जब सरकार,विरोधी आवाज़ों को दबाती है तो यह अधिनायकवाद की ओर एक कदम होता है। दुनिया के कई देशों में ऐसी अधिनायकवादी और सर्व सत्तावादी सरकारों को व्यापक जनविरोध का सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आने के बाद भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित और प्रतिबंधित किया है। इसके साथ ही आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखकर समाज के विभिन्न पहलुओं पर अपनी पकड़ को मजबूत कर ली है इसमें विरोधी विचारधाराओं का दमन भी शामिल है। अब लोग सड़कों पर चुनी हुई सरकारों को हटाने के लिए प्रदर्शन कर रहे है। सरकारें कई देशों में लोगों का दमन कर रही है लेकिन लोगों ने भी अपने इरादों से यह संदेश देने की कोशिश की है सत्ता का अर्थ यदि शोषण और दमन है और लोककल्याण को दरकिनार किया जा रहा हो तो तो ऐसी सत्ता को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
तुर्की में राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी इकरम इमामोअलू को पिछले दिनों गिरफ़्तार कर लिया गया। इस गिरफ़्तारी का देश में काफी विरोध हो रहा है। अर्दोआन दो दशकों से ज्यादा समय से सत्ता में रहने के बाद भी किसी कीमत पर अपना पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं। विपक्ष के नेता की इस गिरफ़्तारी के लिए अर्दोआन की सत्ता में बने रहने की उनकी ख्वाहिश ज़िम्मेदार है। यूरोप का एकमात्र इस्लामिक देश होने के बाद भी लम्बे समय तक धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद के जरिए सामाजिक और आर्थिक रूप से अग्रणी तुर्की पिछले दो दशकों से आर्दोआन की सत्ता में बने रहने की सनक का शिकार बनता गया। आर्दोआन,दशकों पुरानी धार्मिक नीतियों को लगातार तुर्की समाज पर थोप रहे है जिससे वे बहुसंख्यक मुसलमानों का भरोसा हासिल करके लंबे समय तक सत्ता पर अपनी पकड़ बनाएं रखे। लेकिन इसका खामियाजा तुर्की के आम लोगों को भोगना पड़ रहा है। इसका प्रभाव गिरती अर्थव्यवस्था से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक पड़ रहा है। आर्थिक मोर्चे पर तमाम नाकामियों के बाद भी आर्दोआन देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में खुद को प्रचारित करने के लिए राजनीतिक,धार्मिक हथकंडे अपना रहे है। आर्दोआन सरकार ने इमामोअलू के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और चरमपंथी समूह को मदद करने का आरोप दाखिल किया है। प्रदर्शनकारियों ने इमामोअलू की हिरासत को गैरक़ानूनी और राजनीति से प्रेरित बताया है। 2028 में राष्ट्रपति चुनाव हैं,आर्दोआन को इकरम इमामोअलू से कड़ी चुनौती मिलने की उम्मीद है। इमामोअलू काफी लोकप्रिय राजनेता हैं,उन्हें सिर्फ मुख्य विपक्षी दल से नहीं बल्कि तुर्की के समाज के अलग-अलग वर्गों का समर्थन भी हासिल है। उनकी लोकप्रियता को अर्दोआन के लिए ख़तरा बताया जा रहा है। जनता सड़कों पर है और इससे अर्दोआन के सामने पद पर बने रहने का संकट गहरा गया है।
दक्षिण एशिया के छोटे से देश नेपाल में तो लोग लोकतांत्रिक सरकारों की अकर्मण्यता से परेशान होकर वापस राजतन्त्र की मांग को लेकर सडकों पर है। 2008 में नेपाल में 240 सालों से चली आ रही राजशाही ख़त्म हुई थी,लेकिन डेढ़ दशक बीतने के बाद से देश में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। सत्ता में राजनीतिक दलों के बने रहने का इतना जूनून है की कोई विपक्ष में रहना ही नहीं चाहता। सभी पार्टियां जोड़ तोड़ करके सत्ता में बने रहना चाहती है और आम जनता के मूद्दे नजरअंदाज कर दिए गए है। नेपाल के लोगों में मौजूदा सरकार को लेकर निराशा है,वे ग़ुस्से में हैं और यहां की जनता वैकल्पिक राजनीति की तलाश कर रही है। करीब डेढ़ दशक पहले राजा के ख़िलाफ़ नेपाल की जनता में नाराज़गी बढ़ गई थी और बड़े जन आंदोलन के बाद उन्होंने संसद को बहाल करते हुए अंतरिम सरकार को सत्ता सौंप दी थी। अब जनता एक बार फिर उसी तरह आंदोलन कर रही है। नेपाल की गरीबी दर अभी भी बहुत अधिक है। गरीबी बदस्तूर जारी है तथा विभिन्न सरकारें अत्यधिक गरीबी दर को कम करने में विफल रही है। भूकंप,बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए लोकतान्त्रिक सरकार कोई आपदा प्रबंधन योजना लागू नहीं कर सकी है। दूरदराज के क्षेत्रों में अपर्याप्त बुनियादी ढांचे समस्याओं को बढ़ा रहे है। सड़क,शिक्षा और स्वास्थ्य की अनदेखी से लोग परेशान है। कोविड-19 महामारी ने नेपाल में गरीबी के संकट को और भी बदतर बना दिया है।
