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भारत की विदेश नीति की नई चुनौती

जनसत्ता                                                                                           

कूटनीति का एक प्रमुख दायित्व यह होता है कि वह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उभरते हुए शक्ति-संतुलन का सूक्ष्म मूल्यांकन करें और ऐसी रणनीति अपनाएं  जिससे किसी भी क्षेत्रीय अथवा वैश्विक शक्ति-प्रतिस्पर्धा में राष्ट्र के हित प्रभावित  हुए बिना उसकी स्थिति सुदृढ़ और सुरक्षित बनी रहे। भारत की विदेश नीति की असल चुनौती यही है की उसे ट्रम्प की एक पक्षीय व्यापारिक नीतियों से उत्पन्न हुए अविश्वास और वैश्विक अस्थिरता का सामना करते हुए भी रणनीतिक और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाएं रखना है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में आर्थिक,रणनीतिक,कूटनीतिक तथा विचारधारात्मक स्तर पर देश के दीर्घकालीन  हितों की दृष्टि से इस पर समग्रता की जरूरत महसूस की जा रही है। देश की आर्थिक प्रगति निर्बाध चलती रहे,इसलिए निर्यात और ऊर्जा आपूर्ति की सुचारू व्यवस्था कायम  रखना होगी। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के भू-राजनीतिक प्रभावों को समझते हुए रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखना होगा। बहुपक्षीय मंचों का कूटनीतिक उपयोग करते हुए भी महाशक्तियों की मोर्चाबंदी की कोशिशों से अलग बने रहना होगा तथा विचारधारात्मक तौर पर भारत की पहचान समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य की बनी रहे,इसलिए साझेदारी का चुनाव भी समझदारी से करना होगा।

शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में बहुपक्षवाद को मज़बूत बनाने के संदेश के बीच दुनिया के शान्तिपूर्ण,समावेशी और टिकाऊ भविष्य की संभावनाएं पुतिन और शी जिनपिंग के नेतृत्व में खोजना राजनीतिक जटिलताओं को ओर ज्यादा बढ़ा सकता है। इससे दुनिया की व्यवस्थागत समस्याएं भी बढ़ सकती है और भारत इससे अछूता नहीं रह सकता। दरअसल भारत की भौगोलिक स्थिति, आर्थिक आकांक्षाएं  और सुरक्षा चुनौतियां इतनी जटिल है कि वह केवल एक शक्ति पर निर्भर नहीं रह सकता। इसलिए उसकी भू-राजनीतिक ज़रूरतें उसे अमेरिका,रूस और चीन जैसे महाशक्तियों के साथ अलग-अलग स्तरों पर सहयोग और संतुलन साधने के लिए प्रेरित करती हैं।

वैश्विक राजनीति में अमेरिका निर्विवाद रूप से सबसे प्रभावशाली शक्ति है। उसके पास न केवल असीमित आर्थिक संसाधन और तकनीकी क्षमता है,बल्कि विश्व की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताक़त और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं पर निर्णायक प्रभाव भी है। इस पृष्ठभूमि में भारत यदि स्वयं को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है तो अमेरिका उसके लिए एक अनिवार्य रणनीतिक साझेदार बन जाता है। यह संबंध सामरिक के साथ ही आर्थिक,तकनीकी,ऊर्जा और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग का आधार भी है। पिछले तीन दशकों में भारत और अमेरिका के संबंध न केवल सुधरें बल्कि उसमे अविश्वास कम हुआ और कई क्षेत्रों में साझेदारी भी बढ़ी। 

