यूरोप में विविधता,असमानता और नस्लीय प्रतिनिधित्व पर खुली बहस
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यूरोप में विविधता,असमानता और नस्लीय प्रतिनिधित्व पर खुली बहस

राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप 

   

चुनिंदा लोगों को चुनने की प्रक्रिया एक असमानता-जनक मॉडल बन जाती है, जो सामाजिक और राजनीतिक एकता को बाधित करती है तथा संकीर्णता और हिंसा को बढ़ावा देती है। इसलिए कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कर्मचारियों की नस्लीय और जातीय विविधता के आंकड़े सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करती हैं। यूरोप एक ऐसा महाद्वीप है जहां सामाजिक न्याय,मानवाधिकार और समावेशन को लेकर निरंतर बहस होती रही है। खासकर विविधता,नस्लीय असमानता और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर यूरोप ने एक सतर्क और जागरूक रवैया अपनाया है। यह बहस केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रही,बल्कि कॉर्पोरेट, शैक्षणिक और सामाजिक स्तर पर भी सक्रिय रूप से सामने आई है।\

औपनिवेशिक इतिहास और द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवों के बाद यूरोपीय देशों ने समानता और मानवाधिकारों को अपने संवैधानिक ढांचे में समाहित किया है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां यूरोप में अपने कर्मचारियों की नस्लीय और जातीय पृष्ठभूमि से संबंधित डेटा सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करती हैं। यह पारदर्शिता सामाजिक उत्तरदायित्व और जवाबदेही की भावना को दर्शाती है। इससे यह स्पष्ट संकेत जाता है कि कंपनियां विविधता को केवल एक नीति नहीं बल्कि एक मूल्य के रूप में देखती हैं। यूरोप में यह स्वीकार किया गया है कि विभिन्न नस्लीय और जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व केवल सांख्यिकीय आवश्यकता नहीं,बल्कि सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है। कई यूरोपीय देशों में राजनीति, शिक्षा और मीडिया में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर खुलकर चर्चा होती है। यूरोप में नीति स्तर पर विविधता को बढ़ावा दिया जाता है, व्यवहार में कई बार चुनौतियां सामने आती हैं, शरणार्थियों और प्रवासियों को लेकर जनमत विभाजित होता है। इस्लामोफोबिया,एंटीरेसिज़्म और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषय विवाद का कारण बनते हैं। ब्रेग्ज़िट के समय ब्रिटेन में नस्लीय पहचान और राष्ट्रीयता पर तीव्र बहस देखी गई।

यूरोप में मीडिया और शिक्षण संस्थान विविधता को बढ़ावा देने और असमानता के विरुद्ध जनचेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इंटरकल्चरल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। यूरोप में विविधता,असमानता और नस्लीय प्रतिनिधित्व पर होने वाली खुली बहस एक सकारात्मक संकेत है कि समाज समावेशिता की ओर बढ़ रहा है। हालाँकि चुनौतियां बनी हुई हैं,परंतु संवाद और पारदर्शिता के माध्यम से यूरोप ने यह सिद्ध किया है कि विविधता को स्वीकार करना केवल नैतिक आवश्यकता नहीं,बल्कि सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की आधारशिला भी है। ट्विटर अपने अमेरिकी कार्यबल में  साढ़े आठ फीसदी काले कर्मचारियों की जानकारी दे चूकी है। कंपनी ने यह भी बताया कि उसकी नेतृत्व भूमिकाओं में  करीब सवा सात फीसदी काले कर्मचारी हैं।  इसी प्रकार Goldman Sachs ने 2021 में अपनी One Million Black Women पहल की शुरुआत की थी, जिसमें काले महिलाओं के लिए 10 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश और 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर की दान राशि देने का वादा किया गया था। इस पहल का उद्देश्य काले महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देना था। हालांकि, 2025 में, कंपनी ने इस पहल से नस्लीय भाषा को हटा दिया है, जिसमें Black शब्द को भी शामिल किया गया है। यह बदलाव 2023 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा नस्ल-आधारित सकारात्मक कार्रवाई को असंवैधानिक घोषित करने के बाद कानूनी दबाव के कारण किया गया है। अब, यह पहल विकास और अवसर जैसे व्यापक आर्थिक लक्ष्यों पर केंद्रित है। Goldman Sachs ने अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखने का दावा किया है और कहा है कि वह कानूनी परिवर्तनों के बावजूद काले महिलाओं के लिए आर्थिक समानता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। कंपनी का कहना है कि यह पहल अब व्यापक आर्थिक विकास और अवसरों पर केंद्रित है, न कि केवल नस्लीय पहचान पर। Microsoft,Target Citigroup  जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी अमेरिकी कार्यबल की नस्लीय विविधता डेटा प्रदान करती हैं। इनमें काले,लैटिनो, एशियाई और अन्य अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व शामिल है।

