जब दुनिया सिमट रही है,भारत अभी खुला है
article

जब दुनिया सिमट रही है,भारत अभी खुला है

    politics

दुनिया का यह  बेहिसाब बदलावों का दौर है,विकास के सपने है और इंसान की की बुद्धि से आगे निकलने की उम्मीदें भी बढ़ी है। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को इंसानी सोच से भी आगे बताकर भविष्य को अभूतपूर्व उजाले का रूप दिया जा रहा है। प्रगति की यह भाषा आकर्षक है और भरोसा जगाने वाली है। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर की परछाईं में सत्ता को स्थायी रूप से अपने कब्ज़े में रखने की महत्वाकांक्षाएं भी उतनी ही तीव्र होती जा रही हैं।  दरअसल इंसानी दिमाग से ही उपजी सत्तानशीं से दुनिया का नजारा भी बदल रहा है।   साझा  सत्ताएं सिमट रही हैं,स्वतंत्रताएं  सिकुड़ रही हैं और नागरिक अधिकार दबाव में हैं।

अनेक देश जहां कभी लोकतंत्र या गणतंत्र के उदाहरण माने जाते थे,वहां आज सत्ता का केंद्रीकरण,असहमति का दमन और नागरिक स्वतंत्रताओं का क्षरण सामान्य बात हो चुकी है। ऐसे वैश्विक परिदृश्य में यदि कोई बात भारत को अलग पहचान देती है,तो वह है,उसका अब भी खुला होना। तमाम कमियों,विरोधाभासों और चुनौतियों के बावजूद भारत  कभी भी विचार,असहमति और परिवर्तन की संभावना को पूरी तरह बंद नहीं होने देता।

ईरान,पाकिस्तान,बांग्लादेश,म्यांमार,सऊदी अरब,सीरिया और रूस जैसे देशों पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट दिखता है कि सत्ता यहां जनता से दूर और भय के क़रीब चली गई है। कहीं धार्मिक तानाशाही है,कहीं सैन्य शासन,कहीं राजशाही तो कहीं चुनी हुई सरकारों के पीछे छिपी निरंकुश शक्ति। इन देशों में चुनाव होते हों या न हों,वास्तविक सत्ता नागरिक के हाथ में नहीं है। असहमति अपराध है,प्रश्न पूछना जोखिम है और स्वतंत्रता शासक की इच्छा पर निर्भर है। ईरान में धार्मिक तानाशाही ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लगभग अपराध बना दिया है। महिलाओं,छात्रों और बुद्धिजीवियों पर कठोर दमन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता जनता से भयभीत है। बांग्लादेश और पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं  कमजोर हो चुकी हैं,चुनाव,न्यायपालिका और मीडिया पर राजनीतिक दबाव बढ़ा है। अल्पसंख्यकों और असहमत आवाज़ों के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार सिकुड़ रहे हैं।

सीरिया और म्यांमार जैसे देशों में तो राज्य स्वयं हिंसा का औज़ार बन चुका है। सीरिया में वर्षों का गृहयुद्ध नागरिक अधिकारों को राख में बदल चुका है,जबकि म्यांमार में सेना ने लोकतांत्रिक जनादेश को कुचलकर भय और आतंक का शासन स्थापित कर दिया है। चीन में आर्थिक विकास के साथ-साथ निगरानी तंत्र इतना मजबूत हुआ है कि निजता लगभग समाप्त हो चुकी है। सोशल क्रेडिट सिस्टम और डिजिटल निगरानी ने नागरिक को स्वतंत्र व्यक्ति से नियंत्रित इकाई में बदल दिया है। तुर्की में सत्ता के केंद्रीकरण ने न्यायपालिका और मीडिया की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह संकट केवल विकासशील या तानाशाही देशों तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित लोकतंत्रों में भी नागरिक अधिकारों पर दबाव बढ़ रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा,आतंकवाद,अवैध प्रवासन और डिजिटल नियंत्रण के नाम पर निगरानी कानून सख्त किए जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शन,अभिव्यक्ति की आज़ादी और निजी डेटा की सुरक्षा अब गंभीर बहस का विषय बन चुके हैं। पश्चिमी समाजों में भी लोकतंत्र बनाम सुरक्षा की बहस में अक्सर लोकतंत्र पीछे छूटता दिख रहा है। यूरोप को लंबे समय तक लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रताओं का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन आज कई देशों में तानाशाही प्रवृत्तियां स्पष्ट दिखने लगी हैं। हंगरी में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण,मीडिया और न्यायपालिका पर सरकारी नियंत्रण लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर रहा है। पोलैंड में भी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठे हैं। कुछ देशों में आप्रवासन और राष्ट्रवाद के नाम पर असहमति को दबाया जा रहा है। आपातकालीन कानूनों और निगरानी तंत्र के विस्तार ने नागरिक अधिकारों को सीमित किया है।

