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तसलीमा नसरीन की वापसी से बंगलादेश को कूटनीतिक संकेत

प्रजातंत्र
तसलीमा नसरीन का लगभग दो दशक बाद कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने जा रही है,यह केवल एक साहित्यिक  घटनाक्रम नहीं है। तसलीमा नसरीन, दक्षिण एशिया की कट्टरपंथी राजनीति के विरोध में डटकर लिखने वाली ऐसी लेखिका है,जिनका जीवन का संघर्ष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक कट्टरता, महिला अधिकारों और निर्वासन की पीड़ा से जुड़ा रहा है। भारत बांग्लादेश संबंध एक नए राजनीतिक मोड़ पर खड़े है और इस समय  तसलीमा नसरीन की कोलकाता में सार्वजनिक उपस्थिति को केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम मानना पर्याप्त नहीं होगा।
यदि कोई देश ऐसे व्यक्तित्व का सम्मान करता है जो किसी पड़ोसी देश में मानवाधिकार, लोकतंत्र या अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा उठाता रहा हो, तो यह बिना औपचारिक विरोध दर्ज किए भी उस पड़ोसी देश पर नैतिक और कूटनीतिक दबाव बना सकता है। प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन बांग्लादेश के कट्टरपंथी ताकतों की कड़ी आलोचक रही है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार ऐसे व्यक्तित्व, जो औपचारिक रूप से किसी सरकार का हिस्सा नहीं होते, अनजाने में ही कूटनीतिक प्रतीक बन जाते है। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा  की उपस्थिति चीन को हमेशा असहज करती रही है, इसी संदर्भ में तसलीमा नसरीन  की शख्सियत को देखा जा सकता है।
भारत ने वर्षों से तसलीमा नसरीन को रहने की अनुमति और सुरक्षा प्रदान की है। आधिकारिक रूप से भारत ने इसे कभी बांग्लादेश के विरुद्ध किसी राजनीतिक कदम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। इसके विपरीत,  भारत का यह संदेश रहा है की उसका उद्देश्य मानवीय संरक्षण देना है, न कि किसी पड़ोसी देश की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करना। यहीं सॉफ्ट पावर और नॉर्मेटिव डिप्लोमेसी जिसे मूल्य आधारित कूटनीति भी कहा जाता है,की अवधारणा सामने आती है। लोकतांत्रिक देश अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और बौद्धिक स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का समर्थन करते है। ऐसे में निर्वासित लेखकों, पत्रकारों या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आश्रय देना उनकी लोकतांत्रिक छवि का हिस्सा भी माना जाता है। यह कदम प्रत्यक्ष कूटनीतिक दबाव नहीं होता, लेकिन इससे एक नैतिक और वैचारिक संदेश अवश्य जाता है। यह आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब बांग्लादेश की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। भारत ने लंबे समय तक शेख हसीना की धर्मनिरपेक्ष नीतियों और कट्टरपंथ के विरुद्ध उनके रुख का समर्थन किया था। दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और आतंकवाद-रोधी रणनीति भी इसी साझा दृष्टिकोण पर आधारित रही। इसलिए तसलीमा नसरीन को दिया गया यह सम्मान केवल एक साहित्यकार का सम्मान नहीं, बल्कि उन मूल्यों के प्रति समर्थन का संकेत भी माना जा सकता है जिन्हें भारत दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
स्वाभाविक है कि इस पहल को बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखेंगे। वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के कुछ वर्ग भी इसे अपने घरेलू राजनीतिक  के लिए असहज करने वाली घटना मान सकते हैं।  यदि तसलीमा नसरीन कोलकाता में कविता पढ़ती है, तो स्वाभाविक है कि उनके शब्दों पर केवल साहित्य प्रेमियों की नहीं, बल्कि ढाका, नई दिल्ली,विदेश विभाग और राजनीतिक पर्यवेक्षकों की भी निगाह होगी। हालांकि यह पहले से तय नहीं माना जा सकता कि उनकी कविता या वक्तव्य का विषय क्या होगा। लेकिन उनके अब तक के लेखन और सार्वजनिक हस्तक्षेपों को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, धार्मिक असहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे विषय फिर केंद्र में आ सकते है। यदि ऐसा होता है, तो बांग्लादेश के कट्टरपंथी समूहों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है। यह प्रतिक्रिया केवल सामाजिक या धार्मिक नहीं होगी, इसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाएंगे। बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद राजनीतिक स्थिरता की दिशा में कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य दिखाई दिए है। लंबे समय तक चले राजनीतिक तनाव और सत्ता परिवर्तन के बाद एक अपेक्षाकृत मजबूत राजनीतिक नेतृत्व उभरकर सामने आया है, जिससे शासन व्यवस्था में कुछ हद तक स्थिरता आई है। हालांकि, किसी भी सरकार की सफलता केवल राजनीतिक बहुमत या सत्ता की मजबूती से नहीं आंकी जाती, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने, सामाजिक सौहार्द कायम रखने और सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की उसकी क्षमता से भी उसका मूल्यांकन होता है। तारिक रहमान सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश में सक्रिय कट्टरपंथी तत्वों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने की है। हाल के वर्षों में बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता, सामाजिक ध्रुवीकरण और हिंसा की घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है। हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा, मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर हमलों तथा संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं ने बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित किया है। मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इन घटनाओं को लेकर समय-समय पर चिंता व्यक्त की जाती रही है।
तारिक रहमान ने कानून-व्यवस्था  बनाएं रखने और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की कई बार बात कहीं लेकिन जमीनी स्तर पर इन प्रयासों का प्रभाव अभी पर्याप्त दिखाई नहीं देता।  वे कट्टरपंथी नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाने, सांप्रदायिक हिंसा की पुनरावृत्ति रोकने  और अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का विश्वास पैदा करने में अभी भी नाकाम नजर आते है। बांग्लादेश की दीर्घकालिक राजनीतिक और आर्थिक प्रगति भी इसी पर निर्भर करेगी कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों, धार्मिक सहिष्णुता और विधि के शासन को कितना सुदृढ़ बना पाता है। यदि सरकार कट्टरपंथ और सांप्रदायिक हिंसा पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में सफल होती है, तो इससे न केवल देश के भीतर सामाजिक स्थिरता बढ़ेगी, बल्कि भारत सहित पड़ोसी देशों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ उसके संबंध भी अधिक विश्वासपूर्ण और मजबूत हो सकेंगे। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश के भीतर धार्मिक पहचान की राजनीति पहले की तुलना में अधिक मुखर हुई है। यदि तसलीमा नसरीन की कोलकाता में सक्रिय सार्वजनिक उपस्थिति को वहां के कुछ राजनीतिक या धार्मिक संगठन भारत द्वारा एक वैचारिक संदेश के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो इससे भारत-विरोधी  ताकतों को हवा मिल सकती है। दूसरी ओर भारत के भीतर भी कुछ राजनीतिक शक्तियां इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जीत के रूप में प्रस्तुत कर सकती हैं। इस प्रकार एक साहित्यिक आयोजन घरेलू राजनीति का हिस्सा बनकर द्विपक्षीय संबंधों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है।