गजा में हमास के खिलाफ लोग व्यापक विद्रोह कर रहे है। लोग इस्राइली हमलों और हमास के प्रतिकार के बीच बूरी तरह फंस चूके है। आम जनता हमास से सत्ता छोड़ने की मांग को लेकर सडकों पर है। 2006 में इस्लामवादी समूह हमास ने गाजा में चुनाव जीता। एक साल बाद हमास ने गाजा पर पूरा नियंत्रण कर लिया और फिलिस्तीनी प्राधिकरण को इस इलाकें से खदेड़ दिया। फिलिस्तीनी समस्या इससे गहरा गई और लोकतांत्रिक ताकतें कमजोर हो गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमास को व्यापक रूप से एक आतंकवादी समूह के रूप में देखा जाता है। हमास बातचीत से कहीं ज्यादा इंतिफादा को बढ़ावा देता है। इंतिफादा या फ़लस्तीन के नागरिकों के हिंसक प्रतिकार से तनाव बेहद बढ़ गया है। यह व्यापक विरोध,प्रदर्शन,आत्मघाती बम विस्फोट और इस्राइल सुरक्षा बलों और फिलिस्तीनी आतंकवादियों के बीच सशस्त्र टकराव के रूप में सामने आया है। अब लोग फिलिस्तीन में युद्द विराम चाहते है और वे हमास को सत्ता में न तो देखना चाहते है और न ही उस पर उनका भरोसा रह गया है।
फ्रांस की प्रमुख विपक्षी नेता मरीन ले पेन को हाल ही में एक अदालत ने यूरोपीय संसद के धन के दुरुपयोग के मामले में दोषी करार दिया है। अदालत ने उन्हें चार साल की सजा सुनाई है। उन पर पांच वर्षों तक सार्वजनिक पद के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध भी लगाया गया है,जिससे उनकी 2027 के राष्ट्रपति चुनाव में भागीदारी पर प्रश्नचिह्न लग गया है। फ़्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को मरीन ले पेन से कड़ी चुनौती मिल सकती है।
दुनिया के सबसे असुरक्षित देशों में शुमार पाकिस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी बदहाल है और लोगों का सरकार पर कोई भरोसा नहीं रह गया है। इस समय समूचा बलूचिस्तान उबल रहा है। बलूचिस्तान की अवाम का गुस्सा पाकिस्तानी सेना,सत्ता और व्यवस्थाओं को लेकर है। न्यायिक हिरासत,सरकारी हिंसा,उत्पीड़न,अपहरण और शोषण से जूझते यहां के लोगों को पाकिस्तान की पुलिस से गहरी नफरत है,सेना को वे अपना दुश्मन समझते है और न्यायपालिका पर उन्हें बिल्कुल भरोसा नहीं है। महरंग बलोच,एक मानवाधिकार कार्यकर्ता है जो मुखरता से पाकिस्तान की संप्रभुता को चुनौती देते हुए तकरीरें करती है। उन्हें सरकार ने जेल में डाल दिया है। पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय नेता इमरान खान पहले से ही जेल में है और उनके लाखों समर्थक लगातार पाकिस्तान की मौजूदा सत्ता को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे है।
बांग्लादेश में पिछले साल शेख हसीना के सत्ता से बेदखल करने के बाद छात्र आंदोलन अभी भी थमा नहीं है। आम जनता को उम्मीद थी की शेख हसीना के लंबे कार्यकाल से मुक्ति देश में समावेशी शासन के द्वार खोलेगी,लेकिन अभी तक ऐसा कोई बदलाव दिखा नहीं है। अब देश के मजदूर भी सड़कों पर है। कभी विकसित देश बनने का ख्वाब देखने वाला देश अब बर्बादी की कगार पर है।
कई देशों में हो रहे व्यापक आंदोलनों में लोगों की नाराजगी का प्रमुख कारण सत्ता में बने रहने की सत्तावादी ताकतों की कोशिशें रहा है। आधुनिक दुनिया में लोकतंत्र को सर्वसत्तावादी ताकतों से कड़ी चुनौती मिल रही है। लोकतंत्र का आधार नागरिकों की भागीदारी,स्वतंत्रता और समानता पर होता है,जबकि सर्वसत्तावाद एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें शासन अपनी सत्ता की कोई सीमारेखा नहीं मानता और नागरिकों के जीवन के सभी पहलुओं को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। कई देशों में जो सत्ता विरोधी आंदोलनों हो रहे है वह सर्वसत्तावादी ताकतों को संदेश है। अंततः जन आंदोलनों ने नाजीवाद और फासीवाद को खत्म किया है,लोकतांत्रिक देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं और सर्वसत्तावादी ताकतों को जनता के वैधानिक अधिकारों के लिए कड़ी चुनौती मिलना लोककल्याण और मानवाधिकारों की दृष्टि से शुभ संकेत है। इससे वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक सिद्धांतों के नए तरीके से गढ़ने और व्यवस्थागत बदलाव होने की उम्मीदें भी बढ़ रही है।