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तेल रुका तो थम जाएगी तीसरी दुनिया की सांस

नवभारत

ईरान युद्ध ने विश्व भर में हलचल मचा दी है। फिलीपींस में रेस्तरां बंद हो गए है,बिजली बचाने के लिए फिलीपींस में चार दिन का कार्य सप्ताह अपनाने से लेकर,भारत में रेस्तरां द्वारा गैस की अधिक खपत वाले व्यंजनों को मेनू से हटाने की घटनाएं सामने आ रही है। श्रीलंका में पेट्रोल-डीजल के लिए रात-रात भर लंबी-लंबी  कतारें लग रही है। पाकिस्तान में ईद का जश्न फीका पड़ गया है। पाकिस्तान में ऊर्जा संकट राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है,जबकि श्रीलंका पहले ही आर्थिक संकट का अनुभव कर चुका है और ऐसे झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। बांग्लादेश में भी औद्योगिक क्षेत्र और वस्त्र उद्योग,ऊर्जा की कमी से प्रभावित हो गया है।


विकसित देशों के पास सौर,पवन,जल  जैसे नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा के विकल्प उपलब्ध है,जिससे वे ऊर्जा संकट का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर सकते हैं।  इन देशों की जनसंख्या भी अपेक्षाकृत कम होती है और ऊर्जा दक्षता अधिक होती है,जिससे दबाव कुछ हद तक कम पड़ता है। विकसित देशों के पास बेहतर तकनीक,मजबूत अर्थव्यवस्था और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के कारण वे इस संकट को संभालने में अधिक सक्षम हैं। वे जल्दी खुद को परिवर्तित कर सकते है जबकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भर गरीब और विकासशील देशों पर इसका असर ज्यादा गहरा और अस्थिरता लाने वाला  होगा। ईरान युद्ध के कारण तेल और गैस की आपूर्ति में आई बाधा का सबसे गहरा असर उन्हीं देशों पर पड़ा है जो या तो आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं या आर्थिक रूप से कमजोर हैं। यह संकट केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है,बल्कि व्यापक आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता का कारण बन रहा है। भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देश ऊर्जा आयात पर निर्भर है। इन देशों की अर्थव्यवस्था औद्योगिक उत्पादन और परिवहन पर आधारित है,जिसके लिए भारी मात्रा में तेल और गैस की आवश्यकता होती है। ईरान युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति बाधित होने पर इन देशों में ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ने का संकट मंडरा रहा है,जिससे महंगाई और उत्पादन लागत दोनों बढ़ सकती है। इसके कारण आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ जाएगी है और सरकार पर सब्सिडी तथा वैकल्पिक स्रोत खोजने का दबाव बढ़ सकता  है। पाकिस्तान,श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देश पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनकी ऊर्जा आयात पर निर्भरता अधिक है और विदेशी मुद्रा भंडार सीमित हैं। ऐसे में तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि इनके लिए दोहरा संकट पैदा कर सकती है,एक तरफ ऊर्जा की कमी और दूसरी तरफ भुगतान संकट। इन देशों में अक्सर ईंधन की राशनिंग,बिजली कटौती और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट देखने को मिलती है। इससे बेरोजगारी बढ़ती है और आम जनता के जीवन स्तर पर सीधा असर पड़ता है।

अमेरिका-इजरायल युद्ध का ईरान पर प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है। तेहरान ने महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग को बंद करके और तेल और गैस से समृद्ध अपने पड़ोसी देशों पर बमबारी करके जवाबी कार्रवाई की है,जिससे ऊर्जा  संकट और भी बढ़ गया है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इस स्थिति को वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ी आपूर्ति व्यवधान बताया है। पर्यटकों के लिए सबसे खास जगह माने जाने वाले थाईलैंड में पर्यटकों की संख्या घट गई है,पहले से बुक किए गए कई ग्राहकों ने बुकिंग रद्द कर दी है। पर्यटकों को डर है कि उन्हें घर वापस जाने के लिए कोई उड़ान नहीं मिलेगी।  ईरान युद्ध से उत्पन्न तेल और गैस संकट यह स्पष्ट करता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। जो देश आयात पर निर्भर हैं या आर्थिक रूप से कमजोर हैं वे इस तरह के भू-राजनीतिक संकटों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। यदि तेल और गैस की आपूर्ति अचानक पूरी तरह बंद हो जाए तो इसका प्रभाव आधुनिक विश्व पर तत्काल और गहरा संकट के रूप में दिखाई देगा। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और जीवनशैली मूलतः तेल और गैस पर आधारित है इसलिए इनके अभाव में कुछ ही दिनों के भीतर व्यवस्थाएं चरमराने लगेंगी।

