article भारत मे आतंकवाद

कितना सुरक्षित है भारत

राष्ट्रीय सहारा,26/11 के बाद कितना सुरक्षित है भारत   

दुनिया की ख्यात सुरक्षा एजेंसी मोसाद के जासूसों और एजेंट्स के इतने बड़े नेटवर्क और पूरे इलाक़े में हाइटेक सर्विलांस के बाद भी इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी। हमास के आतंकी बड़ी संख्या में जमीन,आसमान और समन्दर के रास्ते एक साथ इजराएल में घुसे,लोगों को निर्ममता से मारा तथा कई लोगों को अपहरण कर साथ ले गए।  हमास के इस पूरे अभियान में करीब 12 घंटे तक इजराइल की सुरक्षा एजेंसियां और फौजी दस्ते अप्रभावी रहे। 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई में समुद्र के रास्ते घुसे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने भी ऐसा ही कोहराम मचाया था। इस आतंकी हमलें के बाद भारत में सुरक्षा को चाक चौबंद करने के लिए कई कदम उठाएं गए लेकिन इजराइल पर हालिया आतंकी हमलें से यह तथ्य फिर उभर कर आएं है की आतंकियों के गैर पारम्परिक ढंग से किए गए हमलें से बचने के लिए क्या भारत की सुरक्षा एजेंसियां तैयार है।

ऐसा भी नहीं है की भारत पर आतंकी हमलें का खतरा नहीं है। आतंक का सरोकार और दायरा महज सामरिक नहीं होता,यह आर्थिक अथवा सांस्कृतिक भी हो सकता है। भारत की प्राकृतिक जटिलताएं कश्मीर और उत्तर पूर्व में आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौतियां पेश करती है तो नेपाल की सीमा से भारत में दाखिल होकर पाकिस्तान सीमा हैदर अपने चार बच्चों के साथ यूपी घूमते हुए दिल्ली तक पहुंच जाती है। कई महीनों के बाद यह बात सुरक्षा एजेंसियों को खबर लगती है। नेपाल सीमा के रास्ते भारत में दाखिल होने वाले आतंकियों के फेहरिस्त लम्बी है,इसके बाद भी  अवैध रूप से आवागमन जारी है।

भारत-म्यांमार सीमा के क़रीब म्यांमार सेना और सैन्य शासन का विरोध कर रहे बलों के बीच तेज़ हुई झड़पों के बीच  हजारों विस्थापित लोग म्यांमार से मिज़ोरम  पहुंचे हैं। म्यांमार-भारत सीमा के बेहद क़रीब जो झड़पें हो रही हैं,उसका असर बॉर्डर की स्थिति पर हुआ है। दोनों तरफ़ के लोग आसानी से इधर-उधर जा सकते हैं। वहीं भारत-बांग्लादेश सीमा की लम्बाई करीब चार हजार किलोमीटर की है,जिसमें अभी तक  करीब तीन हजार किलोमीटर की सीमा पर नजर रखने के लिए बुनियादी ढाँचागत व्यवस्थाओं को व्यवस्थित किया गया है। एक हजार किलोमीटर की सुरक्षा अभी चुनौतीपूर्ण है। दोनों देशों के बीच दक्षिण बंगाल सीमांत  क्षेत्र है जो मालदा से लेकर सुंदरबन तक फैला है। इसका 360 किमी. का बड़ा भाग तटवर्ती है,जहां दो देशों के मध्य प्रवाहित होने वाली  नदियां एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा का कार्य करती हैं। तस्करी के लिए यह क्षेत्र कुख्यात है।

मुम्बई पर आतंकी हमलें के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी या एनआईए का गठन किया गया था। इस संबंध में संसद ने एक अधिनियम पारित किया था,जिसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम 2008 कहा जाता है। एनआईए गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है।  यह एजेंसी देश और देश से बाहर किसी मामले की  जांच कर सकती है। राज्य पुलिस की जिम्मेदारी है कि वो एनआईए को जांच में सहयोग करे और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराएं। इसे राज्यों से विशेष अनुमति के बिना भी राज्यों में आतंकवाद से संबंधित अपराधों की जाँच करने का अधिकार है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाइयों का कई बार स्थानीय पुलिस को पता नहीं होता। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है की भारत में अभी भी विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच भरोसे और समन्वय की कमी है।.