तीव्र आर्थिक विकास की भारत की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में अमेरिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। भारत न केवल अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना बल्कि अमेरिकी निवेश और पूंजी प्रवाह ने भारत की स्टार्टअप संस्कृति,डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र को अभूतपूर्व ऊर्जा प्रदान की है। लाखों भारतीय पेशेवर अमेरिका में कार्यरत हैं,जिनसे भारत को अरबों डॉलर मिलते है और अत्याधुनिक तकनीकी अनुभव भी प्राप्त होता है। गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भारतीय नेतृत्व इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। सिलिकॉन वैली और भारतीय आईटी कंपनियों के बीच स्थापित घनिष्ठ संबंध इस पारस्परिक निर्भरता बढ़ाते है। यदि भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य प्राप्त करना है तो अमेरिकी निवेश और विशाल उपभोक्ता बाज़ार उसके लिए अपरिहार्य रहेंगे। तकनीकी क्षेत्र जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग,साइबर सुरक्षा या उच्चस्तरीय रक्षा प्रौद्योगिकी में अमेरिका अग्रणी है। भारत के लिए इन क्षेत्रों में प्रगति का मार्ग अमेरिकी सहयोग से ही प्रशस्त होता है। हाल के वर्षों में रक्षा तकनीकी साझेदारी ने भारत की सैन्य क्षमता को कई गुना बढ़ाया है,जिससे वह क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में अधिक सक्षम बन सका है। रणनीतिक दृष्टि से भी अमेरिका भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन की विस्तारवादी नीति,हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी बढ़ती सक्रियता और पाकिस्तान को मिलने वाला उसका समर्थन भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। ऐसी स्थिति में अमेरिका के साथ भारत का सहयोग इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने का प्रमुख साधन बन चुका है। वैश्विक मंचों पर भी अमेरिका का समर्थन भारत की स्थिति को सुदृढ़ बनाता है। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का मुद्दा हो या न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में प्रवेश की आकांक्षा,अमेरिका का समर्थन भारत के लिए निर्णायक महत्त्व रखता है। भारत के लिए अमेरिका की आवश्यकता केवल एक रणनीतिक साझेदार तक सीमित नहीं है। यह संबंध आर्थिक प्रगति,तकनीकी उन्नति,सुरक्षा स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए भी उतने ही महत्त्वपूर्ण है।

शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली और बीजिंग के बीच संबंध सुधरते हुए दिखाई दिए। जलवायु परिवर्तन,वैश्विक व्यापार और बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सहयोग की गुंजाइश दोनों देशों के बीच बनी रहती है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद ऐसे मंचों पर संवाद भारत को तनाव कम करने और कम से कम टकराव को नियंत्रित करने का अवसर देता है। मोदी और जिनपिंग की मुलाक़ात से यह उम्मीद  बढ़ी है कि व्यापारिक असंतुलन,सीमा पर स्थिरता और ब्रिक्स जैसे मंचों में सहयोग पर बातचीत आगे बढ़ेगी। इससे यह संदेश जाता है कि भारत प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद का रास्ता बंद नहीं करता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिखर सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने के लिए सात वर्षों से अधिक समय में अपनी पहली चीन यात्रा की,इससे यात्रा का महत्व और ज्यादा बढ़ गया। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले दोनों पड़ोसी देश डोनाल्ड ट्रंप की व्यापक टैरिफ व्यवस्था के दबाव में,अपने संबंधों को मज़बूत करने की कोशिश तो कर रहे हैं,लेकिन दोनों देशों के बीच कई भू-राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। भारत के लिए चीन सीमा विवाद, पाकिस्तान गठजोड़,आर्थिक निर्भरता,समुद्री विस्तारवाद और वैश्विक मंचों पर विरोध बड़ी चुनौती रहे है। भारत की विदेश नीति चीन को संतुलित करने के लिए कृतसंकल्पित रही है और इस वास्तविकता को नजरअंदाज करने का जोखिम भी नहीं लिया जा सकता।  इसलिए रूस,अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सहयोग आवश्यक हो जाता है।