सबसे पहले और सबसे स्पष्ट प्रभाव परिवहन क्षेत्र पर पड़ेगा। हवाई यात्रा,समुद्री जहाज,ट्रक परिवहन और निजी वाहन लगभग ठप हो जाएंगे। इससे वैश्विक सप्लाई चेन टूट जाएगी। खाद्यान्न,दवाइयां,ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो जाएगी,जिससे बाजारों में घबराहट और जमाखोरी शुरू हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी तत्काल असर पड़ेगा और कई देश आवश्यक वस्तुओं के लिए संकट का सामना करेंगे। ऊर्जा क्षेत्र में भी स्थिति गंभीर हो जाएगी। दुनिया के कई हिस्सों में बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा गैस और तेल पर निर्भर है। इनके बंद होने से पावर प्लांट बंद होने लगेंगे और व्यापक स्तर पर बिजली कटौती या ब्लैकआउट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। आर्थिक दृष्टि से यह स्थिति एक वैश्विक आपदा का रूप ले सकती है। उत्पादन लागत अचानक बढ़ जाएगी,उद्योगों का संचालन रुकने लगेगा और बेरोजगारी तेजी से बढ़ेगी। शेयर बाजारों में भारी गिरावट संभव है और वैश्विक मंदी की स्थिति बन सकती है। विकासशील देशों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर होगा,क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर होती है। कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा। आधुनिक खेती में ट्रैक्टर, सिंचाई पंप और खाद-उर्वरक के उत्पादन में तेल और गैस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उर्वरक उद्योग प्राकृतिक गैस पर आधारित है। आपूर्ति रुकने से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा,जिससे खाद्य संकट और भुखमरी की आशंका बढ़ सकती है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जीवन कठिन हो जाएगा। औद्योगिक उत्पादन में भी भारी गिरावट आएगी। प्लास्टिक,रसायन,दवाइयों और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्माण बाधित होगा। कई फैक्ट्रियां बंद हो सकती है,जिससे बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियां रुक जाएंगी। इसके साथ ही सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है। संसाधनों की कमी से देशों के बीच तनाव और आंतरिक अशांति बढ़ने की संभावना है। अल्पकाल में तेल और गैस की अचानक अनुपस्थिति आधुनिक विश्व के लिए एक गहरे संकट,अव्यवस्था और अनिश्चितता का दौर लेकर आएगी,जो वैश्विक स्तर पर जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेगा।

तीसरी दुनिया के अधिकांश देश ऊर्जा के लिए तेल और गैस पर अत्यधिक निर्भर हैं। उनकी अर्थव्यवस्था,परिवहन,कृषि और उद्योग की बुनियाद ही  खाड़ी देशों से मिलने वाले तेल और गैस पर टिकी है। यदि इनकी आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होती है तो इन देशों के सामने गंभीर अस्तित्वगत संकट खड़ा हो सकता है। गरीब और विकासशील देशों के पास सीमित विदेशी मुद्रा भंडार होता है,जिससे वे महंगे होते तेल और गैस का आयात नहीं कर पाते। इससे मुद्रा का अवमूल्यन, महंगाई और कर्ज संकट तेजी से बढ़ता है। उद्योगों का उत्पादन घटने लगता है, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है और आर्थिक विकास रुक जाता है। इसका बड़ा असर ऊर्जा और बुनियादी सेवाओं पर पड़ता है। बिजली उत्पादन,परिवहन और दैनिक जीवन में ऊर्जा की भारी कमी हो जाती है। कई देशों में लंबे समय तक बिजली कटौती,ईंधन की राशनिंग और आवश्यक सेवाओं में बाधा उत्पन्न होती है। कृषि क्षेत्र भी इससे प्रभावित होता है। ट्रैक्टर,सिंचाई और उर्वरक उत्पादन गैस पर निर्भर होते है,जिससे खाद्य संकट की स्थिति बन सकती है। सबसे गंभीर प्रभाव सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आता है। जब महंगाई बढ़ती है और आवश्यक वस्तुओं की कमी होती है तो जनता में असंतोष बढ़ता है, जो विरोध, दंगों और शासन संकट का रूप ले सकता है। कई देशों में यह स्थिति सरकारों के पतन तक पहुंच सकती है।

इस प्रकार, यदि तेल और गैस की आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो तीसरी दुनिया के देशों में आर्थिक पतन,सामाजिक अव्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता का गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते हमले,एक-दूसरे के तेल और ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाने से वैश्विक स्तर पर अत्यंत गंभीर परिणाम  हो सकते है। यदि ईरान खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों के पेट्रोलियम ठिकानों को लगातार निशाना बनता रहा तो यह संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। खाड़ी क्षेत्र विश्व की ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है और यहां किसी भी प्रकार की बाधा से वैश्विक बाजार में तेल और गैस की भारी कमी हो सकती है। यह संघर्ष ऊर्जा सुरक्षा,भू-राजनीतिक संतुलन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकता है। अतः यह स्थिति केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का रूप ले सकती है।

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