नियम आधारित व्यवस्था पर यूरोप का भरोसा है लेकिन ट्रम्प का नहीं। मानवाधिकार और लोकतंत्र की रक्षा के लिए यूरोप सजग है लेकिन ट्रम्प नहीं। पुतिन के आक्रमक साम्यवाद से यूरोप चिंतित है लेकिन ट्रम्प नहीं। सामरिक मदद देकर यूक्रेन को मजबूत रखने के लिए यूरोप प्रयत्नशील है लेकिन ट्रम्प नहीं। नियन्त्रण और संतुलन की नीति पर चलकर विश्व शांति बनाएं रखने के लिए यूरोप संकल्पित है लेकिन ट्रम्प बिल्कुल नहीं। अमरीका ने साम्यवाद का अवरोध करने के लिए सैनिक सन्धियों एवं मैत्रियों का निर्माण किया था,इस नीति का पालन अमेरिका के सभी राष्ट्रपतियों ने किया। ट्रम्प ने सामरिक और रणनीतिक बाध्यताओं को दरकिनार कर आर्थिक प्रतिबद्धताओं पर ध्यान केंद्रित कर लिया है। अमेरिका अपने रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी रूस और चीन के लिए हरसंभव प्रयास करने को तैयार दिख रहा है,जबकि वह अपने सबसे करीबी सहयोगी यूरोप के साथ बुरा व्यवहार कर रहा है। यूरोप ईरान को अच्छे ऊर्जा स्रोत के रूप में देखता है,उसे ईरान से परमाणु समझौता करने में दिलचस्पी भी है,पर ट्रम्प इसे लेकर मुखर रहे है। राजनीति,आर्थिक और वैश्विक हितों को लेकर ट्रम्प और यूरोप में गहरे मतभेद है। इन सबके बाद भी यूरोप अमेरिका से दूर होने का साहस नहीं कर पा रहा है। यूरोप की इस बेबसी और लाचारी को ट्रम्प बखूबी जानते है इसलिए अब वे यूरोप से अपनी मांगे मनवाने में कामयाब भी हो रहे है।
ट्रम्प ने ज़ोर दिया था कि यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए इसलिए नाटो के बजट में यूरोप अपना योगदान बढ़ाएं। ट्रम्प ने यूरोप की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अमरीका पर होने पर सवाल उठाएं तो इस दबाव के आगे यूरोप को झूकना पड़ा। हाल ही में द हेग में संपन्न दो दिवसीय नाटो शिखर सम्मेलन के बाद एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया गया,जिसमें सालाना रक्षा बजट को जीडीपी के पांच फीसद तक ले जाने की प्रतिबद्धता जताई गई। इस योजना की 2029 में पुनः समीक्षा की जाएगी,जिसमें उस समय की रणनीतिक परिस्थितियों और क्षमता लक्ष्यों को ध्यान में रखा जाएगा। नाटो के तीन प्रमुख साझा वित्त पोषित बजट हैं,नागरिक बजट,सैन्य बजट तथा नाटो सुरक्षा निवेश कार्यक्रम। अब सभी देश महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की रक्षा,नेटवर्क की रक्षा,नागरिक तैयारी और लचीलापन सुनिश्चित करने,नवाचार करने और रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए सालाना जीडीपी का डेढ़ फीसद तक खर्च करेंगे। जबकि साढ़े तीन फीसद से कोर रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति और नाटो की क्षमता तथा लक्ष्यों को पूरा किया जा सकेगा। नाटो के रक्षा खर्च में अमेरिका की सबसे बड़ी भागीदारी है,वहीं फ्रांस, जर्मनी,इटली और यूनाइटेड किंगडम मिलकर यूरोप की भागीदारी निभाते है। जबकि स्लोवेनिया,अल्बानिया,बुल्गारिया,एस्टोनिया,क्रोएशिया,फिनलैंड,आइसलैंड, हंगरी,लिथुआनिया,मोंटेंग्रो,लक्समबर्ग,स्लोवाकिया और स्लोवेनिया जैसे देश शून्य या बहुत कम भागीदारी करते रहे है। ऐसे में यह देश भारी भरकम रक्षा खर्च में कैसे भागीदारी कर पाएंगे,यह देखना होगा।
