रणनीतिक निवेश मध्यपूर्व
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रणनीतिक निवेश मध्यपूर्व

राष्ट्रीय सहारा

 मध्यपूर्व का रणनीतिक और आर्थिक महत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है और यह समूचा क्षेत्र वैश्विक राजनीति,अर्थव्यवस्था और रणनीतिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। इस क्षेत्र का विशेष महत्व कई पहलुओं से जुड़ा हुआ है,जिनमें भूगोल,ऊर्जा संसाधन,ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक राजनीति में इसकी स्थिति शामिल है।ट्रंप की अपने दूसरे कार्यकाल की पहली बड़ी यात्रा में सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात और क़तर से आर्थिक साझेदारी का नया इतिहास लिखते हुए इसके पीछे जो रणनीतिक दांव खेले है,उसके दूरगामी वैश्विक परिणाम अमेरिकी हितों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकते है।  मध्य पूर्व दुनिया का एक ऐसा अहम क्षेत्र है जहां होने वाली गतिविधियां कई देशों को प्रभावित करती हैं।  इसमें सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर देश है सऊदी अरब।

ट्रम्प की यात्रा के दौरान अमेरिका और सऊदी अरब ने एक ऐतिहासिक अरबों डॉलर के आर्थिक और सैन्य सहयोग पैकेज पर हस्ताक्षर किए है। छह सौ अरब डॉलर से अधिक के इस पैकेज को इतिहास का सबसे बड़ा हथियार सौदा  माना जा रहा है। इसमें रक्षा,ऊर्जा,इन्फ़्रास्ट्रक्चर और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग शामिल हैं।  सऊदी अरब,अरब प्रायद्वीप के बड़े हिस्से को कवर करता है। पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के लिए इसकी रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब एकमात्र ऐसा देश है जिसकी तटरेखा लाल सागर और फारस की खाड़ी दोनों के साथ है। अमेरिका से सामरिक लाभ लेने के लिए सऊदी अरब को इस्राइल का विश्वास जीतना जरूरी है। यूएई,बहरीन और क़तर जैसे देश में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं।  ईरान की यही मांग रही है कि उन्हें यहां से हटाया जाए। सऊदी अरब को डर है कि ईरान पर से पूरी तरह से दबाव हटाने का मतलब होगा उसे निर्विवाद रूप से इस्लामिक  शक्ति बनाना और यह सऊदी अरब की महत्ता और इस्लामिक दुनिया में स्वीकार्यता के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

सऊदी अरब की कई दशकों से अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी रही है,जिससे अमेरिका के पूर्व और पश्चिमी एशिया में हितों का संवर्धन होता रहा है। सऊदी अरब और फ़ारस की खाड़ी के अन्य तेल उत्पादक देशों को तेल के बदले सुरक्षा देना इस क्षेत्र में अमेरिकी विदेश नीति का बुनियादी हिस्सा रहा है,लिहाज़ा काफी लंबे समय से सऊदी अरब की विदेश नीति पर अमेरिका की परछाईं रही है। मध्यपूर्व में शिया और सुन्नी विवाद के केंद्र में लेबनान,सीरिया,इराक़ और यमन जैसे और भी कई देश है जिन्हे सऊदी अरब  और ईरान अपने अपने गुटों को आर्थिक सहायता के साथ हथियार भी देते है।  मध्य-पूर्व में दशकों से दुश्मन रहे सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते ने कुछ समय पहले बड़ा बदलाव देखा था। चीन के दख़ल से ईरान के साथ सऊदी अरब के कूटनीतिक रिश्ते सुधर गये थे। अब ट्रम्प ने मध्यपूर्व में चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करते हुए एक बार फिर सऊदी अरब और अमेरिका के खास प्रतिद्वंदी ईरान को एक दूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।

