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 अमेरिकी कूटनीति की बदलती प्राथमिकताएं

      जनसत्ता      
                                                                         
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति में इन दिनों कूटनीति का एक ऐसा विरोधाभास दिखाई दे रहा है, जिसने पारंपरिक मित्रता और प्रतिद्वंद्विता की धारणाओं को उलट दिया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका पहुंचने पर ट्रम्प स्वयं हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने पहुंचे, लाल कालीन बिछा, सैन्य सम्मान दिया गया और व्हाइट हाउस में भव्य राजकीय समारोह तथा रात्रिभोज हुआ। जिस चीन को अमेरिका लंबे समय से अपना प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है, उसके नेता के लिए ऐसा आत्मीय और भव्य स्वागत निश्चित रूप से अमेरिकी कूटनीति के बदलते तेवर का बड़ा संकेत है। इसके समानांतर, अपने पारंपरिक साझेदारों के साथ व्यापार, शुल्क और रणनीतिक अपेक्षाओं को लेकर ट्रम्प का रवैया अधिक कठोर दिखाई देता है।
अमेरिका के पारंपरिक मित्र देशों के साथ ट्रम्प की नीति को देखें तो यह विरोधाभास और स्पष्ट हो जाता है। कनाडा अमेरिका का पड़ोसी होने के साथ-साथ नाटो का सहयोगी और उत्तर अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण साझेदार है। दोनों देश उत्तर अमेरिकी एयरोस्पेस रक्षा कमान नॉराड के माध्यम से महाद्वीपीय रक्षा में सहयोग करते हैं और दशकों से गहरे आर्थिक संबंधों से जुड़े रहे है। इसके बावजूद ट्रम्प प्रशासन के दौर में कनाडा पर भारी शुल्क लगाने, व्यापारिक दबाव बढ़ाने और कनाडा की संप्रभुता से जुड़े विवादास्पद बयानों ने द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर तनाव में पहुंचा दिया है। पिछले कई दशकों की गहरी आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी के बाद अमेरिका-कनाडा संबंधों इस समय बहुत बुरे दौर में प्रवेश कर चूके है। यूरोप और नाटो के सहयोगी अमेरिका के लिए इससे भी व्यापक रणनीतिक महत्व रखते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी अटलांटिक सुरक्षा व्यवस्था का आधार ही अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों की साझेदारी रही है। फिर भी ट्रम्प ने नाटो सहयोगियों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग को अत्यंत कठोर तरीके से उठाया और यूरोपीय देशों की अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भरता पर बार-बार सवाल खड़े किए। 2026 में ईरान युद्ध के दौरान ब्रिटेन, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों की सैन्य भूमिका को लेकर भी ट्रम्प की सार्वजनिक नाराजगी सामने आई।
जापान अमेरिकी रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हिंद-प्रशांत में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका-जापान सुरक्षा साझेदारी लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। जापान क्वाड और व्यापक हिंद-प्रशांत रणनीति में भी अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है। इसके बावजूद ट्रम्प की शुल्क नीति ने जापान सहित अमेरिकी मित्र देशों को बार-बार नए व्यापार समझौतों के लिए दबाव में ला दिया। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया अमेरिका का संधि सहयोगी और हिंद-प्रशांत सुरक्षा ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऑकस जैसी व्यवस्था में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी चीन से संबंधित क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों के लिए महत्वपूर्ण है। फिर भी ट्रम्प की व्यापार नीति ने ऑस्ट्रेलिया और अन्य पारंपरिक सहयोगियों के साथ आर्थिक संबंधों में अनिश्चितता पैदा की। कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों से निपटने में अमेरिका-दक्षिण कोरिया सुरक्षा गठबंधन दशकों से केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। इसके बावजूद ट्रम्प प्रशासन के दौरान दक्षिण कोरिया के साथ व्यापार, शुल्क और सुरक्षा-साझेदारी की लागत को लेकर तनाव सामने आया। 2026 में ईरान संकट के दौरान भी ट्रम्प ने दक्षिण कोरिया और जापान सहित सहयोगी देशों से अपेक्षित सैन्य सहयोग न मिलने पर सार्वजनिक रूप से असंतोष व्यक्त किया।
