कमतर क्यों है दलित आदिवासी नेतृत्व
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कमतर क्यों है दलित आदिवासी नेतृत्व

सुबह सवेरे

बिहार,यूपी,ओडिशा,झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में दलित और आदिवासी वोट बैंक निर्णायक है। इन राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा से आरक्षित सीटों के माध्यम से कई नेता सामने आते है। डॉ.भीमराव आंबेडकर ने दलितों और आदिवासियों को संसद तथा विधानसभाओं में आरक्षण इसलिए प्रदान किया क्योंकि ये समुदाय सदियों से सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक रूप से वंचित रहे थे। उन्हें शिक्षा,संपत्ति और सत्ता से व्यवस्थित रूप से दूर रखा गया,जिससे वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग नहीं ले पाते थे। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि केवल समान अधिकार देने से वास्तविक समानता स्थापित नहीं होगी,जब तक कि इन वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व न मिले। इसलिए आरक्षण के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि दलित और आदिवासी समुदाय के लोग विधायिकाओं में पहुंचकर अपने हितों की रक्षा कर सके और अपनी समस्याओं को सीधे सरकार के सामने रख सके। डॉ. आंबेडकर ने राजनीतिक शक्ति को सामाजिक परिवर्तन का साधन माना। उनका विश्वास था कि जब ये वर्ग सत्ता संरचना का हिस्सा बनेंगे,तभी सामाजिक भेदभाव कम होगा और समानता स्थापित होगी।

संविधानिक अधिकारों के बूते सुरक्षित सीटों से जीतकर कई नेता दलित आदिवासियों का संसद में प्रतिनिधित्व करते है।  जिस दौर में डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व किया था,उस समय न तो कोई संविधान था और न ही कोई आरक्षण। अब वंचित वर्गों के लिए कई संविधानिक अधिकार है लेकिन इतने वर्षों के बाद भी बाबा साहेब आंबेडकर के मुकाबले कोई दलित या आदिवासी नेता दूर दूर तक नजर नहीं आता और यहीं कारण है की देश में अनुसूचित जाति और जनजाति की संख्या अच्छी खासी होने के बाद भी एक भी ऐसा सर्वमान्य नेता नहीं है जिस पर यह समुदाय भरोसा  कर सके।  

रामविलास पासवान एक दलित नेता थे,जिनकी पहचान जमीनी राजनीति और सामाजिक न्याय के मजबूत नेता के रूप में रही।  अब उनके बेटे चिराग पासवान अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे है।  बिहार में दलितों का अच्छा खासा वोट है।  आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव और सामाजिक दूरी देखने को मिलती है। शिक्षा और जागरूकता बढ़ने से स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अस्पृश्यता के रूप बदलकर अभी भी मौजूद हैं। दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं।  अधिकांश दलित समुदाय भूमिहीन या सीमांत किसान हैं। मजदूरी,असंगठित क्षेत्र और प्रवासी श्रम पर निर्भरता अधिक है। सरकारी योजनाओं के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी बड़ी समस्या है। चिराग पासवान,दलित आइकॉन की पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर खुद को एक बड़े,युवा और सर्वसमावेशी नेता के रूप में पेश कर रहे है,जो कानून-व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दे भी उठाते है लेकिन उन्होंने कोई ऐसा दलित आंदोलन खड़ा नहीं किया जिससे वे भारत के दलित आदिवासियों के विश्वसनीय चेहरा बन सके।  

रामदास अठावले भारतीय राजनीति में एक प्रमुख दलित नेता है। वे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले गुट) के राष्ट्रीय अध्यक्ष है,जो डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा से प्रेरित पार्टी है। अठावले महाराष्ट्र से आते है।  उनकी राजनीति का मुख्य आधार दलित अधिकार,सामाजिक न्याय और आरक्षण का समर्थन रहा है। वे अपने अलग और कभी-कभी हास्यपूर्ण बयानों के लिए चर्चा में रहते है,जो कई बार गंभीर राजनीति के अनुरूप नहीं माने जाते।
रामदास अठावले की राजनीति विचारधारा और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है, जो उन्हें सत्ता में तो रखती है लेकिन वे विश्वसनीय दलित नेतृत्व की तलाश में कहीं दिखाई नहीं देते।

