कूटनीति अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हितों के संवर्धन का बेहतरीन माध्यम है जो किसी नियमों,परंपराओं और औपचारिकताओं का मोहताज नहीं हो सकता। नेपाल के नए नवेले प्रधानमंत्री बालेन शाह ने कूटनीति को औपचारिकताओं के बाहुपाश में जकड़कर देश के दीर्घकालिक भविष्य को संकट में डाल दिया है। दरअसल बालेन शाह अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और राजनयिकों से बातचीत,वार्ताओं और संबंधों के प्रबंधन की कला के महत्व को नजरअंदाज करके खुद के देश में एक मजबूत नेता की छवि गढ़ना चाहते है। उनकी यही सनक भारत और अमेरिका जैसे सहयोगियों को नाराज कर सकती है। बालेन शाह का एक वर्ष तक किसी भी विदेशी दौरे पर न जाने का निर्णय,भारत के निमंत्रण के बावजूद विदेश यात्रा से दूरी तथा अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर से मुलाकात से इनकार ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि यह नेपाल की नई कूटनीतिक आत्मनिर्भरता का संकेत है या फिर कहीं यह कूटनीतिक सम्मान की सनक का एक नया रूप तो नहीं है।
नेपाल में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि नया प्रधानमंत्री शपथ लेने के बाद सबसे पहले भारत का दौरा करता है। इसके पीछे केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भौगोलिक,सांस्कृतिक और आर्थिक वास्तविकताएं भी रही है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार,पारगमन मार्ग और सुरक्षा सहयोगी है। लेकिन बालेन शाह ने भारत की यात्रा को फ़िलहाल स्थगित करके यह संकेत देने की कोशिश की है कि नेपाल अब अपनी विदेश नीति को केवल पारंपरिक कूटनीतिक रस्मों के आधार पर नहीं चलाना चाहता। उनका मानना है कि विदेश यात्राएं केवल शिष्टाचार नहीं,बल्कि ठोस समझौतों और राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए। यह निर्णय आत्मसम्मान और स्वतंत्र विदेश नीति का प्रतीक लगता है, लेकिन इसके भीतर एक दूसरा पक्ष भी दिखाई देता है। वे भारत से रिश्तों को मजबूत करने के स्थान पर ओली की भारत विरोध की राजनीति पर चलकर सीमा विवाद को तूल दे रहे है,जो उनकी राजनीतिक अदूरदर्शिता को दिखाता है। ओली ने राष्ट्रवाद की राजनीति को मजबूत करने के लिए कई बार भारत-विरोधी रुख अपनाया। 2015 की सीमा नाकेबंदी के बाद उन्होंने भारत पर नेपाल को दबाव में लेने का आरोप लगाया,जिससे नेपाल में उनकी लोकप्रियता बढ़ी,लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में तनाव भी बढ़ गया। बाद में कालापानी,लिपुलेख और लिम्पियाधुरा विवाद को अत्यधिक राजनीतिक रूप से प्रस्तुत करने से दोनों देशों के संबंध और जटिल हुए। नेपाल की राजनीति में भारत से दूरी दिखाना कई बार घरेलू लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम भी रहा है। यदि बालेन शाह भारत से दूरी बनाकर केवल राष्ट्रवादी छवि को मजबूत करने की राजनीति करते है,तो इससे नेपाल की रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। वहीं यदि वे संतुलित और व्यवहारिक कूटनीति अपनाते है,तो वे नेपाल को अधिक स्वतंत्र और स्थिर दिशा भी दे सकते है। नेपाल की अधिकांश व्यापारिक आपूर्ति,ऊर्जा,परिवहन और बाहरी संपर्क भारत के माध्यम से संचालित होते हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और दोनों देशों के बीच खुली सीमा सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में यदि नेपाल की राजनीति केवल भारत-विरोधी भावनाओं पर आधारित होने लगे,तो इसका सबसे बड़ा नुकसान स्वयं नेपाल को ही उठाना पड़ सकता है। नेपाल की दीर्घकालिक स्थिरता और विकास केवल प्रतीकात्मक राष्ट्रवाद या भारत से दूरी बनाकर संभव नहीं है। नेपाल की भौगोलिक,आर्थिक और सांस्कृतिक वास्तविकता ऐसी है कि भारत के साथ मजबूत और व्यवहारिक संबंध उसके राष्ट्रीय हितों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
नेपाल की आर्थिक,सामाजिक और भौगोलिक संरचना भारत से इतनी गहराई से जुड़ी हुई है कि भारत को नजरअंदाज करके नेपाल दीर्घकालिक स्थिरता और विकास की कल्पना नही कर सकता। इन सबके बीच प्रधानमंत्री बालेन शाह को यह भी समझना होगा की कूटनीति में सम्मान महत्वपूर्ण होता है,परंतु अत्यधिक प्रतीकात्मकता कभी-कभी व्यवहारिक राजनीति को कमजोर कर देती है। अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल प्रोटोकॉल से नहीं चलते,वे संवाद,संपर्क और लचीलेपन पर भी आधारित होते हैं। यदि कोई नेतृत्व यह तय कर ले कि वह केवल राष्ट्राध्यक्षों या विदेश मंत्रियों के स्तर के लोगों से ही मिलेगा,तो यह व्यावहारिक कूटनीति की जगह प्रतिष्ठा-आधारित राजनीति को बढ़ावा दे सकता है।