वहीं चीन अमेरिका के लिए आज सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौतियों में गिना जाता है। आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, सैन्य विस्तार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ताइवान और हिंद-प्रशांत में बढ़ते प्रभाव के कारण वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार गहरी हुई है। अमेरिकी रणनीति ने पिछले कुछ दशकों में चीन को प्रमुख रणनीतिक प्रतिस्पर्धी मानकर उसके प्रभाव को सीमित करने के लिए सहयोगियों और साझेदारों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया है। ऐसे में ट्रम्प का वर्तमान रुख एक गहरे विरोधाभास को सामने लाता है। एक ओर चीन को अमेरिकी शक्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है, दूसरी ओर उसी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए वॉशिंगटन में रेड कारपेट बिछता है, भव्य स्वागत होता है और ट्रम्प व्यक्तिगत संबंधों तथा समझौते की भाषा बोलते दिखाई देते है। दूसरी ओर, कनाडा, यूरोप, जापान,भारत और दक्षिण कोरिया जैसे लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा रहे सहयोगियों के साथ शुल्क, व्यापार, रक्षा खर्च और रणनीतिक प्रतिबद्धताओं को लेकर दबाव और कठोर सौदेबाजी दिखाई देती है। इस स्थिति ने अमेरिकी विदेश नीति की पारंपरिक धुरी को उलटने जैसा दृश्य पैदा किया है, प्रतिद्वंद्वी से समझौते की गुंजाइश, सहयोगी से अधिक कठोर सौदेबाजी और मित्रता के ऊपर तत्काल अमेरिकी हित। ट्रम्प की कूटनीति का यही विरोधाभास आज वॉशिंगटन की विदेश नीति को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। ट्रम्प की अमेरिका प्रथम नीति पारंपरिक मित्रता और प्रतिद्वंद्विता की स्थापित सीमाओं को उलटती हुई दिखाई देती है।
इस बदलते अमेरिकी दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर पड़ सकता है। अमेरिका ने पिछले एक दशक में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड को मजबूत किया है। भारत को हिंद-प्रशांत में अमेरिका का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार माना गया है और चीन के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में दोनों देशों के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति तंत्र सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में वॉशिंगटन में शी जिनपिंग का भव्य स्वागत और ट्रम्प-जिनपिंग के बीच उच्चस्तरीय संवाद स्वाभाविक रूप से नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। भारत के लिए चिंता का प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका और चीन के बीच संवाद क्यों हो रहा है। बड़े देशों के बीच संवाद और तनाव कम करने के प्रयास अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सामान्य हिस्सा है।  लेकिन यदि अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक समझ बढ़ती है, तो हिंद-प्रशांत में भारत की भूमिका और क्वाड की प्राथमिकताओं पर उसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। अमेरिका-चीन संबंधों में स्थिरता आने पर चीन को संतुलित करने के लिए भारत की रणनीतिक उपयोगिता के बारे में अमेरिकी दृष्टिकोण में बदलाव आ सकता है। यह बदलाव व्यापार के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव तथा आपूर्ति तंत्र में बदलाव के कारण कंपनियों ने चीन से बाहर भी निवेश के विकल्प तलाशे। इसी से चाइना प्लस वन जैसी रणनीतियों को बढ़ावा मिला और भारत ने वैश्विक विनिर्माण तथा आपूर्ति तंत्र के एक वैकल्पिक केंद्र के रूप में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। अब यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव कम होता है, तो चीन से बाहर निवेश करने की कंपनियों की जरूरत और इसके लिए मिलने वाले प्रोत्साहन कुछ हद तक कम हो सकते है। दूसरी और भारत-अमेरिका संबंधों में अनिश्चितता लगातार बढ़ी है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमति के बीच हाल ही में रूसी तेल खरीद से जुड़े संभावित अमेरिकी शुल्कों ने नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच एक नया तनाव पैदा किया है। भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इन प्रस्तावित शुल्कों के प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।
ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात अमेरिकी रणनीति में संभावित बदलावों का संकेत है। यदि अमेरिका चीन से प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ उसके साथ समझौते और सह-अस्तित्व की नीति भी अपनाता है, तो भारत को भी अपनी विदेश नीति में किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता के स्थान पर रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीय संबंधों और अपने राष्ट्रीय हितों पर अधिक जोर देना होगा। भारत के लिए क्वाड महत्वपूर्ण रहेगा, पर उसके साथ रूस, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम एशिया और वैश्विक दक्षिण के साथ संबंधों का विस्तार भी समान रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि ट्रम्प द्वारा जिनपिंग को दिया गया रेड कारपेट स्वागत  नितांत अमेरिका-चीन संबंधों की तस्वीर नहीं है। यह हिंद-प्रशांत की पूरी रणनीतिक संरचना को समझने का एक नया परिदृश्य भी प्रस्तुत करता है, जहां कल का प्रतिद्वंद्वी आज बातचीत की मेज पर सम्मानित अतिथि हो सकता है और दशकों पुराना सहयोगी व्यापार तथा रणनीतिक दबाव के बीच स्वयं को नए समीकरणों में ढालने के लिए विवश हो सकता है। किसी महाशक्ति की वास्तविक शक्ति  मात्र उसके हथियारों, अर्थव्यवस्था या तकनीक से निर्धारित नहीं होती। उसकी विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि मित्र देश अमेरिकी प्रतिबद्धताओं पर भरोसा कम करने लगें, तटस्थ देश उसके नेतृत्व से दूरी बनाने लगें और प्रतिद्वंद्वी देश उसके स्थान पर अपनी वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तुत करने लगें, तो अमेरिकी प्रभुत्व के गिरावट की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट हो सकती है।
अमेरिका का पतन किसी युद्ध में हार या किसी एक आर्थिक संकट से नहीं होगा। किसी भी महाशक्ति का वास्तविक पतन तब शुरू होता है, जब उसकी शक्ति से पहले उसकी विश्वसनीयता कमजोर होती है, उसके सहयोगी उससे दूरी बनाने लगते है और दुनिया उसके नेतृत्व के विकल्प तलाशने लगती है। यदि अमेरिका अपने पारंपरिक मित्रों को लगातार दबाव में रखता है, चीन जैसे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के साथ समझौते को प्राथमिकता देता है, डॉलर की केंद्रीयता को चुनौती मिलती है, तकनीकी बढ़त पर दबाव बढ़ता है और सहयोगी देश अपनी सुरक्षा तथा आर्थिक हितों के लिए वैकल्पिक शक्ति-केंद्रों की ओर बढ़ने लगते है, तो यह अमेरिकी प्रभुत्व के कमजोर पड़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। इतिहास बताता है कि महाशक्तियां एक दिन में नहीं गिरती, पहले उनका प्रभाव कमजोर होता है, फिर सहयोगियों का भरोसा घटता है, उसके बाद प्रतिद्वंद्वी शक्ति का विस्तार होता है और अंततः दुनिया एक नए शक्ति-संतुलन को स्वीकार करने लगती है। ट्रम्प की कूटनीति के सामने सबसे बड़ा जोखिम यही है कि चीन को रोकने के लिए दशकों में बनाई गई अमेरिकी रणनीतिक व्यवस्था को मजबूत करने की जगह उनकी नीतियां कहीं अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर और चीन को उसके करीब न कर दे। यदि ऐसा हुआ, तो अमेरिका का सबसे बड़ा संकट बाहर से आने वाली चुनौती नहीं होगा, उसकी अपनी नीतियां ही उसकी वैश्विक बादशाहत की नींव को कमजोर करने लगेंगी। ट्रम्प ने अमेरिकी कूटनीति के पारंपरिक समीकरणों को सिर के बल खड़ा कर दिया है, जिससे वैश्विक शक्ति-संतुलन में अनिश्चितता बढ़ी है और रणनीतिक दुविधा गहरी हुई है।

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