अंतरराष्ट्रीय संबंधों की वास्तविकता यह है की यहां न तो कोई स्थाई दोस्त होता है,न स्थाई दुश्मन होता है और न ही कोई स्थाई गठबंधन होता है। राष्ट्रीय हितों के संवर्धन के लिए समय,परिस्थिति और रणनीतिक लाभ के अनुसार दोस्त और दुश्मन बदलते रहते हैं। तेल की दुनिया के दो मजबूत साथी माने जाने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के रास्ते अब अलग अलग हो गए है। सऊदी अरब नियन्त्रण और संतुलन की यथार्थता को स्वीकार करके पाकिस्तान के प्रभाव में चीन की ओर जाने को तैयार है,वहीं संयुक्त अरब अमीरात ने ओपेक से अलग होने की घोषणा कर रणनीतिक स्वायत्ता को संदेश दे दिया है। दरअसल तेल की दुनिया में मजबूत हैसियत रखने वाले संयुक्त अरब अमीरात का ओपेक से अलग होने का निर्णय आर्थिक साधनों का रणनीतिक उपयोग बेहतर तरीके से कर भू-राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने की कोशिश नजर आता है।
मध्यपूर्व की सबसे प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था संयुक्त अरब अमीरात को वी द यूएई 2031 योजना के तहत,देश का लक्ष्य सतत विकास और एक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है। वह मध्यपूर्व की धार्मिक और सामरिक प्रतिद्वंदिता का शिकंजे से बाहर निकलकर तथा तेल पर निर्भरता कम करके पर्यटन,एआई और एयरोस्पेस पर आधारित विकास परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। भू-अर्थशास्त्र आज की विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। विभिन्न देश अब व्यापार,निवेश और तकनीक के माध्यम से अपनी शक्ति और प्रभाव बढ़ा रहे है,जिससे वैश्विक राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। भौगोलिक रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित यूएई एक प्रमुख वैश्विक व्यापारिक केंद्र है। 2015 से भारत के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी और अब ओपेक से अलग रुख उसके बढ़ती भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है।
ईरान और अमेरिका युद्द में संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान के कई हमलों को झेला है और वह ईरान समेत सऊदी अरब जैसे देशों से नाराज है। ऐसी परिस्थितियों में यूएई के आगामी कदम मध्यपूर्व की राजनीति पर गहरे असर डाल सकते है। यूएई के अमेरिका,इजराइल और भारत से मजबूत सम्बन्ध है और मध्यपूर्व की बदलती परिस्थितियों में इसका व्यापक रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव देखने को मिल सकता है। दुनिया के धनी देशों में शुमार यूएई की पूंजी, इज़राइल की तकनीक,भारत का बाजार और अमेरिका का समर्थन,मध्यपूर्व के नये आर्थिक-रणनीतिक समूह के रूप में गेमचेंजर साबित हो सकते है। इसकी संभावना इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि इन देशों ने सहयोग का खाका पहले ही तैयार कर लिया था। गौरतलब है की आई2यू2 2021 में स्थापित भारत, इज़राइल,संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका का एक रणनीतिक और आर्थिक गठबंधन है,इसे पश्चिम एशियाई क्वाड भी कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग,व्यापार,जल,ऊर्जा,परिवहन,अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देना है। यूएई के ओपेक से बाहर होते ही आई2यू2 के मजबूत होने की संभावनाएं बढ़ गई है। यह समूह आपसी व्यापार,साझा सुरक्षा और कूटनीतिक उद्देश्यों के लिए एक साथ आगे बढ़ सकता है।
