नवभारत
इतिहास किसी भी राजनेता का मूल्यांकन उसके जीवनकाल में लिए गए निर्णयों, किए गए कार्यों और उनके दीर्घकालिक परिणामों के आधार पर करता है। किसी नेता की वास्तविक विरासत उसके पद, व्यक्तित्व या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि उसने अपने देश, समाज और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर कितना स्थायी प्रभाव छोड़ा। अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के साथ भी यही स्थिति है। चार दशकों से अधिक समय तक ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में उन्होंने ईरान की राजनीतिक और वैचारिक दिशा तय करते हुए पश्चिम एशिया की भू-राजनीति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका और इज़राइल के साथ संबंधों तथा प्रतिरोध की धुरी की रणनीति को गहराई से प्रभावित किया। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की अंतिम बिदाई में दुनिया भर की कई हस्तियां तेहरान पहुंच रही है। शियाओं के सबसे बड़े धर्मगुरु ने चार दशकों तक ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर रहकर ईरान की आंतरिक तथा बाहरी नीतियों पर इतनी गहरी छाप छोड़ी। लेकिन अब यह बड़ा सवाल है की क्या मोजतबा ख़ामेनेई इस विरासत को आगे ले जा पाएंगे। इससे ही ईरान का भविष्य भी तय होगा।
1989 में अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद जब अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने सर्वोच्च नेता का पद संभाला, तब बहुत कम लोगों ने अनुमान लगाया था कि उनका कार्यकाल लगभग चार दशकों तक चलेगा और ईरान की आंतरिक तथा बाहरी नीतियों पर इतनी गहरी छाप छोड़ेगा। ख़ामेनेई के नेतृत्व की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने इस्लामी क्रांति की वैचारिक निरंतरता बनाए रखी। उन्होंने विलायत-ए-फ़क़ीह की अवधारणा को केवल संवैधानिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे ईरानी राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़ दिया। उनके नेतृत्व में सर्वोच्च नेता का पद ईरान की वास्तविक सत्ता का केंद्र बन गया, जबकि राष्ट्रपति और संसद जैसी निर्वाचित संस्थाएँ अपेक्षाकृत सीमित भूमिका में रहीं।
सुरक्षा और रक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को एक सैन्य संगठन के साथ उसे आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली संस्था में परिवर्तित कर दिया। मिसाइल तकनीक, ड्रोन निर्माण, साइबर क्षमता तथा रक्षा उद्योग में ईरान की आत्मनिर्भरता का अधिकांश श्रेय उनके नेतृत्व को दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और तकनीकी अवरोधों के बावजूद ईरान ने स्वदेशी रक्षा क्षमता विकसित की, जिसने उसे पश्चिम एशिया की एक प्रमुख सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया।
विदेश नीति में ख़ामेनेई का दृष्टिकोण स्पष्ट और दीर्घकालिक रहा। उन्होंने अमेरिका और इज़राइल के विरुद्ध कठोर नीति अपनाई तथा लेबनान, सीरिया, इराक और यमन में ईरान के प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास किया। इस रणनीति ने ईरान को क्षेत्रीय शक्ति अवश्य बनाया, किन्तु इसके कारण पश्चिमी देशों के साथ टकराव भी बढ़ता गया। परमाणु कार्यक्रम के संदर्भ में भी ख़ामेनेई का रुख निर्णायक रहा। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सम्मान और रणनीतिक सुरक्षा का विषय बताया। यद्यपि 2015 के परमाणु समझौते को उन्होंने स्वीकार किया, फिर भी पश्चिमी देशों के प्रति उनका अविश्वास कभी समाप्त नहीं हुआ। यदि ईरान ने अपनी सामरिक क्षमता विकसित नहीं की होती, तो वह बाहरी दबावों का सामना नहीं कर पाता। इसी नीति के कारण ईरान वर्षों तक कठोर आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना करता रहा।
