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यूरोप और अमेरिकी एकता भारत के हित में

स्वदेश 

अब  ट्रम्प यथार्थवाद की उस सच्चाई को स्वीकारने के बहुत करीब नजर आ रहे है जिसके अंतर्गत अमेरिका और  रूस के बीच शक्ति संतुलन की प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल करने के लिए अमेरिका को यूरोप की जरूरत है। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी सैन्य,आर्थिक और तकनीकी शक्ति है लेकिन आज की बहुध्रुवीय  वैश्विक व्यवस्था में उसे कई आंतरिक और बाह्य रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मध्यपूर्व का तनाव,चीन की बढ़ती शक्ति,रूस की आक्रामक विदेश नीति,वैश्विक गठबंधनों की अस्थिरता, अफ्रीका में इस्लामिक स्टेट की मजबूती,जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संकट,ईरान और उत्तर कोरिया की परमाणु चुनौती तथा इस्लामिक देशों से संबंधों को लेकर अमेरिका को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका बनाए रखनी है तो   ट्रम्प को सहयोगी देशों के साथ विश्वास और सम्बन्धों में स्थिरता बनाएं रखनी होगी। ट्रम्प का  नाटो को लेकर बदलता रुख भविष्य में भारत के लिए भी लाभदायक हो सकता है।  परंपरागत रूप से नाटो की प्राथमिक चिंता रूस रही है लेकिन अब चीन भी एक नई और गंभीर रणनीतिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। 

ट्रम्प के पुतिन प्रेम से असहज यूक्रेन और यूरोप को अमेरिकी राष्ट्रपिता के बदले रुख और नाटो को हथियार देने की घोषणा से राहत मिली होगी। लेकिन यूक्रेन और यूरोप की रुको और देखो की नीति भी तारीफें काबिल रही जिन्होनें संयमित होकर ट्रम्प के कई अविश्वसनीय फैसलों पर चुप्पी धारण करके समय का  इंतजार किया। इस दौरान पुतिन ट्रम्प के शांति स्थापित करने के प्रयासों को दरकिनार करते रहे और अंततः ट्रम्प इस बात को समझ गए की पुतिन से आपसी सम्बन्धों के कारण अतीत की उस हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता की अमेरिका और रूस में  गहरी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा औरवैचारिक मतभेद है और इससे ही भविष्य की दिशा तय  होती रही है।

दरअसल अमेरिका और रूस के बीच टकराव की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुए शीत युद्ध में मिलती हैं। यह एक ऐसा दौर था जब पूंजीवाद औरसाम्यवाद की विचारधाराएं टकरा रही थीं। अमेरिका लोकतंत्र और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का समर्थक था,जबकि सोवियत संघ राज्य-नियंत्रित व्यवस्था और साम्यवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था। रूस एककेंद्रित सत्ता प्रणाली,राष्ट्रीय स्वायत्तताऔरपश्चिमी प्रभाव के विरोध की नीति पर चलता है। सोवियत संघ के विघटन और रूस के उदय के बाद भी पुतिन की नीतियों में वही प्रतिद्वंदिता साफ दिखाई देती है।  यूक्रेन संकट और नाटो विस्तार जैसे मुद्दों पर यूरोप और अमेरिका का साथ होना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पुतिन इन्हें समान रूप से खतरा मानते है।  वहीं यूरोप के कई देशों को सोवियत संघ के दौर में रूसी प्रभुत्व का कड़वा अनुभव रहा है। पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया जैसे पूर्वी यूरोप के देश  कई दशकों तक सोवियत प्रभाव में रहे। द्वितीय विश्वयुद्द के बाद जब भी इन देशों में रूसी समर्थित कम्युनिस्ट सरकारें रहीं और उनका जब भी जनता ने विरोध किया रूस ने सैन्य हस्तक्षेप किया। विरोधियों को बूरी तरह कुचला और इस दौरान हजारों लोगों की जान चली गई।  इस अतीत की स्मृति आज भी डर और अविश्वास का कारण है।

यूक्रेन का पूर्वी हिस्सा रूस के बेहद करीब है जबकि पश्चिमी हिस्सा  यूरोपीय संघ की ओर झुका हुआ है,यही इसका भू-राजनीतिक संकट का कारण बनता है।यूक्रेन पूर्व और पश्चिम के बीच की भू-राजनीतिक सेतु भूमि है। 2022 में रूस का यूक्रेन पर पूर्ण आक्रमण यूरोपीय देशों के लिए एक बड़ा झटका था। यूरोप को डर है कि अगर रूस यूक्रेन में सफल होता है तो वह आगे भी उसकी सीमा से लगते बाल्टिक राष्ट्र  जैसे लातविया,लिथुआनिया और एस्तोनिया आदि पर दबाव बना सकता है। इससे साम्यवाद का प्रचार और प्रभाव बढ़ सकता है जो यूरोप के लोकतंत्र और शांति को ध्वस्त कर सकता है। यूरोपीय देशों ने रूसी साइबर हस्तक्षेप,चुनावों में दखल औरप्रचार अभियान का अनुभव किया है। रूस दुनिया के सबसे बड़े परमाणु हथियारों के जखीरे में से एक रखता है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार खुलेआम परमाणु विकल्पों का उल्लेख कर चुके हैं जो यूरोपीय सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का कारण बनता है। रूस की आक्रामक रणनीति,सत्ता केंद्रीकरण और पश्चिम के प्रति अविश्वास ने यूरोप को सुरक्षा एकता और संप्रभुता की दृष्टि से चौकन्ना और सतर्क बना दिया है।