यही स्थिति अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर के मामले में देखने को मिली। अमेरिकी पक्ष ने काठमांडू यात्रा के दौरान बालेन शाह से मुलाकात का अनुरोध किया,लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि प्रधानमंत्री घरेलू विकास और सुशासन के कार्यों में व्यस्त है। यह माना जा रहा है की बालेन शाह ने यह कड़ा प्रोटोकॉल बनाया है कि वे केवल समकक्ष या उससे उच्च स्तर के नेताओं से ही मिलेंगे। यह निर्णय नेपाल की गरिमामय कूटनीति के रूप में प्रस्तुत किया गया,लेकिन वास्तव में इसमें कूटनीतिक अकुशलता भी दिखाई दी। अमेरिकी दूत सर्जियो गोर कोई साधारण राजनयिक नहीं है। वे राष्ट्रपति ट्रम्प के अत्यंत करीबी सहयोगियों में माने जाते है तथा उनका प्रभाव अमेरिकी सत्ता संरचना के भीतर गहरा माना जाता है। दक्षिण और मध्य एशिया के लिए विशेष दूत के रूप में उनकी भूमिका केवल औपचारिक नहीं,बल्कि रणनीतिक है। वे भारत,पाकिस्तान,अफगानिस्तान,बांग्लादेश और मध्य एशिया से जुड़ी अमेरिकी नीति के महत्वपूर्ण चेहरों में गिने जाते हैं। ऐसे व्यक्ति से मुलाकात को केवल प्रोटोकॉल के आधार पर टालना कई कूटनीतिक हलकों में अपरिपक्वता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह संवादहीनता नेपाल के राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अक्सर विभिन्न देशों के शीर्ष अधिकारियों से मिलते हैं, जिसमें पुतिन जैसे शीर्ष राजनीतिज्ञ भी शामिल है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी परिस्थिति और रणनीतिक जरूरत के अनुसार अलग अलग स्तर के राजनयिकों से संवाद करते है। आधुनिक कूटनीति में लचीलापन शक्ति का प्रतीक माना जाता है,कमजोरी का नहीं। नेपाल की स्थिति और भी संवेदनशील है,यह भारत और चीन के बीच स्थित एक छोटा लेकिन रणनीतिक राष्ट्र है। अमेरिका लंबे समय से नेपाल में विकास,लोकतंत्र और अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। अभी नेपाल के आर्थिक हालात बेहतर नहीं है, बालेन शाह,सर्जियो गोर से मिलकर कई अहम समझौतों की ओर कदम बढ़ा सकते थे,लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री ने यह अवसर गंवा दिया। शाह की लोकप्रियता मुख्यतः उनकी परंपरागत सत्ता ढांचे की विरोधी छवि और स्थानीय प्रशासनिक सुधारों से बनी है। वे पारंपरिक राजनीतिक वर्ग से अलग दिखना चाहते हैं। संभवतः यही कारण है कि वे विदेश नीति में भी एक नई शैली प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति घरेलू राजनीति से अलग होती है। यहां केवल लोकप्रियता नही,बल्कि निरंतर संवाद, रणनीतिक धैर्य और व्यावहारिकता भी जरूरी होती है। छोटे देशों की कूटनीति प्रतिष्ठा के प्रदर्शन से कहीं ज्यादा संबंधों के संतुलन पर आधारित होती है,इस तथ्य को नेपाली प्रधानमंत्री को समझना होगा। उन्हें यह भी समझने की जरूरत है की अंतरराष्ट्रीय सम्मान केवल प्रोटोकॉल से नहीं मिलता। वह आर्थिक शक्ति, राजनीतिक स्थिरता,सामरिक महत्व और व्यवहारिक कूटनीति से अर्जित होता है। यदि नेपाल अपने विकास,सुशासन और संस्थागत मजबूती पर ध्यान देता है, तो उसका सम्मान स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। लेकिन यदि कूटनीति अत्यधिक प्रतीकात्मक और अहं-आधारित हो जाएं तो वह संवाद के अवसरों को सीमित कर सकती है।
बालेन शाह को नेपाल की जनता ने पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से अलग एक विकल्प के रूप में उभरते हुए देखा। उन्हें सत्ता इसलिए सौंपी गई कि वे देश के प्रशासनिक ढांचे को बेहतर करे,भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को कम करें तथा नेपाल को अधिक मजबूत,आत्मनिर्भर और व्यवस्थित राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्य करें। भू-राजनीतिक रूप से नेपाल एक संवेदनशील देश है और उसके लिए कूटनीति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। भारत,चीन और अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों के बीच स्थित नेपाल को अत्यधिक संतुलित और व्यवहारिक कूटनीति की आवश्यकता होती है। किसी प्रभावशाली प्रतिनिधि या रणनीतिक शक्ति से दूरी बनाना कई बार अनावश्यक तनाव पैदा कर सकता है। नेपाल की अर्थव्यवस्था,व्यापार और विकास बाहरी सहयोग से जुड़ा हुआ है,यहां कूटनीतिक कठोरता जोखिम पैदा कर सकती है। बालेन शाह के पास नेपाल की राजनीति को नई दिशा देने का अवसर है। यदि वे घरेलू सुधारों के साथ-साथ व्यवहारिक और परिपक्व कूटनीति अपनाते है,तो वे नेपाल को क्षेत्रीय राजनीति में अधिक सम्मानजनक और स्थिर स्थिति दिला सकते है। लेकिन यदि विदेश नीति केवल व्यक्तिगत छवि निर्माण तक सीमित रह गई,तो इससे नेपाल की आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती है।