भारत हमेशा सामरिक स्वायत्तता की नीति पर चलता रहा है। यह नीति कहती है कि भारत किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर न होकर विभिन्न ध्रुवों के साथ संतुलन बनाए। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंदिता के बीच रूस भारत के लिए एक संतुलनकारी ध्रुव है। भारत की रक्षा संरचना का बड़ा हिस्सा रूसी तकनीक और हथियारों पर आधारित है। लड़ाकू विमानों से लेकर टैंकों और पनडुब्बियों तक,भारत की सैन्य क्षमता की रीढ़ रूसी सहयोग से बनी है। आज भी ब्रह्मोस मिसाइल,एस-400 रक्षा प्रणाली और टी-90 टैंक भारत की सामरिक शक्ति को परिभाषित करते हैं। पश्चिमी देश अक्सर संवेदनशील तकनीक साझा करने से हिचकते हैं,जबकि रूस ने लंबे समय से भारत को ऐसी रक्षा तकनीक उपलब्ध कराई है जो उसकी आत्मनिर्भरता को बढ़ाती है। यही कारण है कि भारत के लिए रूस केवल एक आपूर्तिकर्ता नहीं बल्कि रक्षा सहयोग का स्थायी साझेदार है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पश्चिम से बहुत दूर  हो गया है और चीन पर उसकी निर्भरता काफी हद तक बढ़ गई है। भारत के लिए यह स्थिति सामरिक रूप से अनुकूल नहीं है। रूस की चीन पर निर्भरता से पाकिस्तान और रूस के संबंध मजबूत हो रहे है। भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती चीन है और यदि रूस उस पर अधिक निर्भर होता है तो भारत के लिए कूटनीतिक दबाव बढ़ता है। रूस भारत का पारंपरिक रक्षा आपूर्तिकर्ता है,लेकिन चीन के साथ रूस की तकनीकी साझेदारी भारत के लिए असहज स्थिति पैदा करती है। रूस को पूरी तरह चीन के पाले में जाने से रोकने के लिए भारत को ऊर्जा,रक्षा और निवेश में रूस से रिश्ते बनाए रखने होंगे। वहीं चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत को अमेरिका, जापान,फ्रांस और यूरोपीय देशों से सहयोग बढ़ाना होगा। रूस–चीन मित्रता कुछ मामलों में भारत को राहत दे सकती है जैसे ट्रम्प की  नीतियों से निपटने के फ़िलहाल दबाव बनाया गया है लेकिन दीर्घकाल में,यदि रूस चीन पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है तो यह भारत की सामरिक स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए समस्या भी बन सकता है।

शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में पुतिन और जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की जुगलबंदी ने ट्रम्प की एकपक्षीय योजनाओं से प्रभावित दुनिया में डॉलर के वर्चस्व को कम करने के संकेत दिए है। रूस भौगोलिक क्षेत्रफल में दुनिया का सबसे बड़ा देश है परंतु इसकी आबादी अपेक्षाकृत कम होकर सिर्फ पन्द्रह करोड़ है। रूस के पास विशाल भूभाग और प्राकृतिक संसाधन हैं,इसी कारण वह वैश्विक प्रतिबंधों का सामना करने के बाद भी शक्तिशाली बना हुआ है। चीन दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,चीन के लिए निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण,तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ते प्रयास और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योगों का विकास भविष्य की आर्थिक स्थिरता और दीर्घकालिक वृद्धि के सकारात्मक संकेतक हैं। रूस और चीन दोनों देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी है,जो इन दोनों देशों की  वैश्विक शक्ति,सुरक्षा हितों की रक्षा,सहयोगियों को बचाने और पश्चिमी देशों से बराबरी की स्थिति  बनाएं रखने का साधन है। यह स्थिति चीन और रूस को न केवल सैन्य व आर्थिक, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी अत्यधिक प्रभावशाली बनाती है। रूस और चीन की तुलना में,भारत निश्चित रूप से एक उभरती हुई शक्ति है। यह एक युवा,बड़ी आबादी,तेज़ आर्थिक विकास,एक मजबूत लोकतंत्र और इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक स्थिति से लाभान्वित हो रहा है। जबकि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के अभाव,चीन की तुलना में कम वैश्विक  पहुंच और मध्यम स्तर की सैन्य-तकनीकी आत्मनिर्भरता भारत की  प्रमुख समस्याएं हैं। रूस और चीन के मजबूत रिश्ते भारत के लिए दोधारी तलवार की तरह हैं। एक ओर यह बहुध्रुवीयता और वैश्विक संतुलन को बढ़ावा देकर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करते हैं,वहीं दूसरी ओर यह चीन-पाकिस्तान धुरी को और मजबूत बनाकर भारत की सुरक्षा और सामरिक स्वतंत्रता के लिए नई चुनौतियां  उत्पन्न करते हैं। भारत के हित इसी में हैं कि वह सभी से मित्रता रखे,परंतु निर्भरता किसी पर न  बनाएं। यही नीति भारत को आने वाले समय में रूस-चीन समीकरणों के बीच सही संतुलन और सम्मानजनक स्थान दिला सकती है।

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