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ट्रम्प मोदी की मुलाकात

राष्ट्रीय सहारा

उच्च टैरिफ,अप्रवासन और संरक्षणवाद पर ट्रम्प के आक्रामक रुख से दुनिया भले ही आशंकित हो लेकिन जल्द ही ट्रम्प की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की संभावनाएं दोनों देशों के बीच मजबूत सम्बन्धों का संदेश दे रही है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंध दोस्ताना और मजबूत माने जाते हैं। दोनों नेताओं ने कई बार सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे की प्रशंसा की है और भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की कोशिश की है। मोदी और ट्रंप के संबंध व्यक्तिगत और राजनयिक स्तर पर मजबूत रहे हैं। हालांकि व्यापार और अप्रवासन जैसे मुद्दों पर कुछ मतभेद भी रहे,लेकिन रक्षा,रणनीतिक साझेदारी और चीन विरोधी नीतियों में दोनों का रुख समान माना जाता है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भी मोदी के साथ उनके अच्छे संबंध बने रहने की संभावना है।

ट्रम्प की मोदी से मुलाकात ऐसे समय  तय हुई है जब ट्रम्प ने कनाडा और मैक्सिकों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है वहीं चीन को लेकर भी उनके इरादें सख्त है। व्यापार को लेकर वे भारत से सहज नहीं है और यहीं भारत के लिए चुनौती माना जा रहा था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और ट्रम्प में आपसी मजबूत संबंधों के कारण ट्रम्प भारत को लेकर कोई कड़ा रुख अपनाएं,इसकी संभावनाएं कम ही है।गौरतलब है की पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने भारत को रणनीतिक रक्षा सहयोगी माना है,कई रक्षा सौदों पर हस्ताक्षर किए है जिस कारण भारत ने अमेरिकी हथियार और रक्षा उपकरण खरीदे है। ट्रम्प न केवल अपने देश के राष्ट्रपति है बल्कि वे एक अच्छे व्यापारी भी है। जाहिर है रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच हथियारों,तकनीकी सहयोग और उन्नत सैन्य उपकरणों के निर्यात में वृद्धि हो सकती है। ट्रम्प भारत को बेहद अहम रणनीतिक भागीदार समझते है और उनके कार्यकाल में ही एशिया प्रशांत को हिन्द प्रशांत कहा गया था। ट्रंप चीन के खिलाफ आक्रामक रहे है।उन्होंने चीन के खिलाफ टैरिफ बढ़ाने का ऐलान कर  सख्त संदेश दे दिया है।ट्रंप चीन पर दबाव बढ़ाने के लिए क्वाड को एक मजबूत सामरिक संगठन मानते है।यह भारत की इंडो पैसिफिक रणनीति के लिए बेहद जरूरी है। अमेरिका को चिंता है कि चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर इंडो पैसिफिक क्षेत्र में दबदबा बना रहा है। अमेरिका के लिए चीन के मुकाबले भारत एक बेहतर रणनीतिक और आर्थिक विकल्प बन सकता है। हाल के वर्षों में अमेरिका ने भारत के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है और चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। चीन के दक्षिण चीन सागर में आक्रामक रवैये को अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन मानता है। वहीं भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था अमेरिका के लिए अधिक विश्वसनीय है।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल  में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा,प्रौद्योगिकी और ऊर्जा क्षेत्रों में संबंधों में मजबूती की उम्मीद बढ़ गई है। अमेरिका और भारत के बीच रक्षा सौदे और सैन्य अभ्यास बढ़े हैं। अमेरिका और भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,सेमीकंडक्टर्स और साइबर  सुरक्षा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।भारत को अपने रक्षा प्रौद्योगिक कार्यक्रमों में तेजी लाना चाहता है और अमेरिका से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की इच्छा जता चूका है,इसे लेकर अभी जटिलताएं है। भारत अमेरिका से रक्षा सहयोग तो बढ़ा रहा है लेकिन उसकी अपनी चिंताएं है। भारत का मानना है कि कुछ विशेष क्षेत्रों में प्रगति हासिल करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का लाभ नहीं उठाया जाता है,तो एक देश तक़नीकी ज़रूरतों के लिए दूसरे देशों पर हमेशा के लिए निर्भर हो जाएगा,जहां हर बार भारी भुगतान करना होगा। इस संबंध में भारत ने एक नया दृष्टिकोण अपनाया है,जो रक्षा सौदों में प्रौद्योगिक हस्तांतरण की प्राथमिकता पर आधारित है। भारत के सैन्य आधुनिकीकरण के लिए यह बेहद जरूरी है और इस बार की पूरी संभावनाएं है कि ट्रम्प की प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर चर्चा हो सकती है।

ट्रम्प प्रशासन ऊर्जा क्षेत्र में भारत के साथ निर्यात बढ़ाने की  उम्मीद कर रहा है।अमेरिका से भारत को कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात में लगातार वृद्धि हो रही है।ख़ास तौर से अमेरिका में शेल गैस और तेल की खोज के बाद वहां मिले नए भंडारों  और अमेरिका से तेल और गैस के निर्यात पर चार दशकों से लगे प्रतिबंधों को हटाने के बाद इसमें  निरंतर इजाफा हो रहा  है।ट्रम्प इसे और बढ़ाने को लेकर भारत से कोई समझौता कर सकते है जिससे अमेरिका भारत के साथ अपना व्यापारिक घाटा भरने में काफ़ी हद तक सफ़लता हासिल कर लें।इससे भारत की ऊर्जा सम्बन्धी चुनौतियों का समाधान करने में भी मदद मिल सकती है।

इन सबके बीच ट्रम्प की अमेरिकन फर्स्ट नीतियां वीजा को लेकर भारतीयों की समस्या बढ़ा सकती है।ट्रम्प  अपने पहले  कार्यकाल में वीजा नीतियों को सख्त कर  चूके  थे। यदि वे ऐसा फिर करते है तो इससे भारतीय आईटी पेशेवरों और स्टार्टअप्स पर असर पड़ सकता है।ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में भारतीय उत्पादों स्टील और एल्युमीनियम पर अतिरिक्त शुल्क लगाया था जिससे भारतीय निर्यातकों को कठिनाई हुई थी। ट्रम्प अब भारतीय वस्तुओं पर और अधिक शुल्क  न लगाएं,इसे लेकर सावधान रहना होगा।ट्रम्प संरक्षणवादी नीतियों के जरिए भारतीय कंपनियों से आयात कम कर सकते है,इससे टेक, फार्मा, ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल सेक्टर मेंभारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है।ट्रम्प ने पहले एच-1बी वीजा नियमों को सख्त किया था,अब  भारतअमेरिका आईटी व्यापार संबंधों को देखते हुए इसमें कुछ ढील दी जा सकती है।भारतीय फार्मा कंपनियों को अमेरिकी बाजार में अधिक अवसर मिल सकते हैं।भारत को इन संभावनाओं और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ट्रम्प के साथ आगामी व्यापार नीति तय करनी होगी। 

भारत के रूस के साथ मजबूत सामरिक सम्बन्ध है तथा ईरान रणनीतिक रूस से भारत के लिए बेहद अहम है। इन दोनों देशों के साथ संबंधों को कायम रखते हुए ट्रम्प से सहयोग बढ़ाने की भारत की नीति को आगे ले जाना प्रधानमंत्री मोदी की असल चुनौती होगी।

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