मानव तस्करी,जाली मुद्रा या बैंक नोट,प्रतिबंधित हथियारों का निर्माण या बिक्री,साइबर आतंकवाद,विस्फोटक पदार्थ के तहत अपराध तथा गैर क़ानूनी गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी कार्रवाई कर सकती है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है और हैदराबाद,गुवाहाटी,कोच्चि,लखनऊ,मुंबई,कोलकाता,जयपुर, जम्मू में इसकी क्षेत्रीय शाखाएं हैं। जाहिर है आतंकी हमलें के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी को देश में कहीं पर भी पहुँचने में समय लग  सकता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है की स्थानीय पुलिस आतंकी हमलों से फौरी तौर पर निपटें। पुलिस का आधुनिकीकरण करने के तमाम दावें धराशायी नजर आते है। देश में विभिन्न राज्यों के पुलिस विभागों में संख्या बल की भारी कमी है। करीबी पांच दशक पहले पुलिस सुधारों को लेकर धर्मवीर की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय पुलिस आयोग बनाया गया था। इसकी सिफारिशों पर अभी तक अमल नहीं किया गया है। इस आयोग की प्रमुख सिफारिशें थी की,हर राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए, जांच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग किया जाए,पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिये एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए,पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय किया जाए तथा एक नया पुलिस अधिनियम बनाया जाए। भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग,आईबी या एनआईए को पुलिस के आधुनिकीकरण से बहुत मजबूती मिल सकती है,लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के सरोकार किसी राष्ट्र की सीमा तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक उपलब्धियों और वैश्विक भागीदारियों ने इसका स्वरूप वृहत कर दिया है। आम तौर पर यह माना जाता है की आतंकी गोलीबारी,अपहरण,बमबारी और आत्मघाती हमलों तक सीमित रहेंगे। यह रणनीतियां अधिक पारंपरिक हैं और कई आतंकवादी समूहों के संचालन में व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं। लेकिन यह समझने की जरूरत है की रासायनिक आतंकवाद,जैव आतंकवाद,परमाणु आतंकवाद अथवा जहरीली गैसों के अपारम्परिक तरीकों का खतरा भी अब बढ़ गया है। भूमिगत सुरंगों के उपयोग से हथियारों की तस्करी से चुनौती को ओर बढ़ा दिया है। किसी भी देश या स्थान की वैधानिक व्यवस्था को नष्ट करने के लिए  तथा भय का माहौल कायम करने के लिए आतंकी हमलें को महत्वपूर्ण साधन के रूप में उपयोग किया जाता है। इसका स्वरूप कैसा भी हो सकता है और इसके लिए सावधानी के साथ सदैव तैयार रहने की जरूरत है।

एनआईए के अस्तित्व में आने के बाद आतंकियों के डेटा बेस तैयार करके उन पर नजर रखने से सफलता मिली है। टेरर फंडिंग को लेकर भी गैर सरकारी संगठनों और धर्मार्थ समूहों पर नकेल कसने के प्रभावी परिणाम भी हुए है। लेकिन  पिछले  एक दशक में संचार प्रौद्योगिकी में हुई क्रांति ने आतंकवादी संगठनों के संचार के तरीके को नाटकीय रूप से बदल दिया है। ईमेल,फैक्स प्रसारण,वेबसाइट,सेल फोन और सैटेलाइट टेलीफोन ने संगठनों के लिए वैश्विक रणनीति पर विचार करना संभव बना दिया है। आतंकी संचार के नये नये तरीके ढूंढ रहे है,जिनका पता लगाना आसान नहीं होता।

अभी भी देश में अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली पूरी तरीके से लागू नहीं हो सकी है,पुलिस की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का अभाव है,एकीकृत सीमा सुरक्षा संरचना को लेकर जटिलताएं है,क्रिमिनल डेटाबेस सिस्टम को मजबूत और समन्वित किए जाने की जरूरत है तथा  एक एकीकृत सुरक्षा प्रणाली की दरकार बनी हुई है। मुम्बई के जिम्मेदार आतंकी अभी भी पाकिस्तान में खुले घूम रहे है। जाहिर है सुरक्षा की चुनौतियां बदस्तूर जारी है।

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