भारत ने चार यूरोपीय देशों के साथ पिछले साल मार्च में एक मुक्त व्यापार समझौता किया था,उस दौरान स्विट्ज़रलैंड के अर्थव्यवस्था मंत्री गाइ पार्मेलिन ने कहा था कि भारत व्यापार और निवेश के लिए अपार अवसर देने वाला देश है। यह भी दिलचस्प है कि 1990 के दशक में ही भारत ने अपनी इस क्षमता को पहचान लिया था और व्यापक आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए मुक्त व्यापार की व्यापक वैश्विक आर्थिक अवधारणा को अंगीकार कर लिया था। भारत से आर्थिक भागीदारी के अवसर उस अमेरिका के लिए भी बेहतरीन थे,जो सामरिक कूटनीति के कई मोर्चों पर भारत के लिए कठिनाई बढ़ाता रहा था। बीते चार दशक में भारत अमेरिका रिश्ते उतार चढ़ाव की आशंकाओं को खत्म कर साझेदारी के नए आयाम स्थापित कर चूके है। लेकिन अब ट्रम्प का चश्मा भारत से साझेदारी को लेकर नए ढांचे को तलाश रहा है और यह स्थिति भारत की कूटनीति के लिए नई चुनौती है।
ट्रम्प के शपथ समारोह में जिनपिंग के आमन्त्रण और प्रधानमंत्री मोदी को न आमंत्रित किए जाने को लेकर कूटनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा हुई। लेकिन भारत और अमेरिका का संबंधों के इस इतिहास को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए की दोनों देशों के बीच औपचारिक या अनौपचारिक सम्बन्धों से ज्यादा महत्वपूर्ण वे साझा हित है जिन्हें न तो भारत नजरअंदाज कर सकता है और न ही अमेरिका इससे मुंह फेर सकता है। व्यापार,निवेश एवं कनेक्टिविटी के माध्यम से वैश्विक सुरक्षा,स्थिरता तथा आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देने में दोनों देशों के साझा हित हैं।
ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल अमेरिका के हितों को वरीयता देने की नीति पर आधारित है,लेकिन अमेरिका की विदेश नीति इसी पर आधारित रही है। अत: वैश्विक समुदाय को ज्यादा आशंकित होने की जरूरत नहीं है,खासकर भारत को तो बिल्कुल भी नहीं। यहां पर जटिलताएं भारत की हालिया विदेश नीति ने उत्पन्न की है जिसे दुरुस्त किए जाने की जरूरत महसूस होने लगी है। अमेरिका ने साम्यवादी अधिनायकवाद को खत्म करने के लिए सार्वजनिक कूटनीति को बखूबी आगे बढ़ाया है. संयुक्त राज्य अमेरिका का सार्वजनिक कूटनीति अभियानों में निवेश करने का एक लंबा और उल्लेखनीय इतिहास रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद,मार्शल योजना ने यूरोप के पुनर्निर्माण में मदद की। कानूनी, राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियों को मजबूत किया जो यूरोप के अधिकांश हिस्सों को अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के साथ समन्वय करने में सफल रही। मार्शल योजना विचारों और मूल्यों के संचार के बारे में उतनी ही थी जितनी कि सहायता,प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी के बारे में। शीत युद्ध के दौरान,अमेरिकी सूचना एजेंसी ने मुक्त-बाज़ार और लोकतांत्रिक प्रणालियों के गुणों को बढ़ावा देकर साम्यवाद का सामना करने के लिए एक बहुमुखी प्रयास की देखरेख की। आदान-प्रदान,रेडियो प्रोग्रामिंग और प्रकाशनों ने आयरन कर्टन के पीछे रहने वाले समुदायों को पश्चिमी संस्थानों और मूल्यों से अवगत कराया,जिससे सोवियत संघ को वैध बनाने वाली अंतर्निहित विचारधाराओं के पतन में योगदान मिला। सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका के लिए नई और कहीं बड़ी चुनौती चीन है और इससे मुकाबला करने के लिए भारत उसका स्वभाविक रणनीतिक भागीदार बन गया है। अमेरिका की भारत से रणनीतिक साझेदारी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता तथा नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली को बनाए रखने सहित साझा मूल्यों पर आधारित है।
भारत के विदेश मंत्री जयशंकर सार्वजनिक मंचों पर ऐसी बयानबाज़ी से परहेज नहीं करते जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां तो पा लेती है,हालांकि यह उस मौन कूटनीति से इतर मालूम होती है जो नियन्त्रण और संतुलन कायम करने की भारत की परम्परागत नीति रही है। विदेश मंत्री जयशंकर कभी कभी बेहतरीन नजर आते है लेकिन वे रूस यूरोप और अमेरिकी हितों में टकराव को लेकर भारत का बचाव बेहद आक्रामक तरीके से करते है और यह समन्वय को बाधित कर देता है। इस मामलें में वैदेशिक मोर्चों पर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी उनसे कहीं बेहतर नजर आते है जो राष्ट्रीय हितों को लेकर सार्वजानिक बयानबाज़ी से ज्यादा द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते है। राजनीति और कूटनीति दोनों ही अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों और उनके संबंधों को आकार देती हैं। लेकिन इन दोनों के उद्देश्य,कार्यप्रणाली और दृष्टिकोण में बुनियादी अंतर होते हैं। ट्रम्प अमेरिका की आंतरिक नीति और वैदेशिक नीति का घालमेल कर रहे है,भारत को इस स्थिति से निपटने को तैयार रहना चाहिए। ट्रम्प भारत की उस संरक्षणवादी नीति के आलोचक है जो भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ा सकती है।
