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जनसत्ता

विश्व राजनीति में शक्ति का परिवर्तन अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे विश्वास,आर्थिक प्रभाव और कूटनीतिक अवसरों के माध्यम से विकसित होता है। चीन की यात्रा पर पहले ट्रम्प और उसके बाद पुतिन का पहुंचना केवल औपचारिक कूटनीतिक घटनाएं नहीं थीं। शी जिनपिंग के साथ उनकी मुलाकातों और उसके बाद हुई घोषणाओं ने दुनिया को यह स्पष्ट संकेत दिया है कि चीन एक आर्थिक शक्ति से आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका के बड़े प्रतिद्वंदी के रूप में तेजी से उभर रहा है। ट्रम्प और जिनपिंग की बीजिंग वार्ता में दोनों देशों के बीच वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा के संकेत स्पष्ट दिखाई दिए। इस पूरी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि चीन ने स्वयं को वैश्विक शक्ति संतुलन के केंद्रीय मंच के रूप में प्रस्तुत किया। वहीं पुतिन और जिनपिंग ने संयुक्त रूप से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत की तथा एकतरफा दबाव,वर्चस्ववादी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के एकतरफा उपयोग पर गहरी चिंता जताई। चीन और रूस स्वयं को पश्चिमी प्रभाव के समानांतर एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहते है। अमेरिका की दशकों पुरानी सहयोग और साझेदारी पर आधारित कूटनीति को पीछे छोड़कर आर्थिक हितों पर केंद्रित ट्रम्प की बैचेनी और रूस तथा चीन की हस्तक्षेपवादी नीतियों से यह प्रश्न सामने है की भविष्य की विश्व व्यवस्था किन मूल्यों,संस्थाओं और शक्ति संतुलनों पर आधारित होगी।


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में खुद को स्थापित करकर वैश्विक व्यवस्था के संरक्षक के रूप में भी अपनी भूमिका स्थापित की। उसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार,सुरक्षा,वित्तीय संस्थाओं और सामरिक गठबंधनों का ऐसा ढांचा तैयार किया,जिसने दशकों तक विश्व राजनीति की दिशा तय की है। संयुक्त राष्ट्र संघ, उत्तर अटलांटिक संधि संगठन,अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में अमेरिका की केंद्रीय भूमिका रही। डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुख्य मुद्रा बना, अमेरिकी तकनीक और बाजार दुनिया के विकास का आधार बने और उसकी सैन्य उपस्थिति ने अनेक क्षेत्रों में शक्ति संतुलन बनाएं रखा। इसी कारण दुनिया के कई देशों ने अपनी सुरक्षा,व्यापार और आर्थिक स्थिरता के लिए अमेरिका पर भरोसा किया। अमेरिका सैन्य शक्ति के साथ वैश्विक नियमों,मुक्त व्यापार और कूटनीतिक संतुलन का प्रमुख केंद्र भी बना। लेकिन ट्रम्प के दौर में टैरिफ युद्ध,अंतरराष्ट्रीय समझौतों से दूरी,सहयोगी देशों पर सार्वजनिक दबाव और वैश्विक संस्थाओं के प्रति अनिश्चित रवैये ने अमेरिका की उस छवि को कमजोर किया,जो दशकों तक विश्व व्यवस्था के स्थिर नेतृत्वकर्ता की रही थी। अब अमेरिका के दुनियाभर में मौजूद पारंपरिक सहयोगियों के भीतर असहजता बढ़ गई है।