तथ्यों और आंकड़ों से  ऐसे दावे भी सामने आये है कि गूगल काले कर्मचारियों के साथ प्रणालीगत नस्लीय भेदभाव करता है। उन्हें निचले स्तर की नौकरियों में रखा जाता है। कम वेतन और पदोन्नति के अवसरों से वंचित किया जाता है। वहीं यह भी माना जाता है कि अमेरिका में काले और सफेद श्रमिकों के बीच बेरोजगारी और वेतन में ऐतिहासिक असमानता रही है।  काले नौकरी चाहने वालों को काम मिलने की संभावना श्वेतों की तुलना में लगभग आधी है। शिक्षा और कौशल में सुधार के बावजूद भी यह असमानता बनी हुई है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में एक हाई-प्रोफाइल मामले में तर्क दिया गया है कि कई कॉलेज अश्वेत और लैटिनो आवेदकों को प्रवेश में प्राथमिकता देते हैं,जिसके कारण एशियाई छात्रों को प्रवेश से वंचित होना पड़ता है। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह नीति अश्वेत और लैटिनो छात्रों के लिए अधिक अवसरों को खोलती है। जबकि अन्य का कहना है कि यह एशियाई छात्रों के लिए भेदभावपूर्ण है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मामले में एक वेबसाइट के अनुसार, हार्वर्ड विश्वविद्यालय पर आरोप है कि वह प्रवेश के समय अश्वेत और लैटिनो छात्रों के लिए अधिक तरजीह देता है। इससे एशियाई छात्रों को नुकसान होता है,क्योंकि उन्हें प्रवेश के लिए उसी स्तर की प्राथमिकता नहीं मिलती है।  ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि समान योग्यता और अनुभव रखने के बावजूद काले अफ्रीकी और कैरेबियन मूल के कर्मचारी श्वेत ब्रिटिश कर्मचारियों की तुलना में औसतन सात फीसदी से  पन्द्रह फीसदी कम वेतन पाते हैं। फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में भी प्रवासी और अश्वेत समुदायों को निम्न-स्तरीय, अस्थायी और कम वेतन वाली नौकरियों में अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है। जनसंख्या के आंकड़ों के बिना किसी भी सामाजिक या आर्थिक असमानता की वास्तविक स्थिति को समझना अधूरा होता है। जब हम यूरोप में श्रम बाजार में काले और सफेद श्रमिकों के बीच वेतन या रोजगार में असमानता की बात करते हैं, तो इन आंकड़ों की पृष्ठभूमि में जनसंख्या संरचना बेहद जरूरी है। यदि किसी देश में काले समुदाय की कुल जनसंख्या केवल पांच फीसदी है, पर वे श्रम बाजार में  दो फीसदी ही प्रतिनिधित्व रखते हैं, तो यह प्रतिनिधित्व में कमी का संकेत है।आंकड़े यह दिखा सकते हैं कि शिक्षा और अनुभव के स्तर बराबर होने के बावजूद काले श्रमिकों को कम वेतन मिलता है या उन्हें उच्च पद नहीं दिए जाते। अनेक सुधार करने के दावो और प्रयासों के बाद भी जनसंख्या बनाम नौकरी वितरण में कोई बदलाव आया या नहीं, यह जानने के लिए भी जनसंख्या आंकड़े जरूरी हैं।

भारत में सामाजिक और आर्थिक असमानता को समझने के लिए जातिगत जनगणना बेहद महत्वपूर्ण है। जाति एक ऐसी सामाजिक संरचना है जो भारतीय समाज में कई सदियों से अस्तित्व में है और इसका प्रभाव हर पहलु पर पड़ता है,चाहे वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, या आर्थिक अवसर हो। जातिगत जनगणना से यह समझने में मदद मिल सकती है कि समाज के किस वर्ग या जाति को सबसे अधिक अवसर मिल रहे हैं और कौन सा वर्ग आर्थिक या सामाजिक दृष्टि से हाशिए पर है। जातिगत जनगणना भारत में सामाजिक और आर्थिक असमानता की वास्तविक स्थिति को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके बिना हम यह नहीं जान सकते कि किन जातियों को अवसरों का अभाव है, और कहां सुधार की आवश्यकता है। यह जनगणना न केवल सरकार को उपयुक्त नीतियां बनाने में मदद  कर सकती है बल्कि समाज में समानता लाने के प्रयासों में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकेंगी। सामाजिक न्याय, समानता और समावेशन के संदर्भ में गहरे विचार की आवश्यकता है। यूरोप में नस्लीय भेदभाव पर चर्चा और सुधार की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं,वहीं भारत में जातीय जनगणना पर चर्चा अक्सर जटिल हो जाती है। भारत में बड़े पैमाने पर प्रभावशील असमानता को हल करने के लिए गहरे सामाजिक और आर्थिक सुधारों की आवश्यकता है। अगर सही दिशा में प्रयास किए जाएं,तो भारत में जातीय जनगणना का उपयोग समाज के असमान वर्गों को समान अवसर देने के लिए किया जा सकता है।

 

 

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