article गांधी है तो भारत है

पूंजीवाद और समाजवाद के अंतर्द्वंद की आज़ादी

         सुबह सवेरे
संविधान सभा के भीतर पूंजीवाद, निजी संपत्ति और आर्थिक असमानता को लेकर गहरी आशंकाएं थी। 1947 में स्वतंत्र हुआ भारत अत्यंत गरीब, असमान और कृषि-प्रधान समाज था। औपनिवेशिक शासन ने व्यापक गरीबी, बेरोजगारी, सामंती भूमि संबंध और आर्थिक विषमता छोड़ी थी। संविधान निर्माताओं के सामने सवाल था कि राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता में कैसे बदला जाए। इसलिए केवल एक व्यक्ति–एक वोट वाली राजनीतिक लोकतंत्र की व्यवस्था पर्याप्त नहीं मानी गई। संविधान सभा में आर्थिक लोकतंत्र की अवधारणा पर लगातार चर्चा हुई। डॉ. आंबेडकर से जुड़ी बहस में राजनीतिक लोकतंत्र के साथ आर्थिक लोकतंत्र को भी महत्वपूर्ण माना गया।
जवाहरलाल नेहरू सहित अनेक नेताओं को एक ओर पश्चिमी पूंजीवाद से पैदा होने वाली आर्थिक असमानता की चिंता थी, तो दूसरी ओर सोवियत मॉडल के अत्यधिक राज्य नियंत्रण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दमन को लेकर भी आशंका थी। संविधान सभा की बहसों में यह विचार स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें व्यक्ति न तो पूंजी के अधीन हो और न ही सर्वशक्तिमान राज्य के अधीन।  यही भारत के लोकतांत्रिक समाजवाद की मूल भावना बनी। लेकिन यहां पर एक बहुत महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत भी सामने आता है। डॉ.आंबेडकर ने 15 नवंबर 1948 को संविधान सभा में कहा था कि संविधान में किसी एक विशेष आर्थिक व्यवस्था, यानि समाजवाद या पूंजीवाद को स्थायी रूप से निर्धारित करना लोकतंत्र को सीमित कर देगा। उनके अनुसार आने वाली पीढ़ियों को यह तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे किस प्रकार की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था चाहती है। आंबेडकर की सोच में संविधान का काम यह तय करना नहीं था कि भारत हमेशा समाजवादी रहेगा या भारत हमेशा पूंजीवादी रहेगा।
संविधान ने राज्य को आर्थिक असमानता कम करने, संसाधनों का व्यापक जनहित में वितरण करने और सामाजिक-आर्थिक न्याय स्थापित करने की दिशा दी। इसलिए भारत ने शुरुआत से ही कल्याणकारी राज्य का रास्ता अपनाया। लेकिन साथ ही संविधान ने निजी संपत्ति और निजी आर्थिक गतिविधि को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। संविधान सभा में निजी संपत्ति पर हुई बहस में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि अत्यधिक पूंजीवाद और पूर्ण राज्य-स्वामित्व,दोनों के बीच भारत को अपना रास्ता तलाशना होगा।
संविधान निर्माताओं का मूल भय पूंजीवाद शब्द से नहीं, बल्कि ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था से था जिसमें आर्थिक शक्ति कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित होकर राजनीतिक लोकतंत्र को भी प्रभावित करने लगे। क्योंकि यदि एक व्यक्ति के पास अपार आर्थिक शक्ति है और दूसरे के पास शिक्षा, रोजगार, भूमि और संसाधन नहीं है, तो दोनों के पास कागज पर समान राजनीतिक अधिकार होते हुए भी वास्तविक अवसर समान नहीं रह जाते। यही कारण है कि संविधान में सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय को राजनीतिक लोकतंत्र के साथ जोड़ा गया। दरअसल संविधान निर्माताओं को पूंजी से उतना डर नहीं था, जितना पूंजी के राजनीतिक वर्चस्व से था। वे सोवियत समाजवाद से भी पूरी तरह सहमत नहीं थे और अनियंत्रित पूंजीवाद से भी संतुष्ट नहीं थे।
इसलिए भारत ने तीसरा रास्ता चुना, राजनीतिक लोकतंत्र के साथ सामाजिक न्याय और मिश्रित अर्थव्यवस्था। लेकिन 1976 में समाजवादी शब्द जोड़कर इस आर्थिक दर्शन को संवैधानिक प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से दर्ज कर दिया गया। राजनीतिक लोकतंत्र का अर्थ है हर वयस्क नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार मिलना। अर्थात् गरीब हो या अमीर, किसान हो या उद्योगपति, शिक्षित हो या अशिक्षित, हर नागरिक के पास एक वोट और राजनीतिक रूप से समान नागरिक अधिकार हो। आंबेडकर के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण था। लेकिन उनका सवाल था, यदि एक व्यक्ति के पास वोट तो बराबर है, लेकिन समाज और अर्थव्यवस्था में उसकी स्थिति अत्यंत असमान है, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र है। यहीं से आर्थिक लोकतंत्र का प्रश्न आशंकाओं और कुशंकाओं के बीच में आ गया। आंबेडकर के आर्थिक लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं था कि हर व्यक्ति की संपत्ति बिल्कुल बराबर हो या राज्य सारी निजी संपत्ति छीन ले। बल्कि इसका मूल विचार था कि समाज में ऐसी चरम आर्थिक असमानता न हो, जिसमें कुछ लोगों के पास आर्थिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण हो और विशाल आबादी बुनियादी अवसरों से वंचित रह जाए। एक व्यक्ति के पास हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति है और दूसरा व्यक्ति भोजन, शिक्षा और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है। दोनों के पास वोट का अधिकार समान है। कानूनी रूप से दोनों बराबर हैं, लेकिन उनकी वास्तविक सामाजिक शक्ति बराबर नहीं है। आंबेडकर इसी अंतर को लेकर चिंतित थे। