article भारत मे आतंकवाद

खत्म हो जाएंगे बांग्लादेश में हिन्दू…!

नवभारत

 बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों पर हमले,सामाजिक और राजनीतिक दबाव तथा कट्टरपंथी संगठनों की सक्रियता ने इस भय को और गहरा किया है की यह देश पूर्ण इस्लामवाद की और तेजी से बढ़ रहा है। यदि कट्टरपंथी सोच को लगातार राजनीतिक संरक्षण मिलता है तो स्थिति और संवेदनशील हो सकती है।बांग्लादेश में अगले महीने संसदीय चुनाव होने वाले हैं,जो शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के प्रतिबंध और सत्ता परिवर्तन के बाद पहला बड़ा राजनीतिक परीक्षण होगा। चुनावी तैयारी के बीच नेशनल सिटीजन पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरवादी तत्वों के बीच गठबंधन अल्पसंख्यकों की चिंताओं का बढ़ा रहा है।जमात-ए-इस्लामी का इतिहास लंबे समय से कट्टर इस्लामी विचारधारा के साथ जुड़ा रहा है और यह 1971 के स्वतंत्रता संघर्ष में भी विवादों में रही है। उसकी राजनीतिक वापसी धार्मिक कट्टरता की पुनः वृद्धि का जोखिम पैदा कर सकती है। इससे बांग्लादेश के हिन्दूओं  और अन्य धार्मिक समूहोंकी सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों पर संभावित नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान इसे एक आधुनिक,लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र  बनाना चाहते थे। 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश अस्तित्व में आया था,तब यहां हिंदू समुदाय की आबादी लगभग बीस फीसदी से अधिक थी। यह संख्या आज घटकर नौ फीसदी के आसपास सिमट चुकी है। यह गिरावट आकस्मिक नहीं,बल्कि लगातार जारी सामाजिक-राजनीतिक दबाव, हिंसा,कट्टरवाद,कानूनी विसंगतियों और भय के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है। यदि हिन्दूओं पर होने वाले उत्पीड़न को नहीं रोका गया आने वाले दशकों में बांग्लादेश में हिंदू समुदाय का अस्तित्व इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगा।बीते कुछ दशकों में बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा का प्रभाव गहरा हुआ है। जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन,जिनकी वैचारिक जड़ें पाकिस्तान समर्थक राजनीति से जुड़ी रही हैं,समाज में एक ऐसी कठोर धार्मिक सोच को विस्तार दे रहे हैं जो बहुलता, सहिष्णुता और विविधता के विरुद्ध खड़ी है। यह वही संगठन है जिसने अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद बांग्लादेश बनेगा अफगानिस्तान जैसे नारे गढ़कर युवाओं को कट्टरता की ओर उकसाने का प्रयास किया।इसी विचारधारा के परिणामस्वरूप ईशनिंदा के नाम पर हिंसा,अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना,धार्मिक स्थलों पर हमले और सामाजिक तनाव की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। विभिन्न अवसरों पर दुर्गा पूजा जैसे बड़े उत्सवों के दौरान मंदिरों और पंडालों को निशाना बनाया गया,मूर्तियों को तोड़ा गया और भय का वातावरण पैदा किया गया। कई घटनाओं में पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासन के देर से हस्तक्षेप ने हालात को और बिगाड़ा है।

यह हिंसा किसी एक घटना या किसी विशेष कालखंड तक सीमित नहीं रही। बांग्लादेश का नौआखाली क्षेत्र हो या चिटगाँग,सिलहट और खुलना  में धार्मिक तनाव और हिंसा की घटनाएं समय-समय पर उभरती रही हैं। आज भी अनेक हिन्दू परिवारों के लिए अपने त्योहार मनाना साहस का काम हो गया है।सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि ये घटनाएं अब केवल भीड़ की भावनात्मक उत्तेजना तक सीमित नहीं दिखतीं,बल्कि इनके पीछे संगठित प्रयासों और योजनाओं के संकेत मिलते हैं। ईशनिंदा के नाम पर घर जलाना,दुकानों पर कब्ज़ा करना, संपत्तियों पर दावा ठोकना और भय पैदा कर पलायन के लिए मजबूर करना,इस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है।बांग्लादेश से हिंदू पलायन का एक सबसे प्रमुख कारण संपत्ति संबंधी असुरक्षा है। वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट ने हिन्दूओं की भूमि को कानूनी रूप से असुरक्षित बना दिया है। 1965 से 2006 के बीच लगभग 26 लाख एकड़ हिंदू स्वामित्व वाली भूमि पर अवैध कब्ज़ा हुआ है। हालांकि 2001 में वेस्टेड प्रॉपर्टी रिटर्न एक्ट पारित हुआ,किंतु इसके क्रियान्वयन की कमी ने इसे लगभग निष्प्रभावी बना दिया।हालांकि कुछ कानूनों में सुधार किए गए, रिटर्न एक्ट लाया गया,परंतु उसका क्रियान्वयन आज भी कमजोर है। प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इसे लगभग निष्प्रभावी बना दिया। इस प्रकार संपत्ति का संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान का प्रश्न बन गया है। बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से ध्रुवीकरण का शिकार रही है। सत्ता परिवर्तनों,आपसी संघर्षों और वैचारिक टकरावों ने एक स्थिर सामाजिक माहौल के निर्माण को कठिन बना दिया है। राजनीतिक अस्थिरता के समय अल्पसंख्यक समुदाय सबसे आसान निशाना बन जाते हैं। कई बार हिंदूओं को किसी एक राजनीतिक धड़े का समर्थक बताकर बदले की कार्रवाई की जाती है।इसके अतिरिक्त, पिछले वर्षों में सरकार के परिवर्तन और प्रशासनिक ढांचे में आए असंतुलन का लाभ कट्टरपंथी समूहों ने उठाया है। इससे कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता कम हुई और अल्पसंख्यकों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर पड़ा। परिणामस्वरूप, कई बार वे शिकायत दर्ज कराने से भी हिचकिचाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि न्याय के बजाय प्रतिशोध का खतरा बढ़ जाएगा।

