फीसदी मुस्लिम,करीब आठ फीसदी  हिंदू तथा शेष दो फीसदी बौद्ध, ईसाई और अन्य समुदाय शामिल हैं। अल्पसंख्यक समुदायों की संख्या भले ही कम लगे,परंतु कई निर्वाचन क्षेत्रों में वे निर्णायक वोटर है और परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस बार बांग्लादेश में वोटरों को वोट के साथ यह भी हां या ना,में जवाब देना है की क्या संविधान में व्यापक बदलाव किए जाएं। यदि व्यापक समर्थन मिला तो भविष्य में फिर कोई बांग्लादेश का दो बार या दस साल से ज्यादा प्रधानमंत्री नहीं रह पायेगा।जमात-ए-इस्लामी ने करीब ग्यारह दलों का एक गठबंधनबनाया है। धर्म आधारित और कट्टरपंथी विचारधारा वाले कई दलों को एक मंच पर लाने का जमात-ए-इस्लामी का प्रयास कितना रंग लाता है,यह देखने वाली बात होगी। यदि जमात-ए-इस्लामी का देश की शीर्ष सत्ता को पाने का ख्वाब कामयाब रहा तो धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश को इस्लामिक अमीरात बनने से कोई नहीं रोक पायेगा। जहां महिलाओं,अल्पसंख्यकों और उदार समाज के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी।जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है और यही स्थिति भारत के लिए चुनौतियां बढ़ा सकती है।लेकिन जमात-ए-इस्लामी के लिए सत्ता तक पहुंचना इतना आसान भी नहीं है,उसके वोट काटने के लिए जातिओ पार्टी  तैयार है।इसने  कई स्थानों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं और इससे जमात को कई सीटों का नुकसान होने की उम्मीद है।

बांग्लादेश के इस आम चुनाव में बीएनपी ने लगभग सभी जगहों पर अपने  उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं,जो किसी भी पार्टी द्वारा सबसे अधिक संख्या है।बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नीतियां राष्ट्रवाद,इस्लामी सांस्कृतिक पहचान और बहुदलीय लोकतंत्र पर आधारित मानी जाती हैं। पार्टी बांग्लादेशी राष्ट्रवादकी अवधारणा को बढ़ावा देती है,जिसमें राष्ट्रीय संप्रभुता और भारत सहित पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में संतुलन पर जोर दिया जाता है। बीएनपी मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था,निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन और विदेशी निवेश के समर्थन की पक्षधर है। संविधान में इस्लामी मूल्यों की भूमिका को महत्व देने के साथ-साथ वह संसदीय लोकतंत्र,स्वतंत्र न्यायपालिका और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की बात करती है। हालांकि पार्टी पर धार्मिक समूहों के प्रति नरम रुख रखने के आरोप भी लगते रहे हैं।इस चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को मजबूत दावेदार के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यह उदार,मध्य और विपक्षी वोटों का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में जोड़ने में सफल दिख रही है,खासकर अवामी के बैन के बाद उसके समर्थकों के वोट भी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टीकी ओर मुड़ रहे हैं। सर्वेक्षणों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टीको व्यापक समर्थन मिलता दिख रहा है,तारिक रहमान के नेतृत्व ने भी उसकी लोकप्रियता को बढ़ाया है।

देश के मौजूदा चुनावी परिदृश्य में अल्पसंख्यक समुदाय स्वयं को असमंजस की स्थिति में पा रहा है।प्रमुख राजनीतिक दलों के एजेंडे में उनके अधिकार,सुरक्षा और प्रतिनिधित्व स्पष्ट प्राथमिकता के रूप में उभरते नहीं दिख रहे। ऐसे में उनके सामने वैचारिक विकल्प सीमित प्रतीत होते हैं।कई स्थानों पर अल्पसंख्यक मतदाता दल से अधिक स्थानीय उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि,सामाजिक व्यवहार, पूर्व रिकॉर्ड और समुदाय के साथ उसके संबंधों को आधार बनाकर निर्णय लेने की ओर झुक सकते हैं।यदि चुनावी विमर्श व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय पहचान आधारित ध्रुवीकरण पर केंद्रित रहता है,तो इसका प्रभाव सामाजिक संतुलन पर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर,बांग्लादेश में यह आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं है। यह बांग्लादेश की भविष्य की दशा और दिशा तय करने वाला क्षण है।देश अपनी बहुलतावादी विरासत,संवैधानिक संतुलन और क्षेत्रीय सामंजस्य को बनाए रखेगाया वैचारिक ध्रुवीकरण उसकी राजनीति की नई पहचान बनेगा। 13 फरवरी यानि शुक्रवार को  सभी सीटों के नतीजे आ जाएंगे और दुनिया को सारे जवाब भी मिल जाएंगे।चुनाव आयोग ने 42,659 पोलिंग स्टेशन बनाए हैं,जहां 45 हजार ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं।ये मतदान से लेकर मतगणना पर नजर रखेंगे।चुनाव में लगभग 350 विदेशी पर्यवेक्षक चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखेंगे।जाहिर हैबांग्लादेश का चुनावी इतिहास हिंसा और रक्तपात से ग्रस्त रहा है ऐसे में इस आम चुनाव को शांतिपूर्ण तथा पारदर्शी तरीके से सम्पन्न कराना मोहम्मद युनूस के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

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