विदेश नीति का सबसे अहम गुण राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता होना चाहिए। इसे रणनीतिक लचीलापन कहा जा सकता है। बांग्लादेश के संदर्भ में आज भारत की विदेश नीति इसी कसौटी पर खड़ी है। ढाका में राजनीतिक सत्ता के बदलते समीकरणों ने नई दिल्ली के सामने केवल एक नई सरकार से संबंध बनाने की चुनौती नहीं रखी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि भारत अपनी उस पड़ोसी नीति को किस तरह पुनर्परिभाषित करे, जिसकी नींव पिछले डेढ़ दशक में शेख हसीना के नेतृत्व के साथ गहरे राजनीतिक विश्वास पर रखी गई थी।
हाल के दिनों में राष्ट्रपति भवन से जुड़ी एक असाधारण घटना ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में मौजूद इस नए राजनयिक संशय को प्रतीकात्मक रूप से सामने ला दिया। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा को लेकर राष्ट्रपति भवन में औपचारिक समारोह के कार्यक्रम में बदलाव की सूचना सामने आई और फिर उसे वापस ले लिया गया। बांग्लादेश की ओर से भी यात्रा को लेकर अंतिम निर्णय स्पष्ट नहीं था। यह घटनाक्रम भले ही प्रशासनिक और राजनयिक प्रक्रियाओं की जटिलता का परिणाम हो, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल जरूर उभरता है, क्या भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अभी पुराने विश्वास और नए राजनीतिक यथार्थ के बीच किसी संक्रमणकाल से गुजर रहे है। बेहतर संबंधों के लिए भारत की व्यापक बांग्लादेश नीति में उत्तर तलाशने की जरूरत है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह शेख हसीना के साथ अपने पुराने संबंधों की विरासत को न तो नकारे और न ही उसे वर्तमान संबंधों की राह में स्थायी बाधा बनने दे। विदेश नीति व्यक्तियों से नहीं, राष्ट्रीय हितों से चलती है। इसलिए तारिक रहमान की सरकार के साथ संवाद भारत की मजबूरी नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।
पिछले वर्षों में भारत ने बांग्लादेश के साथ संबंधों को जिस स्तर तक पहुंचाया, वह दक्षिण एशिया की कूटनीति की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। व्यापार, बिजली, ऊर्जा, सड़क और रेल संपर्क, सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग, जल और सांस्कृतिक संबंधों ने दोनों देशों को पहले की तुलना में कहीं अधिक करीब लाया। लेकिन इस सफलता का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर भारत को गंभीरता से विचार करना होगा। कूटनीतिक स्तर पर भारत और बांग्लादेश करीब आए, लेकिन यह निकटता दोनों देशों की जनता के बीच अपेक्षित विश्वास में पूरी तरह तब्दील नहीं हो सकी। यही वह जगह है जहां भारत की कूटनीति को अपनी दिशा बदलने की जरूरत है। भारत ने लंबे समय तक बांग्लादेश की स्थिरता को वहां की सरकार के साथ अपने संबंधों के माध्यम से देखा। यह दृष्टिकोण अपने समय में उपयोगी रहा होगा, लेकिन बदलते राजनीतिक वातावरण में इसकी सीमाएं सामने आ रही हैं। बांग्लादेश अब केवल शेख हसीना और उनके विरोधियों के बीच की राजनीति नहीं है। वहां एक नई युवा पीढ़ी है, नए राष्ट्रवादी विमर्श हैं, इस्लामी राजनीतिक शक्तियां हैं, चीन के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध हैं, पाकिस्तान के साथ पुनः उभरते संपर्क हैं और अमेरिका सहित विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ नए समीकरण बनाने की आकांक्षा है। यदि भारत इस बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को केवल पुराने राजनीतिक चश्मे से देखेगा तो वह बांग्लादेश के भीतर अपनी स्वीकार्यता के महत्वपूर्ण अवसर खो सकता है।
इसलिए भारत को यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि बांग्लादेश चीन या पाकिस्तान के करीब क्यों जा रहा है। उससे अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत बांग्लादेश के लिए चीन और पाकिस्तान से अधिक उपयोगी, विश्वसनीय और दीर्घकालिक साझेदार कैसे बन सकता है, यही रणनीतिक लचीलापन है। चीन के पास बांग्लादेश को देने के लिए बड़ी आर्थिक और अवसंरचनात्मक क्षमता है। पाकिस्तान के पास ऐतिहासिक और राजनीतिक समीकरणों की अपनी जमीन है। भारत के पास इन दोनों से अलग और शायद अधिक गहरी शक्ति है,भौगोलिक निकटता, विशाल बाजार, ऊर्जा और संपर्क की संभावनाएं तथा सबसे महत्वपूर्ण साझी सांस्कृतिक विरासत। लेकिन किसी शक्ति का होना और उसका प्रभाव पैदा करना दो अलग बातें है। भारत के सामने चुनौती अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक निकटता को वास्तविक कूटनीतिक प्रभाव में बदलने की है। यही से भारत की सॉफ्ट पावर से स्मार्ट पब्लिक डिप्लोमेसी की यात्रा शुरू होनी चाहिए।