मुक्त व्यापार से देशों को मुख्य रूप से नुकसान तब होता है जब उनका निर्यात क्षेत्र प्रतिस्पर्धी नहीं होता या अपना प्रतिस्पर्धी लाभ खो देता है। इससे उन्हें अपने निर्यातों के व्यापार और बिक्री से वंचित होना पड़ता है और इसका व्यापक अर्थव्यवस्था पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस वजह से कई सरकारें संरक्षणवादी नीतियों को लागू करने का विकल्प चुनती हैं। संरक्षणवाद एक आर्थिक नीति है जिसमें कोई देश अपने घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए टैरिफ,कोटा और सब्सिडी जैसे प्रतिबंध लगाता है। यह स्थानीय बाज़ार के चारों ओर दीवारें खड़ी करने जैसा है,जिसका लक्ष्य स्थानीय व्यवसायों का समर्थन करना,नौकरियों को बचाना और आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देना है। आत्मनिर्भर भारत अभियान ने अमेरिका में इस विचार को और तीव्र कर दिया है कि भारत तेज़ी से एक संरक्षणवादी बंद बाजार अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था,अमेरिका के मुकाबलें बहुत पीछे है और कूटनीतिक स्तर पर ट्रम्प प्रशासन से इस विषय पर बात करने से परहेज नहीं होना चाहिए। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश की संरक्षणवाद की नीति अमेरिका के लिए इसलिए चुनौतीपूर्ण नहीं हो सकती क्योंकि भारत अमेरिकी डॉलर को चुनौती देता हुआ कभी नजर नहीं आता। वहीं चीन इस वक्त दुनिया के बाजार पर हावी है। उसकी किफायती चीजें पूरी दुनिया के बाजार में छाई हुई हैं कई देशों के साथ चीन अपनी मुद्रा में कारोबार कर रहा है। ऐसा इसलिए कि दुनिया के कई देश चीन की इनोकॉमी की बादशाहत को भी स्वीकार करने लगे हैं। युआन कूटनीति से मुकाबला करने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है। दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों के परिणामस्वरूप वर्ष 2022-23 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बनकर सामने आया है। शीत युद्ध के दौरान भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति ने पश्चिम देशों और अमेरिका के लिये चिंता की चिंता को बढ़ाया था। वर्तमान में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। भारत,हिंद-प्रशांत आर्थिक संरचना पर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ साझेदारी करने वाले बारह देशों में से एक है। दोनों राष्ट्र गहरे सैन्य सहयोग हेतु रक्षा संबंध विकसित कर रहे हैं। 2005 में असैन्य परमाणु समझौते के बाद,संयुक्त राज्य अमेरिका ने चार निर्यात नियंत्रण व्यवस्था समूहों को भारत की सदस्यता का समर्थन किया था। तब से भारत मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था का सदस्य बन गया है। भारत दुनिया में सबसे बड़ा रक्षा उपकरण आयातक है और अमेरिकी एयरोस्पेस,रक्षा उद्योग तथा अमेरिका सुरक्षा नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रक्षा उपकरणों और प्रौद्योगिकी को भारत तक पहुंचाने में सक्षम करने हेतु संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2016 में भारत को एक प्रमुख रक्षा भागीदार के रूप में मान्यता दी। इसने भारत की रक्षा सूची हेतु प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के साथ-साथ हथियारों की प्रणालियों और अन्य प्लेटफार्मों की सरल खरीद का मार्ग प्रशस्त किया।
नेतान्याहू से भारत की सॉफ्ट पॉवर की नीति से असहमति जताई थी लेकिन असल में यह भारत की ताकत है। अमेरिका में भारत की सॉफ्ट पॉवर का ज़रिया इसके प्रवासी हैं,जो इसकी संपत्ति हैं। भारतीय प्रवासी अमेरिका में सबसे अमीर जातीय समुदायों में से एक है। पूंजीवादी ट्रम्प अपनी सौदेबाज़ी के लिए जाने जाते है और भारत से संबंधों को लेकर भारतीय प्रवासी महत्वपूर्ण रोल निभा सकते है। दरअसल ट्रम्प की भारत नीति को लेकर आशंकित होने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है की गुप्त कूटनीति के जरिए ट्रम्प को विश्वास में लिया जा सकता है। बंद दरवाजें के पीछे होने वाले समझौते,सार्वजनिक इजहार की राजनीतिक पैतरेबाज़ी से कहीं बेहतर होते है और राष्ट्रीय हित में भी होते है। न तो अमेरिका एशिया प्रशांत क्षेत्र के अपने सबसे महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी देश को नाराज करने का जोखिम लेगा और न ही भारत अधिनायकवादी पुतिन और कट्टरपंथी खुमैनी पर अत्यधिक भरोसा करेगा। उम्मीद है प्रधानमन्त्री मोदी और ट्रम्प के बीच अगली मुलाकात में गुप्त कूटनीति पर काम किया जाएगा।