प्रेम सचमुच कमाल होता है,उसकी अभिव्यक्ति,भावनाएं और समर्पण इंसान को असाधारण बना देते हैं। लेकिन यदि प्रेम,किसी तानाशाह से हो जाएं तो वह गहरी दुविधा पैदा करता है। एक ओर निजी संबंध की कोमलता होती है,तो दूसरी ओर उस व्यक्ति के कठोर और अमानवीय कर्मों की कठोर सच्चाई। प्रेम कभी-कभी इंसान को अंधा भी कर देता है,जहां वह प्रिय व्यक्ति के दोषों को अनदेखा कर देता है। ऐसे में प्रेम भावनात्मक निष्ठा बन जाता है,पर इतिहास और नैतिकता उससे अलग प्रश्न पूछते रहते हैं।
एडॉल्फ हिटलर की निर्ममता आधुनिक इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में गिनी जाती है। उनकी नाज़ी विचारधारा नस्लीय श्रेष्ठता,यहूदी-विरोध और आक्रामक राष्ट्रवाद पर आधारित थी। सत्ता में आने के बाद उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट कर एक पूर्ण तानाशाही स्थापित की, जहां असहमति को कठोर दमन से कुचल दिया जाता था। हिटलर की नीतियों का सबसे क्रूर परिणाम होलोकॉस्ट था,जिसमें लगभग साठ लाख यहूदियों सहित लाखों बीमार, विकलांग,राजनीतिक विरोधियों और अन्य समुदायों की व्यवस्थित हत्या की गई। कंसंट्रेशन कैंप और गैस चैंबर मानव इतिहास की अमानवीयता के प्रतीक बन गए। इसके अलावा,उसकी विस्तारवादी नीति ने द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म दिया,जिसमें करोड़ों लोग मारे गए और यूरोप का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया। हिटलर ने अपने राष्ट्रवादी उद्देश्यों के लिए पूरी मानवता को युद्ध और विनाश की आग में झोंक दिया। हिटलर की निर्ममता केवल युद्ध या हत्या तक सीमित नहीं थी,बल्कि वह एक ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती थी जिसने मानव समानता और करुणा के मूल सिद्धांतों को नकार दिया। उनका शासन इस बात की चेतावनी है कि कट्टरता और घृणा जब सत्ता के साथ जुड़ती है तो उसका परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है।
हिटलर निस्संदेह इतिहास का एक भयावह तानाशाह था,उसकी नीतियों और निर्णयों ने लाखों निर्दोष लोगों की जान ली। वह क्रूरता,नस्लवाद और विनाशकारी विचारधारा का प्रतीक बन गया। ऐसे व्यक्ति से क्या कोई प्रेम कर सकता है? क्या कोई उसे अपनी जान से भी अधिक चाह सकता है? यह प्रश्न हमें प्रेम की जटिलता और मानवीय मनोविज्ञान की गहराइयों तक ले जाता है। एडॉल्फ हिटलर का अंत द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में हुआ,जब नाज़ी जर्मनी पूरी तरह पराजय की कगार पर खड़ा था। अप्रैल 1945 तक सोवियत रेड आर्मी बर्लिन की सीमाओं में प्रवेश कर चुकी थी। मित्र राष्ट्र पश्चिम से और सोवियत सेना पूर्व से जर्मनी को घेर चुकी थी। हिटलर ने बर्लिन में राइख चांसलरी के नीचे बने भूमिगत बंकर,फ़्यूररबंकर में शरण ली थी। जैसे-जैसे जर्मन सेना हारती गई,हिटलर की मानसिक और शारीरिक स्थिति भी बिगड़ती गई। उन्होंने अंतिम दिनों में अपने जनरलों पर विश्वास खो दिया और कई को विश्वासघात का दोषी ठहराया। 29 अप्रैल 1945 को उन्होंने अपनी लंबे समय की साथी ईवा ब्राउन से विवाह किया। उसी रात उन्होंने अपना राजनीतिक वसीयतनामा तैयार कराया,जिसमें उन्होंने जर्मनी के भविष्य के नेतृत्व की घोषणा की।
30 अप्रैल 1945 की दोपहर,जब सोवियत सेना बंकर से कुछ ही सौ मीटर दूर थी, हिटलर ने आत्महत्या करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने निजी कक्ष में जाकर पिस्तौल से स्वयं को गोली मार ली,जबकि ईवा ब्राउन ने सायनाइड विष का सेवन किया। उनके निर्देशानुसार,दोनों के शवों को बंकर के बाहर ले जाकर पेट्रोल से जलाया गया,जिससे वे दुश्मनों के हाथ न लगें। सोवियत सेना ने बाद में अवशेषों को बरामद किया और गुप्त रूप से जांच की। हिटलर की मृत्यु के साथ ही नाज़ी शासन का अंत निश्चित हो गया। 7 मई 1945 को जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया, और यूरोप में युद्ध समाप्त हो गया।