बांग्लादेश के साथ भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को केवल भारतीय नृत्य, संगीत, योग या सांस्कृतिक समारोहों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों देशों के बीच बंगाली भाषा, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक चेतना की गहरी समानताएं हैं। रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। भारत को इस साझा विरासत को अपनी संस्कृति के प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि साझे सांस्कृतिक स्पेस के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। भारत यदि बांग्लादेश को यह बताने की कोशिश करेगा कि उसकी संस्कृति कितनी महान है, तो यह संदेश उपदेश जैसा लग सकता है। लेकिन यदि भारत यह कहे कि हमारी कई सांस्कृतिक स्मृतियां साझा हैं और इन्हें मिलकर आगे बढ़ाया जा सकता है, तो संवाद की संभावना कहीं अधिक होगी। इसीलिए भारत को बांग्लादेश की अपनी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संवेदनाओं और जनभावनाओं को समझते हुए उसी के अनुरूप अपनी सांस्कृतिक कूटनीति तैयार करनी होगी। बांग्लादेश में बंगाली भाषा और साहित्य को जिस तरह समझा जाता है, उसकी अपनी विशिष्टता है। 1971 की स्मृति भी वहां राष्ट्रीय अस्मिता का हिस्सा है। भारत को 1971 के योगदान को बार-बार अपने उपकार की तरह प्रस्तुत करने से बचना होगा और उसे दोनों देशों की साझी ऐतिहासिक यात्रा के रूप में देखना चाहिए। अतीत के सम्मान के साथ भविष्य की साझेदारी पर जोर देना अधिक प्रभावी होगा।
बांग्लादेश की युवा पीढ़ी के सामने 1971 से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न आज रोजगार, शिक्षा, तकनीक, उद्यमिता और वैश्विक अवसरों के है। भारत यदि इस युवा आकांक्षा का साझेदार बनता है तो उसकी कूटनीतिक स्वीकार्यता स्वतः बढ़ेगी। भारतीय विश्वविद्यालयों में बांग्लादेशी छात्रों के लिए अवसर बढ़ाना, संयुक्त शोध, युवा आदान-प्रदान, स्टार्टअप सहयोग, मीडिया संवाद और सांस्कृतिक यात्राएं ऐसे निवेश हैं जिनका परिणाम किसी एक सरकार के कार्यकाल में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में दिखाई देगा। भारत को बांग्लादेश में सरकार से आगे बढ़कर समाज से संवाद करने की कूटनीति पर आगे बढना चाहिए। पत्रकारों, शिक्षाविदों, कलाकारों, व्यापारियों, युवाओं और नागरिक समाज के साथ संबंध किसी भी सरकार से संबंधों की तुलना में अधिक स्थायी हो सकते हैं। आज सोशल मीडिया इस जनसंवाद का सबसे बड़ा माध्यम है। भारत को बांग्ला भाषा में ऐसी डिजिटल पब्लिक डिप्लोमेसी विकसित करनी चाहिए जो सरकारी प्रचार से अधिक वास्तविक संवाद पर आधारित हो। भारत की कहानी भारत स्वयं बताए, यह पर्याप्त नहीं है, आवश्यकता इस बात की है कि बांग्लादेशी समाज को भारत के साथ अपने सकारात्मक अनुभव साझा करने का अवसर मिले।
राष्ट्रपति भवन की तैयारियों और फिर उनके टलने से पैदा हुआ हालिया संशय इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह बताता है कि कूटनीति में सिर्फ इच्छा पर्याप्त नहीं होती, राजनीतिक वातावरण भी तैयार करना पड़ता है। भारत को तारिक रहमान के साथ संवाद करना है तो उसे स्वागत की औपचारिकताओं से पहले विश्वास की जमीन तैयार करनी होगी। कूटनीति में कभी-कभी एक यात्रा टल जाना असफलता नहीं होता, असफलता तब होती है जब उससे सीख न ली जाए। भारत के लिए बांग्लादेश की नीति का सबसे महत्वपूर्ण सबक यही है कि पड़ोसी सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन पड़ोसी देश नहीं बदलते। इसलिए भारत को किसी एक नेता के साथ अपने संबंधों को बांग्लादेश के साथ संबंधों का पर्याय नहीं बनने देना चाहिए। हसीना के साथ मजबूत संबंध भारत की कूटनीतिक उपलब्धि थे, लेकिन अब उसी उपलब्धि को व्यापक बांग्लादेशी समाज के साथ दीर्घकालीन विश्वास में बदलना होगा। भारत को बांग्लादेश को अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखने की कोशिश करने के बजाय ऐसा साझेदार बनना चाहिए जिसे बांग्लादेश अपने विकास, सुरक्षा और वैश्विक आकांक्षाओं के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण माने। चीन को रोकने और पाकिस्तान को संतुलित करने की रणनीति से अधिक महत्वपूर्ण है भारत को बेहतर विकल्प बनाना।
अंततः भारत की नई बांग्लादेश नीति का सूत्र बहुत सरल है,सरकार के साथ संवाद, समाज के साथ संपर्क, युवाओं के साथ भविष्य, संस्कृति के साथ आत्मीयता और राष्ट्रीय हितों पर दृढ़ता। भारत को बांग्लादेश के साथ अपनी दोस्ती बदलने की जरूरत नहीं है, लेकिन बदलते बांग्लादेश के लिए अपनी कूटनीति बदलने की जरूरत अवश्य है। यही रणनीतिक लचीलापन है और आज भारत-बांग्लादेश संबंधों को शायद सबसे अधिक इसी की जरूरत है।