ईरान से युद्द में सऊदी अरब के रुख से ट्रम्प ने अपनी नाराजगी कई बार सार्वजनिक रूप से जाहिर की है और इससे अमेरिका के इस मजबूत सहयोगी से संबंधों पर असर पड़ना तय है। युद्द के बीच सऊदी अरब में पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों का जाना,अमेरिका पर से सऊदी अरब की सैन्य निर्भरता कम करने की कोशिश ज्यादा नजर आई। मध्यपूर्व में अमेरिका के रणनीतिक हित सऊदी अरब,पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य गठबंधन से प्रभावित हो सकते है,ट्रम्प इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हो सकते है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात मध्य पूर्व में एक प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक शक्ति है। यह फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक स्थान पर स्थित है,जो पूर्व और पश्चिम के बीच एक प्रमुख व्यापारिक हब के रूप में काम करता है। अमेरिका के लिए यह देश बहुत महत्वपूर्ण है और ओपेक से अलग होकर यूएई ने अमेरिका को मजबूत ही किया है। इससे अमेरिका की शैल नीति या शैल क्रांति को व्यापक मजबूती मिल सकती है। शैल क्रांति,अमेरिका में 2000 के दशक की शुरुआत आई एक तकनीकी क्रांति है,जिसने अमेरिका की ऊर्जा व्यवस्था को मूल रूप से बदलते हुए उसे वैश्विक शक्ति संतुलन में नई ऊँचाई पर पहुंचा दिया। हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग और क्षैतिज ड्रिलिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से अमेरिका ने चट्टानों में फंसे तेल और गैस का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अमेरिका,जो कभी पश्चिम एशिया पर ऊर्जा के लिए निर्भर था,वह स्वयं एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक बन गया।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता ने अमेरिका की विदेश नीति को अधिक स्वतंत्र बनाया। अब उसे मध्य पूर्व के तेल पर निर्भर रहने की मजबूरी नहीं रही,जिससे वह वहां के जटिल संघर्षों में सीमित हस्तक्षेप की नीति अपना सका। इसके साथ ही,वैश्विक ऊर्जा बाजार में अमेरिका की बढ़ती उपस्थिति ने उसे आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर लाभ पहुंचाया। ऊर्जा निर्यात के माध्यम से उसने न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया,बल्कि यूरोप और एशिया के देशों पर भी प्रभाव बढ़ाया। इस क्रांति का सबसे बड़ा असर सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों पर पड़ा। पहले जहां ओपेक के माध्यम से सऊदी अरब तेल की कीमतों और आपूर्ति को नियंत्रित करता था,वहीं अमेरिकी शेल उत्पादन ने इस नियंत्रण को कमजोर कर दिया। वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सऊदी की बाजार हिस्सेदारी घटी और कीमतों पर उसका प्रभाव सीमित हो गया। 2014-15 में सऊदी अरब ने उत्पादन बढ़ाकर कीमतें गिराने की रणनीति अपनाई,जिससे अमेरिकी शेल कंपनियां बाजार से बाहर हो जाएं। लेकिन इसके विपरीत,अमेरिकी कंपनियों ने अपनी तकनीक और लागत दक्षता में सुधार कर लिया,जिससे वे और अधिक प्रतिस्पर्धी बन गईं। परिणामस्वरूप,सऊदी अरब को आर्थिक दबाव और राजकोषीय घाटे का सामना करना पड़ा। इस प्रकार शेल क्रांति ने अमेरिका को ऊर्जा महाशक्ति बना दिया,जबकि सऊदी अरब के पारंपरिक वर्चस्व को चुनौती मिली,जिससे वैश्विक भू-राजनीति में शक्ति संतुलन का पुनर्निर्माण हुआ।
वहीं यूएई अमेरिका और सऊदी अरब की प्रतिद्वंदिता से अलग होकर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनने की ओर आगे बढ़ा और अब वह ओपेक से अलग होकर अमेरिका का तकनीकी फायदा लेना चाहता है। यूएई यह बखूबी जानता है की इज़राइल के साथ सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से वह मुस्लिम दुनिया को नाराज कर सकता है,जिसका जोखिम वह लेना नहीं चाहता। लेकिन इजराइल से उसने संबंधों को मजबूत किया है,जिससे इजराइल की तकनीक का फायदा उठाया जा सके। इज़राइल तकनीकी नवाचार का केंद्र है,सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद उसने कृषि,जल प्रबंधन,साइबर सुरक्षा और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। ड्रिप इरिगेशन से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक,उसकी तकनीकें वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त है। यूएई-इजराइल संबंध आधुनिक पश्चिम एशियाई राजनीति में नए गठबंधनों और बदलते हितों का प्रतीक है। अमेरिका के हितों का ध्यान रखते हुए यूएई ने इजराइल के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए है और यह स्थिति ट्रम्प की मंशा के अनुरूप है।