यूरोप के लिए रूस एक बुरे सपने की तरह है। रूस रणनीतिक रूप से यूरोप पर हावी है वहीं उसकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं और साम्यवादी आक्रामकता यूरोप की लोकतांत्रिक परम्पराओं के खिलाफ रही है। रूस की भौगोलिक स्थिति इसे एक अद्वितीय रणनीतिक महत्व प्रदान करती है। यह देश ग्यारह समय क्षेत्रों में फैला हुआ है और सोलह संप्रभु देशों के साथ सीमा साझा करता है। रूस के पास आर्कटिक महासागर, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में लंबी तटरेखाएं हैं,साथ ही काला सागर और कैस्पियन सागर तक भी पहुंच है। रूस, दुनिया का सबसे बड़ा देश है,जो पूर्वी यूरोप और उत्तरी एशिया में फैला हुआ है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के यूरोपीय सहयोगियों को बार-बार चेतावनी दी है कि वे कीव के प्रति अपना समर्थन कम करें। पुतिन ने दावा किया था कि संभावित रूसी मिसाइल हमलों के सामने यूरोप बेबस हो जाएगा। रूस अपने उत्तरी बेड़े में पनडुब्बियों का उपयोग करके ट्रान्साटलांटिक व्यापार को नुकसान पहुंचा सकता है। रूस के पास एक मजबूत पनडुब्बी बेड़ा है और इसका उपयोग महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को बाधित करने या महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमला करने के लिए किया जा सकता है। ट्रान्साटलांटिक व्यापार एक ऐतिहासिक और आर्थिक अवधारणा है जो अटलांटिक महासागर के दोनों किनारों पर स्थित देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को संदर्भित करती है। यूरोप और अमेरिका के बीच यह व्यापार मुख्य रूप से पश्चिमी यूरोप और उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच होता है। इसमें औद्योगिक उत्पाद,कृषि उत्पाद, और कच्चे माल का आदान-प्रदान शामिल है। रूस का सैन्य बजट पूरे यूरोप के डिफ़ेंस ख़र्च से ज़्यादा है।
यूरोपीय देश यह बेहतर जानते है की रूस की सैन्य क्षमता से निपटने के लिए उन्हें अमेरिका की जरूरत है। निगरानी,ख़ुफ़िया जानकारी,हवाई क्षमता और युद्दक तैयारियों के लिए यूरोप अमेरिका पर पूर्ण रूप से निर्भर है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों एक असली यूरोपीय सेना का गठन करने और यूरोप का सैन्य ख़र्च बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। हालांकि,यूरोपीय संघ के भीतर उनकी इन बातों को बेहद मामूली समर्थन हासिल हो सका है। इसका प्रमुख कारण यूरोप के वे छोटे देश है जो युद्द और हथियार से ज्यादा अपने लोगों की बेहतरी के लिए पैसा खर्च करना चाहते है। पुतिन का यूरेशिया और बाल्टिक देशों पर गहरा दबाव है,इसमें कई नाटो के सदस्य है। यूक्रेन में पुतिन की आक्रमकता से नाटो के कई देश डरे हुए है। एस्टोनिया यूएसएसआर का एक पूर्व गणराज्य है। यह दक्षिण में लातविया,पूर्व में रूस,पश्चिम में बाल्टिक सागर और उत्तर में फिनलैंड की खाड़ी से घिरा हुआ है। फिनलैंड उत्तरी यूरोप में स्थित है। यह पूर्व में रूस,दक्षिण में फिनलैंड की खाड़ी,पश्चिम में स्वीडन की खाड़ी और उत्तर में नॉर्वे से घिरा हुआ है।
ट्रम्प के दबाव में यूरोपीय देश रक्षा खर्च में ज्यादा योगदान देने लगे तो इससे आर्थिक असमानताएं बढ़ सकती है। इसका असर शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर भी पड़ेगा। यूरोपीय देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बाधित होने या अस्थिरता का फायदा रूस को मिल सकता है। यूक्रेन युद्द जितना लम्बा खींचता जाएगा,उतने ही यूरोपीय देशों में आपसी मतभेद बढ़ सकते है। इन आशंकाओं से ग्रस्त यूरोप ट्रम्प से यूक्रेन समस्या का जल्द समाधान चाहता है। यूरोप इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता की रूस की सैन्य क्षमता को दबाव में रखने के लिए अमेरिका का साथ आवश्यक है। ट्रम्प यूरोप पर दबाव बढ़ा रहे है,यूक्रेन को दिए जाने वाले हथियार रोककर पुतिन को फायदा पहुंचा रहे है तथा चीन से व्यापार बढ़ा रहे है। ट्रम्प की कूटनीति अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य को अस्थिर बना रही है,यूरोप समेत लोकतांत्रिक देशों पर दबाव बढ़ा रही है,वहीं सैन्य,साम्यवादी और राज सत्ताओं को मजबूत होने के अवसर दे रही है।