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में आंबेडकर ने भारत के सामने मौजूद इसी विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि भारत 26 जनवरी 1950 को विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करेगा,राजनीति में समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। उनका आशय था की राजनीतिक रूप से एक व्यक्ति, एक वोट दिखाई तो देगा लेकिन सामाजिक-आर्थिक रूप से एक व्यक्ति का जीवन दूसरे व्यक्ति की तुलना में बहुत अधिक शक्तिशाली और सुविधासंपन्न हो सकता है। आंबेडकर की चिंता थी कि यदि यह विरोधाभास बहुत लंबे समय तक बना रहा, तो राजनीतिक लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
डॉ.आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल राजनीतिक समानता अर्थात् प्रत्येक नागरिक के समान मताधिकार तक सीमित नहीं था। वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि यदि राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहती है, तो लोकतंत्र भीतर से कमजोर हो सकता है। इसलिए उनके चिंतन में लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाना था जिसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व केवल संवैधानिक आदर्श न रहकर नागरिकों के वास्तविक जीवन में भी दिखाई दें।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में जिस विरोधाभास की चेतावनी दी थी, उसका वह भारत में अब दिखाई देता है। राजनीतिक लोकतंत्र ने प्रत्येक नागरिक को समान मताधिकार दिया, लेकिन आर्थिक लोकतंत्र की चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई। उदारीकरण और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था ने भारत में अभूतपूर्व आर्थिक विकास और करोड़ों लोगों के लिए नए अवसर पैदा किए, लेकिन इसी दौर में संपत्ति और आर्थिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण भी बढ़ा। समस्या यह नहीं कि भारत में अमीर लोग अधिक अमीर हुए,समस्या यह है कि यदि आर्थिक शक्ति इतनी केंद्रित हो जाए कि वह अवसरों, नीतियों और राजनीतिक प्रभाव को भी प्रभावित करने लगे, तो एक व्यक्ति, एक वोट की राजनीतिक समानता और एक व्यक्ति, एक मूल्य की लोकतांत्रिक भावना के बीच दूरी बढ़ सकती है। इस अर्थ में आंबेडकर की चिंता बेहद प्रासंगिक हो गई। देश में उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र में निजी कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है। सरकार कई सरकारी कंपनियों और बैंकों को बेच रही है या उनका निजीकरण कर रही है। कीमतें और उत्पादन अब सरकार तय नहीं करती, बल्कि बाज़ार की मांग और पूर्ति इन्हें तय करती है।  दिक्कत पूंजीवाद से नहीं है,भारत एक शुद्ध पूंजीवादी देश बन सकता है, लेकिन यहां की बड़ी आबादी और गरीबी के कारण इसे पूरी तरह बाज़ार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भारत की सफलता को केवल  जीडीपी, अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था, ऊंची विकास दर या दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान से नहीं मापा जा सकता। यदि आर्थिक विकास का बड़ा हिस्सा समाज के अपेक्षाकृत छोटे वर्ग की संपत्ति और आय में तेजी से वृद्धि करता है, जबकि बड़ी आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में  सवाल उठता है कि आगे बढ़ता भारत, आखिर किसके लिए आगे बढ़ रहा है। यहां आंबेडकर की चिंता फिर प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र और सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच मौजूद विरोधाभास को गंभीर खतरा माना था। आज भारत में हर नागरिक का वोट समान है, लेकिन आर्थिक शक्ति समान नहीं है। यही लोकतंत्र के सामने मूल चुनौती है।
आगे बढ़ते भारत की असली परीक्षा यह नहीं है कि भारत में कितने अरबपति पैदा हुए और उसकी अर्थव्यवस्था कितने ट्रिलियन डॉलर की हुई। असली परीक्षा यह है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा। यदि देश की संपत्ति तेजी से बढ़ती है, लेकिन संपत्ति और अवसरों का बड़ा हिस्सा कुछ हाथों में केंद्रित होता जाता है, तो यह विकास की गति पर नहीं, बल्कि विकास की गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा करता है। राजनीतिक लोकतंत्र ने प्रत्येक भारतीय को समान वोट दिया है, लेकिन आर्थिक असमानता उस समानता की वास्तविक शक्ति को सीमित कर सकती है। यही वह बिंदु है जहां डॉ. आंबेडकर की चेतावनी आज फिर सुनाई देती है की भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन क्या भारत के साथ भारत का हर नागरिक भी आगे बढ़ रहा है?
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