दूसरी और रूस की कमजोरी से अमेरिका को वैश्विक शक्ति संतुलन में बढ़त मिलती है। यूरोप में नाटो का प्रभुत्व और अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और मजबूत हो सकती है। रूस की गिरती वैश्विक स्थिति अमेरिका को चीन पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की छूट दे सकती है। ऊर्जा बाजार में अमेरिका अपनी नेचुरल गैस को यूरोप को बेचकर आर्थिक लाभ भी उठा सकता है। नाटो के सहयोगी देश जैसे लातविया,लिथुआनिया,एस्तोनिया,पोलैंड, फिनलैंड और स्वीडन जैसे देश सैन्य और रणनीतिक दबाव से मुक्त हो सकते हैं। यूरोपीय संघ को रूस के वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर अधिक नियंत्रण और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने का मौका मिलेगा। ट्रम्प नाटो और यूरोप  की उपयोगिता को नजरअंदाज करने की ज्यादा  समय तक गलती नहीं कर सकते है। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी रणनीतिक फायदों के लिए उसे यूरोप के समर्थन की जरूरत है और यूरोप को भी अमेरिका की उतनी ही जरूरत है। अमेरिका-यूरोप की एकता भूराजनीतिक शक्ति संतुलन बनाए रखती है। रूस की आक्रामकता और चीन के वैश्विक वर्चस्व के प्रयासों को रोकने में यह गठबंधन असरदार है। यह एकता स्वतंत्र वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक है।

सुरक्षा,ऊर्जा,तकनीक, और रणनीतिक जरूरत की दृष्टि से यूरोप अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर है। यूरोप की सुरक्षा अमेरिका पर सबसे अधिक निर्भर नाटो सैन्य गठबंधन के माध्यम से है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने अपनी रक्षा क्षमताएं बढ़ाने का संकल्प लिया है, लेकिन फिर भी रक्षा तकनीक,खुफिया जानकारी,मिसाइल शील्ड और रणनीतिक नेतृत्व के लिए वे अमेरिका पर निर्भर हैं। अमेरिका की तकनीकी कंपनियां  यूरोप की डेटा सुरक्षा और नियमन क्षमताएं  मिलकर एक संतुलित और सुरक्षित डिजिटल भविष्य की नींव रखती हैं।  रूस के विध्वंसक हथियारों के उपयोग पर अमेरिकी दबाव ही उस पर काम कर सकता है। अमेरिका और यूरोप मिलकर संयुक्त राष्ट्र, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष  और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में नीतिगत नेतृत्व करते हैं। यह साझेदारी विकासशील देशों को समर्थन देने और वैश्विक निर्णयों को लोकतांत्रिक बनाने में प्रभावी है। चीन की कर्ज नीति और बढ़ते वैश्विक प्रभाव से निपटने के लिए भी अमेरिका और यूरोप का साथ साथ होना जरूरी है। 

2021 में नाटो की रणनीतिक रिपोर्ट में पहली बार चीन को सुरक्षा चुनौती के रूप में नामित किया गया था इसके बाद  2022  के मैड्रिड शिखर सम्मेलन में नाटो ने औपचारिक रूप से कहा था कि चीन की नीतियां  नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देती हैं।  नाटो की 2022 की रणनीतिक अवधारणा इस गठबंधन को चीनी सैन्य, आर्थिक और औद्योगिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए ट्रान्साटलांटिक प्रयासों के एक अभिन्न अंग के रूप में परिभाषित करती है। चीनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक ऐसा बिंदु है  जहां से वापसी संभव नहीं है और जो नाटो को एक विरोधी के रूप में मजबूत करता है। इस प्रकार नाटो नाटो केवल रूस नहीं बल्कि चीन को भी दीर्घकालिक खतरे के रूप में देख रहा है। दक्षिण चीन सागर,ताइवानऔरइंडो-पैसिफिक क्षेत्रमें चीन ने  सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है। इन  क्षेत्रों में चीन से निपटने के लिए भारत नाटो का स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार बन सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा नाटो के दायित्वों से अमेरिका को धीरे-धीरे मुक्त करने और इस गठबंधन को अप्रचलित घोषित करने  करने की  कोशिशों से चीन उत्साहित था। लेकिन अब ट्रम्प ने उनको लेकर बन रही विपरीत धारणाओं को ध्वस्त करते हुए तथा अमेरिका की परम्परागत रणनीतिक चुनौतियों को समझते हुए भविष्य में नाटो के साथ आगे बढ़ने के संकेत दे दिए है।  जाहिर है नाटो और ट्रम्प के बीच बढ़ते विश्वास का फायदा अमेरिका और भारत के संबंधों पर भी निश्चित ही पड़ेगा तथा भविष्य में भारत अमेरिका के आपसी संबंधों में फिर से गर्मजोशी और विश्वास देखने को मिल सकता है।

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