भारत में सत्ता प्राप्त करने के लिए अलग अलग जातियों और धर्मों को अलग अलग प्रकार से उभारा जाता रहा है। यहां राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में सबसे पहले सत्ता,उसके बाद व्यक्तिगत हित,फिर समाज और अंत में कहीं राष्ट्र नजर आता है। भारत की राजनीतिक पार्टियां देश के लोकतंत्र को अगड़े पिछड़ों में देखती है और दलित आदिवासी नेता भी उन्हीं राजनीतिक दलों के वोट पाने के संसाधन बन गये है। मायावती डॉ.आंबेडकर के समावेशी समाज की कल्पना को साकार करने कि बात कहती रही है जबकि उसके राजनीतिक क्रियाकलाप ठीक इसके उलट नजर आते है। बसपा जातीय समस्या की समाप्ति से ज्यादा जातीय उभार देने के लिए प्रतिबद्ध नजर आती है। दूसरी और  व्यक्ति-केंद्रित नीतियों ने दलित राजनीति की दीर्घकालिक मजबूती को कमजोर किया है और उसमे  मायावती की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। बहुजन समाज पार्टी में निर्णय लेने की शक्ति अत्यधिक एक व्यक्ति तक सीमित हो गई। इससे जमीनी नेतृत्व और नए दलित नेताओं का उभरना बाधित हुआ। परिणामस्वरूप, दलित आंदोलन की विचारधारात्मक ऊर्जा और संगठनात्मक विस्तार कमजोर पड़ गया। कांशीराम के समय जो बहुजन  आधारित व्यापक सामाजिक गठबंधन था, वह धीरे-धीरे सिमटकर चुनावी रणनीति तक सीमित हो गया। इससे दलित राजनीति का व्यापक सामाजिक आधार कमजोर हुआ।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन की छवि एक ओर आदिवासी अधिकारों के सशक्त नेता की रही लेकिन वे कई विवादों से भी घिरे रहे।  उन पर सामाजिक न्याय से ज्यादा भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में संलिप्तता के आरोप लगे,जिससे आदिवासी आंदोलन की नैतिक शक्ति कमजोर हुई। वे झारखंड से न तो गरीबी खत्म कर पाएं और न ही आदिवासियों के पलायन को रोक पाएं।

जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार  को ही लीजिये। 2009 से 2014 तक वे लोकसभा की पहली महिला स्पीकर बनी।  बिहार से वे कई बार सांसद और केंद्रीय मंत्री भी रही। उन्होंने बिहार में दलितों के लिए आंदोलन या बड़े सामाजिक कार्यक्रम खड़े नहीं किए,जिससे शिक्षा,भूमि और रोजगार जैसे मुद्दों पर ठोस बदलाव नहीं दिखा।उनके उच्च पद का सीधा और ठोस प्रभाव बिहार के दलितों की जमीनी स्थिति पर  कोई बदलाव नहीं ला सका।

दरअसल दलित-आदिवासी राजनीति ने भारत में सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक बदलाव किए है। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और आरक्षण जैसे अधिकार सुनिश्चित किए,जिससे इन समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान मिली। संसद, विधानसभाओं और प्रशासनिक सेवाओं में उनकी भागीदारी बढ़ी और मायावती,शिबू सोरेन तथा मीरा कुमार जैसे नेता सत्ता के उच्च पदों तक पहुँचे। यह परिवर्तन प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, जिसने आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान को मजबूती दी। किन्तु, यह भी एक सच्चाई है कि समानता और सम्मान की वास्तविक स्थिति अभी अधूरी है। ग्रामीण भारत में आज भी जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा की घटनाएं  सामने आती हैं। दलितों के लिए भूमि स्वामित्व,गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थायी रोजगार अभी भी सीमित हैं। आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति और जटिल है,जहां विकास परियोजनाओं,खनन और वन नीतियों के कारण विस्थापन और आजीविका का संकट बना रहता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक अधिकारों का लाभ जमीनी स्तर तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का नेतृत्व परिवर्तनकारी था,जबकि आज का नेतृत्व अधिक व्यावहारिक और सत्ता-केंद्रित  हो गया है। उनका नेतृत्व मूलतः सामाजिक क्रांति और वैचारिक संघर्ष पर आधारित था। आंबेडकर का  उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं,बल्कि जाति व्यवस्था का उन्मूलन और समानता स्थापित करना था। उन्होंने शिक्षा,संगठन और आंदोलन के माध्यम से दलित समाज को जागरूक किया। संविधान में मौलिक अधिकार,आरक्षण और सामाजिक न्याय के प्रावधान उनके परिवर्तनकारी दृष्टिकोण का परिणाम हैं। आंबेडकर का नेतृत्व समाज की संरचना बदलने वाला था जबकि आज का नेतृत्व व्यावहारिक और सत्ता-केंद्रित हो गया है। देश की दलित-आदिवासी राजनीति धीरे-धीरे सत्ता-केंद्रित और चुनावी रणनीतियों तक सीमित होती गई है।

बाबा साहेब कहते थे की केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है,दलित आदिवासी और पिछड़ों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में जमीनी बदलाव आना चाहिए।  इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,कौशल विकास,भूमि सुधार और सामाजिक जागरूकता पर विशेष देने की जरूरत है। डॉ.आंबेडकर की प्राथमिकता सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने की थी,वे राजनीतिक सत्ता से प्रेम नहीं करते थे बल्कि उसका उपयोग करके सामाजिक न्याय की स्थिति मजबूत करना चाहते थे।  अब दलित आदिवासी नेता सत्ता में बने रहना चाहते है,वे चुनाव जीतने को सर्वोत्तम लक्ष्य समझते है। जाहिर है जहां सत्ता लोलुपता हो,वहां आंबेडकर नहीं हो सकते। यही कारण है की बाबा साहेब के बाद कोई भी ऐसा नेता दिखाई नहीं देता जिसे देश में व्यापक स्वीकार्यता और वंचित वर्ग का विश्वास हासिल हो।

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