वहीं चीन ने स्वयं को स्थिरता,निवेश और वैकल्पिक साझेदारी के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया है। यही वजह है कि आज कई राष्ट्राध्यक्ष बीजिंग की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे है। वे चीन के साथ व्यापार तो करना चाहते ही है,इसके साथ ही बदलते शक्ति संतुलन में अपनी नई रणनीतिक स्थिति भी तलाश रहे है। चीन अभी पूरी तरह अमेरिका का विकल्प न बना हो,लेकिन बीते डेढ़ दशक में उसने यह अवश्य दिखा दिया है कि वह विश्व राजनीति,वैश्विक व्यापार और सामरिक समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। दुनिया के अनेक देशों को अब यह महसूस भी होने लगा है कि आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था केवल वॉशिंगटन केंद्रित नहीं रहेगी। इस परिवर्तन के पीछे चीन की आर्थिक शक्ति, तकनीकी विस्तार और दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश की भूमिका तो है,लेकिन अमेरिकी कूटनीति गलतियां भी कम जिम्मेदार नहीं है। ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका ने कूटनीति को वैश्विक दृष्टिकोण से हटाकर घरेलू राजनीतिक लाभों तक सीमित कर दिया। अंतरराष्ट्रीय सहयोग,बहुपक्षवाद और दीर्घकालिक साझेदारी की जगह तत्काल राजनीतिक संदेश और आर्थिक दबाव को प्राथमिकता दी गई। ट्रम्प ने यूरोप,कनाडा,मैक्सिको और भारत सहित कई देशों पर टैरिफ लगाए। अमेरिका के सहयोगियों को यह महसूस हुआ कि वॉशिंगटन अब मित्र और प्रतिद्वंद्वी के बीच स्पष्ट अंतर नहीं कर रहा। यूरोपीय देशों ने इसे आर्थिक दबाव की राजनीति के रूप में देखा। नाटो को लेकर ट्रम्प का रवैया विवादास्पद रहा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाटो देशों पर पर्याप्त रक्षा खर्च न करने का आरोप लगाया और कई बार यह संकेत दिए कि यदि सहयोगी अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं करेंगे तो अमेरिका सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर पुनर्विचार कर सकता है। इससे यूरोप में यह चिंता बढ़ी कि अमेरिका अब पहले जैसा भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार नहीं रहा।


2015 में ईरान के साथ अमेरिका,रूस,चीन,फ्रांस,ब्रिटेन,जर्मनी तथा यूरोपीय संघ के बीच हुआ परमाणु समझौता एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था। इस समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना सहयोगियों के लिए बड़ा झटका था। यूरोपीय देशों ने इस परमाणु समझौते को महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि माना था,लेकिन अमेरिका के हटने से यह संदेश गया कि वॉशिंगटन अंतरराष्ट्रीय समझौतों को घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार बदल सकता है। इसी प्रकार विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेरिस समझौते जैसे वैश्विक ढांचों से दूरी बनाने के फैसलों ने भी अमेरिका की बहुपक्षीय नेतृत्वकर्ता की छवि को कमजोर किया। पेरिस जलवायु समझौते से हटने के अमेरिकी निर्णयों से वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने और जलवायु वित्तपोषण के प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। इसी तरह,विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों से फंडिंग रोकने से महामारी प्रबंधन व स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मामलों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर हुआ है। सहयोगी देशों को इन घटनाक्रमों से यह संदेश गया की अमेरिका वैश्विक चुनौतियों पर सामूहिक नेतृत्व की अपेक्षा एकतरफा नीति अपना रहा है।


ट्रम्प की शैली भी कूटनीतिक दृष्टि से असामान्य मानी गई है। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों पर सहयोगी देशों के नेताओं की आलोचना की,जिससे पारंपरिक कूटनीतिक शिष्टाचार प्रभावित हुआ। अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल शक्ति से नहीं,बल्कि विश्वास और सम्मान से भी संचालित होते है और यही क्षेत्र ट्रम्प की नीतियों से सबसे अधिक प्रभावित हुआ। वेनेजुएला के नेतृत्व को अस्थिर करने के प्रयासों,कठोर आर्थिक प्रतिबंधों और ईरान के खिलाफ सैन्य एवं आर्थिक दबाव की नीतियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक रहा है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता,प्रतिबंधों और सत्ता संघर्ष ने तेल उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों पर पड़ा,जिससे कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा। इसी प्रकार ईरान पर हमलों से स्थितियां ज्यादा बिगड़ गई। दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती है,इसलिए हर तनाव का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर दिखाई देता है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से परिवहन,उद्योग,खाद्य पदार्थों और मुद्रा विनिमय दरों तक व्यापक असर पड़ा है। अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों और वित्तीय दबाव का अत्यधिक उपयोग वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अस्थिर बना रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई देश वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था को लेकर गंभीर हो गए है। चीन और रूस ने इसी असंतोष का लाभ उठाकर डॉलर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक आर्थिक ढांचों को बढ़ावा देने की कोशिश की है। अमेरिका के सहयोगी देशों ने वैकल्पिक रणनीतिक विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया है। यूरोप में रणनीतिक स्वायत्तता की चर्चा तेज हुई है,जबकि कई देशों ने चीन और रूस के साथ संतुलित संबंध बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएं है।