यूएई के लिए भारत बेहद महत्वपूर्ण देश है जबकि संयुक्त अरब अमीरात भारत की अर्थव्यवस्था के लिए काफ़ी अहम देश है। भारत से यूरोप तक बनने वाले नए आर्थिक गलियारे में यूएई की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह कॉरिडोर,जिसे भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा कहा जाता है,वैश्विक व्यापार और कनेक्टिविटी को नया स्वरूप देने की क्षमता रखता है। यह भारत को यूएई,सऊदी अरब,जॉर्डन,इजराइल और यूरोप से समुद्री और रेल मार्ग द्वारा जोड़कर व्यापार को आसान,तेज और सस्ता बनाने की पहल है,जिसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका की चीन के प्रभाव को कम करने के लिए इस परियोजना में गहरी दिलचस्पी है।
यूएई की कुल आबादी नब्बे लाख है और इसमें दो तिहाई प्रवासी है। इन प्रवासियों में करीब छब्बीस लाख भारतीय है,यह कुल आबादी लगभग का तीस फ़ीसदी है और यह प्रवासियों का सबसे बड़ा हिस्सा है। यूएई दुनिया का दूसरा देश है,जहां भारत का सबसे ज़्यादा निर्यात है। दुबई भारत के लिए व्यापार,यात्रा और आपूर्ति प्रबंधन का हब है,हर साल लाखों लोग यहां से आवाजाही करते है। दुबई जाने वाले पर्यटकों में सबसे ज़्यादा भारतीय होते है और यहां स्थित कंपनी डीपी वर्ल्ड और एमार का भारत में बड़ा निवेश है तो दूसरी तरफ़ भारतीय कंपनियों ने भी दुबई को अपना केंद्र बना रखा है। संयुक्त अरब अमीरात के विकास में भारतीय प्रवासियों की अहम भूमिका रही है,यहां श्रमिकों से लेकर सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों और तकनीकी विशेषज्ञों तक,सबसे अधिक संख्या भारतीयों की है।
आई2यू2 की मजबूती के लिए यह अनुकूल समय दिखाई पड़ रहा है। यदि कृषि क्षेत्र में कोई परियोजना शुरू की जाती है,तो इज़राइल तकनीक प्रदान करेगा, यूएई निवेश करेगा,भारत उस परियोजना को बड़े पैमाने पर लागू करेगा और अमेरिका उसे वैश्विक बाजार और रणनीतिक संरक्षण उपलब्ध करा सकता है। यही कारण है कि यह मॉडल,पारंपरिक गठबंधनों से अलग बन सकता है,जहां आर्थिक और तकनीकी सहयोग बेहतरीन परिणाम दे सकता है। इसका फायदा इन चारों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा। भारत में खाद्य प्रसंस्करण,नवीकरणीय ऊर्जा,संग्रह,भंडारण,परिवहन और वितरण के क्षेत्र में यूएई के निवेश और इज़राइल की तकनीक का संयोजन बड़े बदलाव ला सकता है। इसके साथ ही अमेरिका के समर्थन से भारत की वैश्विक स्थिति और मजबूत हो सकती है।
सऊदी अरब ने अपनी विजन-2030 योजना के तहत अर्थव्यवस्था को विविधीकृत करने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के प्रयास तेज किए है तथा अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर रियाद में क्षेत्रीय मुख्यालय स्थापित करने का दबाव भी डाला है। सऊदी अरब लंबे समय से धार्मिक और तेल शक्ति के कारण मध्य पूर्व का प्रमुख नेता रहा है। वहीं यूएई एक आधुनिक,तकनीक-आधारित और वैश्विक निवेश केंद्र के रूप में उभर रहा है। उसकी खुली अर्थव्यवस्था और तेज निर्णय क्षमता उसे एक वैकल्पिक नेतृत्व मॉडल प्रदान करती है,जो पारंपरिक सऊदी मॉडल को चुनौती देता है। पाकिस्तान के सैन्य गठबंधन में शामिल होकर सऊदी अरब ने भारत,इजराइल और यूएई के लिए जो रणनीतिक चुनौती बढाई थी,यूएई ने ओपेक से अलग होकर मध्यपूर्व ,तेल के भू-अर्थशास्त्र और भू-राजनीति में बदलाव की संभावनाओं को प्रबल कर दिया है।