भारत और बांग्लादेश के बीच  करीब चार हजार किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा है। यह सीमा केवल भूगोल नहीं, बल्कि जनसांख्यिकी, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील है। जब बांग्लादेश में हिंदूओं पर संकट बढ़ता है, तो इसका प्रभाव भारत के पूर्वोत्तर और बंगाल क्षेत्रों पर भी पड़ता है। अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी, कट्टर विचारधारा का प्रसार और अवैध गतिविधियाँ क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती बनती हैं।बांग्लादेश का हिंदू समुदाय आज भी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। त्योहार मनाने से लेकर अपनी संपत्ति बचाने और पहचान सुरक्षित रखने तक, हर स्तर पर उन्हें चुनौतियों का सामना है। मंदिरों पर हमले, मूर्तियों का अपमान, व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा और सामाजिक उत्पीड़न के कारण वे निरंतर भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं।कई हिंदू संगठन कहते हैं कि यदि राज्य की मशीनरी समय पर और सख़्त कार्रवाई करे, तो हालात सुधर सकते हैं। परंतु प्रशासनिक निष्क्रियता, राजनीतिक दबाव और सामाजिक संकोच के कारण कई बार अपराधियों को संरक्षण मिलता है और पीड़ितों को न्याय से वंचित रहना पड़ता है।

बांग्लादेश का संविधान उसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करता है,परंतु वास्तविकता यह है कि सामाजिक वातावरण में कट्टरता का प्रभाव बढ़ रहा है। यदि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, समान अधिकार,संपत्ति की गारंटी और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए,तो बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान गंभीर संकट में पड़ सकती है।कठोर कानून, त्वरित न्याय, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक सुधार की दिशा में सशक्त कदम उठाने की जरूरत है लेकिन कट्टरपंथी तत्वों के प्रभाव के चलते यह संभव नहीं दिखाई पड़ता।बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की स्थिति किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही एक लंबी प्रक्रिया का दुष्परिणाम है। लगातार हिंसा, कानूनी अन्याय, राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव ने उन्हें अपने ही देश में असुरक्षित बना दिया है।यदि यह प्रवृत्ति नहीं रुकी,तो बांग्लादेश न केवल अपने अल्पसंख्यक समुदाय को खो देगा, बल्कि अपनी ऐतिहासिक विरासत, बहुलतावादी सामाजिक ताने-बाने और लोकतांत्रिक मूल्यों से भी दूर होता चला जाएगा।

बांग्लादेश की राजनीति में अवामी लीग को अपेक्षाकृत अल्पसंख्यकहितैषी माना जाता रहा है। उसकी सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के कुछ ठोस प्रयास हुए। लेकिन जैसे ही राजनीतिक समीकरण बदलते हैं या विपक्षी दलों को मजबूती मिलती है, अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के बीच असुरक्षा की भावना गहरी हो जाती है। इस समय बांग्लादेश की राजनीति और समाज में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव ने अल्पसंख्यकों के लिए नई चिंताएं  खड़ी कर दी हैं। पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी संगठनों, विचारधारा और वित्तीय नेटवर्क के विस्तार ने बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता को मजबूत किया है। जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े समूह पाकिस्तान की वही धार्मिक-सांप्रदायिक रणनीति को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका उद्देश्य समाज को कठोर इस्लामी पहचान की ओर मोड़ना है। परिणामस्वरूप हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर दबाव, भय और असुरक्षा बढ़ी है।पाकिस्तान की एजेंसियों द्वारा बांग्लादेश को एक वैकल्पिक रणनीतिक आधार के रूप में उपयोग करने की कोशिशें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा हैं। इससे भारत-बांग्लादेश संबंध,सीमा सुरक्षाऔर दक्षिण एशिया की स्थिरता पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यदि कट्टरपंथ को राजनीतिक संरक्षण मिला तो बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान कमजोर पड़ेगी और अल्पसंख्यकों का पलायन बढ़ सकता है। बांग्लादेश में वर्तमान हालात इतने खराब है की आने वाले वर्षों में यहां हिंदू आबादी बेहद कम हो जाएगी या समाप्त भी हो सकती है।

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