ट्रम्प की नीतियों से उत्पन्न वैश्विक असंतोष और चीन तथा रूस की वैकल्पिक शक्ति केंद्र बनने की कोशिशों के बीच विश्व व्यवस्था का भविष्य सवालों में है। लंबे समय तक अमेरिकी प्रभाव में वैश्विक स्थिरता,व्यापार और सहयोग का ढांचा तैयार हुआ था। इन संस्थाओं पर पश्चिमी प्रभाव और असमान शक्ति संतुलन को लेकर बहस भी बढ़ी। इसी असंतोष का लाभ चीन और रूस उठा रहे हैं। वे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था,स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और पश्चिमी प्रभुत्व से मुक्त वैश्विक संरचना की बात कर रहे हैं। लेकिन चुनौती यह है कि क्या नई उभरती शक्तियां केवल अमेरिकी प्रभुत्व का विरोध कर रही है,या वे वास्तव में अधिक न्यायपूर्ण,पारदर्शी और संतुलित वैश्विक व्यवस्था प्रस्तुत कर सकती है। किसी भी विश्व व्यवस्था की स्थिरता शक्ति के साथ विश्वास,नियमों और संस्थागत विश्वसनीयता से तय होती है।


अमेरिका की नीतियों पर दुनिया भर में आलोचना होती रही है लेकिन फिर भी अमेरिकी व्यवस्था में लोकतांत्रिक संस्थाएं,स्वतंत्र मीडिया,न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों की एक मजबूत परंपरा मौजूद है। अमेरिकी नीतियों का विरोध स्वयं अमेरिका के भीतर भी खुलकर होता है। इसके विपरीत चीन और रूस की राजनीतिक संरचनाएं केंद्रीकृत और नियंत्रण आधारित मानी जाती हैं। चीन में एकदलीय व्यवस्था है,जहां राजनीतिक असहमति,मीडिया स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर व्यापक नियंत्रण देखने को मिलता है। चीन आर्थिक विकास और स्थिरता को प्राथमिकता देता है,लेकिन मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उस पर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। इसी प्रकार रूस में भी विपक्ष,मीडिया और राजनीतिक असहमति के प्रति कठोर रवैये की आलोचना होती रही है। इन देशों में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण और सुरक्षा तंत्र की मजबूत भूमिका पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल से अलग व्यवस्था प्रस्तुत करती है। चीन और रूस स्वयं को पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे है, लेकिन वे संप्रभुता,राष्ट्रीय नियंत्रण और बहुध्रुवीय शक्ति संतुलन के समर्थक के रूप में उभरते है। यहां उदार लोकतंत्र के वैकल्पिक मॉडल के किसी भी रूप का नामोनिशान तक नहीं है,जो वैश्विक स्तर पर शांतिप्रिय और वैधानिक व्यवस्था की मूलभूत जरूरत है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों से जुड़ी वैधानिक व्यवस्थाओं से दुनिया की प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ है और इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


बहरहाल रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था कायम करने की उम्मीदों के बीच महाशक्तियों के हित तथा विकासशील और स्वतंत्र देशों की एक सामूहिक,संतुलित और नैतिक आवाज का संघर्ष बरकरार है। इस समय वैश्विक राजनीति में अमेरिका बनाम चीन-रूस की प्रतिस्पर्धा से ज्यादा चिंता इस बात पर की जानी चाहिए की भविष्य की विश्व व्यवस्था किन मूल्यों,संस्थाओं और शक्ति संतुलनों पर आधारित होगी। आवश्यकता किसी एक महाशक्ति के समर्थन या विरोध से अधिक इस बात की है कि दुनिया ऐसी संतुलित और उत्तरदायी वैश्विक व्यवस्था विकसित करें जिसमें शक्ति के साथ साथ सहयोग,जवाबदेही और मानवीय मूल्यों का भी स्थान सुरक्षित रहे।

 

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