बांग्लादेश की विदेश नीति आर्थिक विकास, घरेलू राजनीति, चीन के साथ संबंध, भारत के साथ व्यापार, सीमा प्रबंधन, जल विवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा पर आधारित है। मूल्य-आधारित कूटनीति  भारत बांग्लादेश के सम्बन्धों को प्रभावित कर सकती है. भारत एक बहुलतावादी लोकतंत्र है जबकि बांग्लादेश धार्मिक पहचान आधारित राजनीति पर आगे बढ़ रहा है।  भारत अपने लोकतांत्रिक मूल्यों, सांस्कृतिक खुलेपन और क्षेत्रीय सहयोग को विश्वसनीय ढंग से आगे बढ़ा कर बांग्लादेश के साथ संबंधों में दीर्घकालिक वैचारिक बढ़त बना सकता है। बांग्लादेश में उदार, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के प्रति भारत का समर्थन केवल वैचारिक प्रतिबद्धता का विषय नहीं है, बल्कि उसकी दीर्घकालिक क्षेत्रीय रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है। एक स्थिर, समावेशी और कट्टरपंथ मुक्त बांग्लादेश भारत की सुरक्षा, पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिरता और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में संतुलित सामरिक वातावरण के लिए अनुकूल है। इसलिए भारत का झुकाव स्वाभाविक रूप से उन मूल्यों के पक्ष में दिखाई देता है जो धार्मिक सहिष्णुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक समावेशन को मजबूत करते है।

भारत से जाने वाले तसलीमा नसरीन के संकेत बांग्लादेश की सरकार पर नैतिक और कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए काफी है कि वह कट्टरपंथी समूहों के प्रभाव से दूर रहते हुए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन को प्राथमिकता दे। इसके साथ ही, यह रणनीति भारत के व्यापक क्षेत्रीय हितों से भी जुड़ी है। यदि बांग्लादेश में कट्टरपंथी शक्तियों का प्रभाव बढ़ता है और पाकिस्तान समर्थक या भारत-विरोधी तत्वों को अधिक राजनीतिक या वैचारिक स्थान मिलता है, तो इसका असर दोनों देशों के संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। इस दृष्टि से भारत की मूल्य-आधारित कूटनीति उसके रणनीतिक हितों से भी जुड़ जाती है। तसलीमा नसरीन का प्रश्न केवल एक लेखिका का नहीं, बल्कि बांग्लादेश की वैचारिक दिशा का भी प्रतीक बन गया है। इसलिए शेख हसीना के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश का वर्तमान सत्तारूढ़ नेतृत्व तसलीमा नसरीन जैसे व्यक्तित्वों के प्रति कैसा रुख अपनाता है। उसका दृष्टिकोण इस बात का भी संकेत देगा कि नई सरकार उदार लोकतांत्रिक मूल्यों और कट्टरपंथ के बीच किस प्रकार का संतुलन स्थापित करना चाहती है।
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