मोहम्मद बिन सलमान ईरान को लेकर  कभी आश्वस्त थे ही नहीं,वे ईरान को अपने लिए सैन्य और वैचारिक स्तर पर अपने लिए ख़तरा मानते है। ईरान की आणविक क्षमताओं से सऊदी अरब  भलीभांति परिचित है और वह अमेरिका से सिविल न्यूक्लियर रिएक्टर की मांग कर चूका है। अब ट्रम्प ने सऊदी अरब के साथ जो अहम समझौते किये है उसमें सऊदी अरब को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने के लिए सौदा किया गया है। ट्रम्प ने इस मौके पर यह भी कहा की अमेरिका अपने सहयोगियों की रक्षा करने में अमेरिकी ताक़त का इस्तेमाल करने में कभी संकोच नहीं करूंगा।   यह भी दिलचस्प है की ट्रंप ने नेतन्याहू को भरोसा दिलाया है कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश करता है या उसके क़रीब पहुंचता है तो इसराइल को मिलिट्री ऑपरेशन करने की छूट है और मुमकिन है कि अमेरिका भी इस ऑपरेशन में शामिल होगा। अब सऊदी अरब से रणनीतिक समझौता करके ट्रंप ने और ज़्यादा प्रत्यक्ष तरीक़े से ईरान पर दबाव  डालने का बड़ा दांव खेल दिया है।   इसराइल-हिज़बुल्लाह की लड़ाई और सीरिया में बशर-अल-असद की सत्ता गिरने के बाद से मध्य पूर्व में ईरान के दबदबे को झटका लगा है।  ट्रम्प ने सीरिया पर लगे प्रतिबंधों को हटाकर सऊदी अरब को इस अस्थिर देश में मजबूत और विश्वसनीय बना दिया है। यह ईरान को  बड़ा झटका है वहीं नेतन्याहू के लिए बेहतर संदेश है।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की जटिलता को खत्म करने में कतर का बड़ा योगदान रहा और अब ट्रम्प इस देश से आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई पर ले गए है।ट्रम्प ने कतर से बोइंग विमानों की खरीद,हथियारों की खरीद,नेचुरल गैस और क्वांटम टेक्नोलॉजी से जुड़े करीब सवा ट्रिलियन डॉलर के सौदे  किये है। खाड़ी एकता के महत्व और चरमपंथ से लड़ने में क़तर की अहम भूमिका सबके सामने लगातार आई है और अब इसका फायदा इजराइल फिलीस्तीन तनाव को दूर करने में मिल सकता है। मध्य पूर्व में सबसे बड़ा अमेरिकी वायुसैन्य अड्डा कतर में है और यहां दस हजार अमेरिकी सैनिक तैनात है। कतर और अमेरिकी समझौता ईरान को परेशान करने के लिए काफी है। संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका के साथ एनर्जी,एआई और इंडस्ट्री समेत कई सेक्टर में साझेदार है। यूएई  अगले  दस  साल के भीतर अमेरिका में  करीब डेढ़ ट्रिलियन डॉलर का निवेश करेगा। संयुक्त अरब अमीरात,क़तर और सऊदी अरब ये तीनों खाड़ी देश न केवल मध्यपूर्व बल्कि पूरी दुनिया के राजनीतिक,आर्थिक और रणनीतिक परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी भौगोलिक स्थिति,ऊर्जा संसाधन,निवेश क्षमताएं और वैश्विक राजनीति में प्रभावशाली भूमिका के कारण इनका महत्व कई दृष्टिकोणों से देखा जाता है। ट्रम्प ने आर्थिक साझेदारी के बूते रणनीतिक दांव खेलकर अपने प्रतिद्वंदियों को चित्त कर दिया है। सऊदी अरब ओपेक का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है और तेल की कीमतों पर इसका बड़ा प्रभाव होता है। क़तर दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यातक देशों में से एक है। वहीं यूएई  इस्लामिक दुनिया में उदारवादी विकास मॉडल के कारण अलग पहचान रखता है। जाहिर है ट्रम्प ने मध्यपूर्व की सफलतम यात्रा से इस समूचे क्षेत्र की स्थिरता,वैश्विक ऊर्जा,सुरक्षा,निवेश,व्यापार और भू-राजनीति में अमेरिकी प्रभाव को एक बार फिर सबसे महत्वपूर्ण बना दिया है।

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