इस वैश्विक परिदृश्य में एक समान प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है,सत्ता का केंद्रीकरण और जनता का हाशिये पर जाना। तकनीक,भय और राष्ट्रवाद का गठजोड़ सरकारों को अधिक शक्तिशाली और नागरिकों को अधिक असहाय बना रहा है। लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित होता जा रहा है,जबकि बोलने, लिखने,असहमति जताने और सम्मान से जीने के अधिकार धीरे-धीरे क्षीण हो रहे हैं। यही वह स्थिति है जिसे दुनिया का सिमटना कहा जा सकता है और यहीं पर उम्मीदें जगाती है भारत की गणतान्त्रिक व्यवस्था।

भारत अलहदा है और इसकी यात्रा भी शानदार है। हालांकि खुले दिल से यह स्वीकार करना पड़ेगा की भारत पूर्णतः आदर्श गणतंत्र नहीं है। यहां भी संस्थाओं पर दबाव है,ध्रुवीकरण है,सत्ता का आकर्षण बढ़ा है और असहिष्णुता के संकेत भी दिखाई देते हैं। परंतु इन सबके बीच जो बात भारत को विशिष्ट बनाती है,वह यह है कि यहां लोकतांत्रिक संघर्ष की गुंजाइश हर दौर में बनी रही है। यहां अदालतों में सवाल उठाए जाते हैं,सड़कों पर विरोध होते हैं,सत्ता बदलती है और विचार पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किए जा सके हैं। भारत का खुलापन केवल राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी दिखाई देता है। विविधताओं से भरे इस देश में भाषा,धर्म,विचार और पहचान के असंख्य रूप हैं। दुनिया के कई हिस्सों में विविधता को खतरा माना जाने लगा है,जबकि भारत की मूल संरचना ही विविधता पर टिकी है। यही कारण है कि यहां टकराव के बावजूद संवाद की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती।

गणतंत्र का अर्थ केवल मतदान का अधिकार नहीं होता,बल्कि यह विश्वास भी होता है कि नागरिक सत्ता से बड़ा है। भारत में यह विश्वास कई बार कमजोर जरूर पड़ा है,पर टूटा कभी नहीं है। आपातकाल,चिपकों आंदोलन,अन्ना आंदोलन,किसान आंदोलन,नागरिक अधिकारों की लड़ाईयां, सामाजिक न्याय के लिए उठती आवाज़ें और स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रयास इस बात के प्रमाण हैं कि भारत कभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। यह खुलापन कभी-कभी असुविधाजनक लगता है,सत्ता को चुनौती देता है,पर गणतंत्र की असली पहचान यही है। दुनिया के कई देशों में मीडिया या तो नियंत्रित है या भयभीत। भारत में भी मीडिया की स्थिति आदर्श नहीं कही जा सकती,लेकिन फिर भी वैकल्पिक आवाज़ें,डिजिटल मंच और स्वतंत्र प्रयास मौजूद हैं। यही स्थिति उन देशों की तुलना में बड़ी उपलब्धि है,जहां हर खिड़की पहले ही बंद कर दी गई है।

हालांकि यह मान लेना कि भारत का गणतंत्र स्वतः सुरक्षित है,सबसे बड़ी भूल होगी। इतिहास गवाह है कि कोई भी लोकतंत्र अचानक नहीं मरता,वह धीरे-धीरे भीतर से खोखला होता है। स्वतंत्रताओं का सीमित होना,संस्थाओं की स्वायत्तता का कम होना और नागरिकों की उदासीनता जैसे तत्व मिलकर गणतंत्र को कमजोर करते हैं। यदि नागरिक खुला होने को स्थायी मानकर निश्चिंत हो जाएं  तो यही खुलापन सबसे पहले खतरे में पड़ता है। इसलिए जब दुनिया सिमट रही है,भारत अभी खुला है। यह कोई आत्मसंतोष का नारा नहीं,बल्कि एक चेतावनी भी है। यह याद दिलाता है कि भारत का खुला होना कोई प्राकृतिक अवस्था नहीं,बल्कि संघर्षों,आंदोलनों और संवैधानिक मूल्यों की देन है। यदि इन मूल्यों की रक्षा नहीं की गई, तो भारत भी उसी राह पर जा सकता है,जहां आज कई देश खड़े हैं।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका संविधान है और उससे भी बड़ी ताकत वे नागरिक हैं जो उस संविधान को केवल किताब नहीं,बल्कि जीवन का आधार मानते हैं। जब नागरिक सवाल पूछते हैं,अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं और सत्ता को जवाबदेह बनाते हैं,तभी देश खुला रहता है। जिस दिन डर,चुप्पी और सुविधा विवेक पर भारी पड़ जाएंगे, उसी दिन यह खुलापन सिमटना शुरू हो जाएगा। दुनिया के बड़े हिस्से में लोकतंत्र पीछे हट रहा है और सत्ता कठोर हो रही है। ऐसे समय में भारत का गणतांत्रिक बने रहना एक ऐतिहासिक अवसर भी है और बड़ी जिम्मेदारी भी। भारत आज खुला है,पर उसे खुला रखना हमारी साझा जिम्मेदारी है।

Leave feedback about this

  • Quality
  • Price
  • Service

PROS

+
Add Field

CONS

+
Add Field
Choose Image
Choose Video