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अविश्वास की कूटनीति,कमजोर मध्यस्थ और वार्ता  नाकाम

सत्ता मेल
अविश्वास की कूटनीति देशों को यह याद दिलाती है कि वे केवल अपने हितों पर निर्भर रहें। जब देशों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं होता,तो वे समझौते बहुत सोच-समझकर और स्पष्ट शर्तों के साथ करते है,जिससे भविष्य में धोखा मिलने की संभावना नहीं हो। 50 साल की कट्टर दुश्मनी को भूल कर किसी निर्णायक समझौते पर पहुंचना आसान नहीं था,इस्लामाबाद में हुआ भी वही। दो युद्धों के बाद अमेरिका और ईरान आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहे थे। मुद्दे भी बेहद गंभीर थे। होर्मुज़ स्ट्रेट,परमाणु संवर्धन,जंग में हुए नुक़सान के मुआवज़े,प्रतिबंधों को हटाने और क्षेत्र में जंग की पूर्ण समाप्ति का ईरान का प्रस्ताव ठीक वैसे ही धराशाई हो गया जैसे पाकिस्तान की मध्यस्थता की बिना गारंटी की कोशिशें बिना परिणाम के औंधें मुंह गिर गई ।

अंतर्राष्ट्रीय तनावों को समाप्त करने के लिए मध्यस्थता एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक साधन है,किंतु इसकी सफलता काफी हद तक उस मध्यस्थ देश की शक्ति, विश्वसनीयता और प्रभाव पर निर्भर करती है। केवल वार्ता की मेज पर पक्षों को बैठा देना पर्याप्त नहीं होता,बल्कि यह भी आवश्यक है कि मध्यस्थ देश समझौते के क्रियान्वयन की गारंटी दे सके। अमेरिका में कैम्प डेविड समझौता इज़राइल और मिस्र  के बीच करवाया था और उसकी उसकी गारंटी भी दी। इसके पीछे अमेरिका की वैश्विक शक्ति और दोनों पक्षों पर उसका प्रभाव निर्णायक था। वहीं पाकिस्तान की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है। पाकिस्तान भले ही कूटनीतिक रूप से पहल कर अमेरिका और ईरान को वार्ता के लिए एक मंच पर ला सकता है,लेकिन उसके पास इतना प्रभाव नहीं है कि वह समझौते के उल्लंघन की स्थिति में किसी पक्ष पर दबाव बना सके। उसकी आंतरिक आर्थिक चुनौतियां और सीमित वैश्विक प्रभाव उसे एक प्रभावी गारंटर बनने से रोकते हैं। इस प्रकार, पाक की भूमिका एक सुविधाकर्ता या मेजबान तक सीमित रह गई। इस बातचीत में एक और संकट था। जब किसी एक मुद्दे में कई मध्यस्थ देश शामिल हो जाते हैं, तो स्थिति और जटिल हो जाती है। तुर्की, मिस्र  और चीन की भागीदारी ने विषयों की जटिलता को बढ़ा दिया। इससे वार्ता प्रक्रिया में समन्वय की कमी उत्पन्न  हुई और एक साझा रणनीति बनाना कठिन हो गया। बहुपक्षीय मध्यस्थता कई बार समाधान के बजाय प्रतिस्पर्धा का मंच बन जाती है, जहां हर देश अपने राष्ट्रीय हित देखता है। ईरान और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक अविश्वास गहरा है। ऐसे में एक कमजोर मध्यस्थ के द्वारा इस दूरी को कम करने में असफल रहने की संभावनाएं भरपूर थी। यदि मध्यस्थ के पास पर्याप्त प्रभाव और निष्पक्षता नहीं हो,तो समझौते केवल कागजी बनकर रह जाते हैं और दीर्घकालिक समाधान संभव नहीं हो पाता। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की इजरायल विरोधी टिप्पणी ने पश्चिम एशिया में चल रही सीजफायर वार्ता का माहौल बिगाड़ दिया।  उन्होंने इजरायल को मानवता पर अभिशाप बताया था।