एडॉल्फ हिटलर के निजी जीवन का सबसे चर्चित और रहस्यमय अध्याय उनकी साथी ईवा ब्राउन से जुड़ा है। इतिहास में हिटलर को एक क्रूर तानाशाह,नाज़ी विचारधारा के प्रतीक और द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख सूत्रधार के रूप में याद किया जाता है,लेकिन उसके निजी जीवन का यह पहलू लंबे समय तक परदे के पीछे रहा। ईवा ब्राउन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार एक तानाशाही सत्ता के केंद्र में मौजूद व्यक्ति की निजी दुनिया भी राजनीतिक रणनीति,छवि-निर्माण और अंततः विनाश से प्रभावित होती है। ईवा ब्राउन का जन्म 6 फरवरी 1912 को म्यूनिख, जर्मनी में हुआ था। वह एक मध्यमवर्गीय कैथोलिक परिवार से थीं। किशोरावस्था में उन्होंने एक फोटोग्राफर हाइनरिख हॉफमान के स्टूडियो में सहायक के रूप में काम करना शुरू किया। यहीं 1929 में उनकी मुलाकात एडॉल्फ हिटलर से हुई,जो उस समय नाज़ी पार्टी के उभरते हुए नेता थे। मुलाकात के समय हिटलर 40 वर्ष के थे और ईवा मात्र 17 वर्ष की। धीरे-धीरे यह परिचय निजी संबंध में बदल गया। हालांकि हिटलर ने इस संबंध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया,लेकिन समय के साथ ईवा उनके निजी जीवन का स्थायी हिस्सा बन गईं।
नाज़ी प्रचार तंत्र ने हिटलर की छवि एक ऐसे त्यागी नेता के रूप में गढ़ी थी जो पूरी तरह राष्ट्र को समर्पित है और जिसका कोई पारिवारिक जीवन नहीं है। इस छवि को बनाए रखने के लिए ईवा ब्राउन को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा गया। वे आधिकारिक कार्यक्रमों में शायद ही कभी दिखाई देती थीं। ईवा का अधिकांश समय बवेरिया के आल्प्स पर्वतों में स्थित हिटलर के निवास बर्घोफ में बीतता था। यहाँ वे अपेक्षाकृत आरामदायक जीवन जीती थी,फिल्में देखना, खेलकूद,फोटोग्राफी और मित्रों के साथ समय बिताना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उन्होंने कई निजी रंगीन फिल्में भी शूट की,जिनसे उस दौर के नाज़ी नेतृत्व का अनौपचारिक पक्ष सामने आता है। फिर भी,उनका जीवन पूरी तरह स्वतंत्र नहीं था। वे राजनीतिक निर्णयों से दूर रखी गईं और हिटलर के निकट होने के बावजूद सत्ता संरचना में उनकी कोई औपचारिक भूमिका नहीं थी।
ईवा ब्राउन और हिटलर का संबंध इतिहास के सबसे विवादित प्रसंगों में से एक है,फिर भी मानवीय दृष्टि से देखें तो इसमें गहरे भावनात्मक समर्पण का तत्व स्पष्ट दिखाई देता है। हिटलर का व्यक्तित्व अत्यंत नियंत्रक और आत्मकेंद्रित था, और ईवा को लंबे समय तक सार्वजनिक पहचान नहीं मिली। वे सत्ता के केंद्र के निकट होते हुए भी छाया में रहीं। यह स्थिति किसी भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ सकती थी,किंतु ईवा का भावनात्मक जुड़ाव कम नहीं हुआ। उन्होंने अपने संबंध को प्रदर्शन या प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं बनाया,बल्कि निजी निष्ठा के रूप में जिया। जब युद्ध अपने अंतिम और भयावह चरण में था,तब भी उन्होंने सुरक्षित जीवन चुनने के बजाय हिटलर के साथ रहना स्वीकार किया। बर्लिन के बंकर में, विनाश और पराजय के बीच,29 अप्रैल 1945 को विवाह करना और अगले ही दिन साथ मृत्यु को स्वीकार करना,यह उनके दृष्टिकोण से प्रेम की चरम अभिव्यक्ति थी। इतिहास की कठोर पृष्ठभूमि से अलग, यह प्रसंग इस रूप में भी देखा जा सकता है कि किसी व्यक्ति के प्रति अडिग निष्ठा और भावनात्मक समर्पण कितनी दूर तक जा सकता है। यह प्रेम की जटिल, किंतु गहन मानवीय अभिव्यक्ति का उदाहरण है।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में जब जर्मनी की हार लगभग तय हो चुकी थी, सोवियत सेना बर्लिन की ओर बढ़ रही थी। अप्रैल 1945 में हिटलर ने बर्लिन के फ़्यूररबंकर में शरण ली। इस समय ईवा ब्राउन ने म्यूनिख छोड़कर बर्लिन जाने और हिटलर के साथ रहने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनके जीवन का सबसे निर्णायक क्षण था। कई लोगों ने उन्हें बर्लिन न जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने हिटलर के साथ अंत तक रहने का निश्चय किया। यह निर्णय प्रेम, निष्ठा से प्रेरित था। 29 अप्रैल 1945 को, जब जर्मनी पूरी तरह पराजय की कगार पर था, हिटलर और ईवा ब्राउन ने बंकर में एक छोटे से नागरिक समारोह में विवाह किया। यह विवाह अत्यंत सादगीपूर्ण और औपचारिक था। विवाह के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए गए और कुछ विश्वस्त सहयोगी उपस्थित रहे।
विवाह के अगले ही दिन, 30 अप्रैल 1945 को, दोनों ने आत्महत्या कर ली। हिटलर ने अपने सिर में गोली मारी,जबकि ईवा ब्राउन ने सायनाइड कैप्सूल लिया। उनकी इच्छा के अनुसार,उनके शवों को बंकर के बाहर ले जाकर पेट्रोल से जलाया गया जिससे वे सोवियत सेना के हाथ न लगें। हिटलर और ईवा ब्राउन आज इस दुनिया में नहीं है,इतिहास ने हिटलर को उसके विनाशकारी कर्मों के आधार पर कठोरता से परखा है। फिर भी ईवा का व्यक्तिगत प्रेम एक जटिल मानवीय प्रश्न छोड़ जाता है। उनका साथ अंत तक निभाना यह दिखाता है कि प्रेम कभी-कभी परिस्थितियों,भय और पतन के क्षणों में भी अडिग रह सकता है।