आर्थिक क्षेत्र उनके शासनकाल का सबसे विवादास्पद पक्ष रहा। उनकी प्रतिरोध अर्थव्यवस्था का उद्देश्य विदेशी निर्भरता कम कर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना था। कुछ क्षेत्रों में स्वदेशी उद्योगों ने उल्लेखनीय प्रगति की, परंतु लगातार प्रतिबंध, महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन, बेरोज़गारी और विदेशी निवेश की कमी ने आम नागरिकों के जीवन को कठिन बना दिया। सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर उनकी सबसे अधिक आलोचना हुई। महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया पर नियंत्रण तथा राजनीतिक विरोधियों के प्रति कठोर रवैये को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान की निरंतर आलोचना होती रही। समय-समय पर हुए जनआंदोलनों और प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने उनकी छवि को और विवादास्पद बनाया। अली ख़ामेनेई की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने बाहरी दबावों, युद्ध जैसी परिस्थितियों और आर्थिक प्रतिबंधों के बीच भी इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था को स्थिर बनाए रखा। लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि वे सामरिक शक्ति और राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ व्यापक आर्थिक समृद्धि तथा सामाजिक संतुलन स्थापित नहीं कर सके। परिणामस्वरूप एक ओर ईरान क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरा, वहीं दूसरी ओर उसके भीतर आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक असंतोष का दायरा भी बढ़ता गया।
अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई को दुनिया एक ऐसे नेता के रूप में जिसने इस्लामी क्रांति को संस्थागत मजबूती दी,एक रणनीतिकार जिसने ईरान को पश्चिम एशिया की निर्णायक शक्ति बनाया,एक वैचारिक व्यक्तित्व जिसने अमेरिका और इज़राइल के दबाव के सामने झुकने के बजाय प्रतिरोध की नीति अपनाई,एक ऐसे शासक के रूप में जिनके शासनकाल में राजनीतिक केंद्रीकरण और मानवाधिकारों को लेकर लगातार विवाद रहे तथा एक ऐसे नेता के रूप में जिनकी नीतियों ने पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। अली ख़ामेनेई के बाद ईरान किस दिशा में जाएगा। इस प्रश्न का उत्तर केवल उत्तराधिकारी के नाम में नहीं, बल्कि उस सत्ता-संरचना में छिपा है जिसे ख़ामेनेई लगभग चार दशकों में निर्मित कर गए हैं।
मोजतबा ख़ामेनेई के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पिता जैसी वैचारिक और धार्मिक वैधता स्थापित करने की होगी। अयातुल्लाह खुमैनी और अली ख़ामेनेई दोनों के पास क्रांति की वैचारिक विरासत और दीर्घ राजनीतिक अनुभव था, जबकि मोजतबा को अभी तक सार्वजनिक नेतृत्व का वैसा अनुभव प्राप्त नहीं है। इसलिए उन्हें धार्मिक प्रतिष्ठान, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स,निर्वाचित सरकार और जनता के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यदि मोजतबा ख़ामेनेई पर व्यापक सहमति नहीं बनती, तो सत्ता के विभिन्न केंद्रों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। ईरान की व्यवस्था अब केवल सर्वोच्च नेता पर निर्भर नहीं है,इसमें गार्ड कॉर्प्स, विशेषज्ञों की सभा, न्यायपालिका, धार्मिक प्रतिष्ठान और आर्थिक शक्ति केंद्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी नया नेतृत्व कठिन परिस्थितियों का सामना करेगा। प्रतिबंध, महंगाई,बेरोज़गारी और निवेश की कमी ऐसे मुद्दे हैं जिनका समाधान केवल वैचारिक भाषणों से संभव नहीं होगा। यदि नई व्यवस्था आर्थिक सुधारों और अंतरराष्ट्रीय संवाद की दिशा में कुछ कदम उठाती है, तो ईरान को राहत मिल सकती है। यदि वर्तमान नीतियां यथावत रहती हैं, तो आर्थिक दबाव और जन-असंतोष दोनों बढ़ सकते हैं। अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ संबंध, परमाणु कार्यक्रम, रूस और चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी तथा पश्चिम एशिया में ईरान की क्षेत्रीय भूमिका पर संतुलित नीति आवश्यक होगी।
अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की सबसे बड़ी विरासत केवल उनकी नीतियां नहीं, बल्कि वह संस्थागत ढांचा है जिसे उन्होंने लगभग चार दशकों में मजबूत किया। लेकिन मोजतबा ख़ामेनेई निर्विवाद नहीं है। उन पर ईरान की चुनाव व्यवस्था में हस्तक्षेप का आरोप लग चूका है। ईरान में सुप्रीम लीडर बहुत सम्मानीय पद होता है और उस पर सेना,धार्मिक सत्ता और राजनीतिक नेताओं का पूरा विश्वास होता है। ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी और अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने देश में नियंत्रण बना कर रखा। लेकिन मोजतबा ख़ामेनेई क्या ऐसा कर पाएंगे,इसी से ईरान का आगामी भविष्य तय होगा। ईरान में सर्वोच्च नेता का पद केवल संवैधानिक अधिकारों का केंद्र नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, राजनीतिक वैधता और सैन्य विश्वास का भी प्रतीक है। इस पद पर सेना, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड, धार्मिक प्रतिष्ठान और राजनीतिक नेतृत्व का पूर्ण विश्वास होना शासन की स्थिरता के लिए आवश्यक माना जाता है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अयातुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी ने क्रांतिकारी वैचारिक नेतृत्व के बल पर व्यवस्था को स्थिर किया, जबकि अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने चार दशकों तक आंतरिक चुनौतियों, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, क्षेत्रीय संघर्षों और राजनीतिक दबावों के बावजूद सत्ता पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखा। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत है।
मोजत्बा ख़ामेनेई के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता की वैधता, आर्थिक सुधार, सामाजिक स्थिरता और क्षेत्रीय प्रभाव के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यही संतुलन ईरान के भविष्य की दिशा तय करेगा। अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के सामने भी यही परिस्थितियां बनी थी लेकिन उन्होंने इसका खूब मुकाबला किया। मोजत्बा ख़ामेनेई को अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की विरासत को आगे बढ़ाने की बड़ी जिम्मेदारी है। ईरान पर अमेरिकी हमलों के बाद पश्चिम एशिया की सामरिक और कूटनीतिक परिस्थितियाँ पहले जैसी नहीं रहीं। लंबे समय तक खाड़ी के अनेक देशों ने ईरान के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद प्रत्यक्ष टकराव से बचने की नीति अपनाई थी, लेकिन अब ईरान के मिसाइल और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर उनकी सुरक्षा संबंधी आशंकाएं पहले से अधिक बढ़ गई है। ईरान को अब केवल इज़राइल और अमेरिका की रणनीतियों का ही नहीं, बल्कि खाड़ी के उन देशों की बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं का भी सामना करना पड़ेगा, जो अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए नए क्षेत्रीय समीकरण बना रहे हैं।
मोजत्बा ख़ामेनेई के सामने सबसे बड़ी चुनौती खाड़ी देशों के साथ विश्वास बहाल करने की होगी। केवल वैचारिक दृढ़ता या सैन्य शक्ति के सहारे ईरान अपने क्षेत्रीय प्रभाव को लंबे समय तक बनाएं नहीं रख सकता। उसे ऐसी कूटनीति अपनानी होगी जो सुरक्षा चिंताओं को कम करे, आर्थिक सहयोग के नए अवसर पैदा करे और क्षेत्रीय तनाव को नियंत्रित रखे। यदि मोजत्बा ख़ामेनेई खाड़ी देशों के साथ विश्वास का नया आधार तैयार करने में सफल होते है, तो ईरान अपनी क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत बनाएं रख सकता है। लेकिन इस समय स्थितियां जटिल है और ईरान को इज़राइल, अमेरिका और खाड़ी देशों के संभावित रणनीतिक समन्वय जैसी कहीं अधिक जटिल चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। ईरान के प्रतिद्वंद्वी देशों की निगाहें इसी संक्रमण काल पर टिकी होंगी। वे यह देखना चाहेंगे कि मोजतबा ख़ामेनेई के दौर में ईरान की निर्णय-क्षमता कमजोर पड़ती है या उसकी संस्थाएं पहले की तरह संगठित रहती हैं। यदि ईरान में आंतरिक मतभेद बढ़ते है, तो इजराइल और अमेरिका उस मौके को छोड़ने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेंगे।
ख़ामेनेई युग के बाद ईरान में विरासत,नेतृत्व और नई चुनौतियां

People hold flags of Iran and Hezbollah as well as posters of Supreme Leader Khamenei as Iranians take to the streets in the downtown Enghelab (Revolution) Square in Tehran, Iran on June 24, 2025, to celebrate the ceasefire after a 12-day war with Israel. Iranian officials claim victory and believe that Iran imposed the ceasefire on the US and Israel after attacking Al-Udeid US air base in Qatar. (Photo by Negar / Middle East Images via AFP) (Photo by NEGAR/Middle East Images/AFP via Getty Images)