आधुनिक युद्धों में जीत की घोषणा वास्तविक विजय से अधिक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक रणनीति  बन चुकी है,अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी जीत का दावा कूटनीतिक दबाव बनाने का उपकरण होता है। यदि कोई देश स्वयं को विजेता घोषित करता है तो वह वार्ता की अगली प्रक्रिया में मजबूत स्थिति हासिल करने की कोशिश करता है। यह रणनीति भविष्य की वार्ताओं और समझौतों को प्रभावित करती है। इस प्रवृत्ति का नकारात्मक पक्ष भी है। जब सभी पक्ष खुद को विजेता बताते हैं तो वास्तविक समस्याएं अनसुलझी रह जाती हैं और स्थायी शांति की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। अमेरिका,इजराइल और ईरान अपनी अपनी जीत की घोषणा कर माहौल खराब कर रहे है। ट्रम्प,नेतान्याहू और ईरान की आक्रामक भाषा ने माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बनाया। ऐसी स्थिति में वार्ता समाधान खोजने के बजाय अपनी स्थिति मजबूत दिखाने का मंच बन गयी।

पश्चिम एशिया में वर्तमान परिदृश्य बहुस्तरीय और संवेदनशील है जहां प्रतिस्पर्धा, सहयोग और कूटनीति एक साथ चल रहे हैं। यदि तनाव को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कूटनीतिक प्रयास नहीं किए गए तो यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप भी ले सकता है। ईरान द्वारा अपने पड़ोसी देशों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष हमलों की घटनाओं ने पूरे पश्चिम एशिया में अविश्वास की भावना को गहरा किया है। क्षेत्रीय सुरक्षा पहले ही नाजुक स्थिति में थी,ऐसे कदमों ने देशों के बीच संदेह और असुरक्षा को और बढ़ा दिया है। प्रतिशोध की रणनीति अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति प्रदर्शन और  बचाव का एक महत्वपूर्ण साधन मानी जाती है।  सऊदी अरब और यूएई ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों के जवाब में दबाव और जवाबी कार्रवाई की नीति पर आगे बढना चाहते है। इसका उद्देश्य विरोधी को यह संदेश देना होता है कि किसी भी आक्रामक कदम की कीमत चुकानी पड़ेगी। यह रणनीति जोखिमपूर्ण है और इससे तनाव और संघर्ष बढ़ सकता है। खाड़ी देशों के हितों की रक्षा के लिए अमेरिका की भूमिका एक सुरक्षा गारंटर और संतुलनकारी शक्ति के रूप में महत्वपूर्ण है। खाड़ी देशों में अमेरिका के मुख्य हित तेल आपूर्ति की सुरक्षा,ऊर्जा स्थिरता,सामरिक सैन्य ठिकाने और क्षेत्रीय स्थिरता के माध्यम से ईरान के प्रभाव को सीमित करना है। अमेरिका,सऊदी अरब,यूएई और कतर जैसे अपने सहयोगियों के माध्यम से पेट्रोडॉलर को सुरक्षित रखता है और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अपनी सैन्य उपस्थिति बनाएं हुए है।  अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति के माध्यम से ईरान के प्रभाव को कम करने का प्रयास करता है। यह सऊदी अरब और यूएई जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने पर केंद्रित है। अमेरिका खाड़ी देशों को अरबों डॉलर के हथियार और रक्षा प्रणालियां  बेचता है, जो रक्षा सहयोग और आर्थिक संबंधों को मजबूत करता है। मध्य पूर्व में सक्रिय आतंकवादी समूहों को रोकने के लिए अमेरिका क्षेत्र के देशों के साथ खुफिया और सैन्य सहयोग बनाएं रखता है। ईरान के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव और अमेरिका की कम होती भागीदारी के कारण खाड़ी देशों में असुरक्षा की भावना बढ़ी  सकती है जिससे  इस क्षेत्र में रूस  और चीन का प्रभाव बढ़ सकता है। अमेरिका अपने आर्थिक और सामरिक हितों की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर है और वह ईरान को लेकर आक्रमक बना रहना चाहता है।

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