सुबह सवेरे
प्रत्येक राष्ट्र का यह मौलिक अधिकार है की वह अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपने भौगोलिक वातावरण,प्राकृतिक संसाधनों,वन,जल,खनिज,मानव संसाधन और कृषि का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करें। आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे और उचित दामों पर वस्तुओं की उपलब्धता से आम जनता को खुशहाल करें। महात्मा गांधी के लिए हर गांव एक राष्ट्र था। वे गांवों को अधिकार सम्पन्न बनाकर ग्रामीण लोगों के हाथों में वहां के विकास की डोर सौंपना चाहते थे जिसमें सभी वर्ग और जातियों के लोग मिलाकर पूरे अधिकार से अपने भाग्य का फैसला कर सके। बापू के लिए स्वदेशी से तात्पर्य अपनी ताकत पर निर्भर रहना था। 28 जुलाई 1946 को एक साक्षात्कार में महात्मा गांधी ने कहा था,प्रत्येक गांव पूर्ण शक्तिवाला गणतन्त्र या पंचायत होगा। इसलिए प्रत्येक गांव को आत्मनिर्भर और अपना काम खुद सम्भालने में सक्षम होना पड़ेगा।
ट्रम्प अपने पहले कार्यकाल में 2020 में जब भारत आएं थे तो उन्होंने राजघाट जाकर बापू को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए मलबार शाहबलूत का पौधा लगाया था। इस पौधे को शुभ और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है जो धीरे धीरे बड़ा होकर उंचाई को छू लेता है। बापू के कार्य भी धीरे धीरे परिणाम देते थे और अंततः यह बेहतरी के अवसर ढूंढ लाते थे। डोनाल्ड ट्रंप ने अतिथि पुस्तिका में लिखा था,अमेरिका की चाहत है कि भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरे। काश,ट्रम्प भारत की समृद्धि को भारत के किसानों की दृष्टि से देख पाते तो बेहतर हो सकता था।
दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के मूल विचार से बहुत दूर नजर आती है। इसका प्रमुख कारण भारत की बड़ी आबादी का कृषि पर निर्भरता रहा है जो व्यवसाय से कहीं ज्यादा करोड़ों लोगों के जीवन जीने का साधन है। अमेरिका में वाणिज्यिक कृषि होती है जबकि भारत निर्वाहन खेती पर निर्भर है। यह लाखों भारतीयों की आजीविका है जबकि अमेरिका में कृषि वैसा ही व्यवसाय है जैसा अन्य व्यवसाय। भारत में नब्बे फीसदी जोत के मालिक छोटे किसानों के पास निवेश की क्षमता नहीं है और निजी क्षेत्र को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। भारत में किसानों का आत्मविश्वास बनाएं रखने के लिए उनसे सस्ती दरों में अनाज खरीदने सरकारी योजनाओं के तहत किया जाता है,किसानों को सस्ती बिजली दी जाती है और उन पर दबाव न बढ़े,इस कारण बिजली बिल कभी कभी माफ़ भी कर दिए जाते है। अमेरिका का किसान चुनावों में फंडिग करता है,वह इतना समृद्ध है की एक दबाव समूह की तरह वह काम करता है ।
ट्रम्प राजघाट जाकर,पौधा लगाकर दुनिया के सबसे बड़े देश लोकतांत्रिक देश के किसानों की समृद्धि को लेकर कोई योजना प्रस्तुत करते तो दोनों देशों के बीच विश्वास भी बढ़ता और व्यापार बढ़ने के अवसर भी बढ़ते। लेकिन ट्रम्प की नजर भारत की कृषि पर है। वे भारत के छोटे किसानों के बराबर अमेरिका के किसानों को सुविधा देने की सौदेबाज़ी करना चाहते है,जो न तो नीतिगत तरीके से संभव है और न ही ऐसी किसी योजना पर सरकार अमेरिका के साथ सहयोग करने के बारे में सोच सकती है। ट्रम्प गांधी की उस ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चोट करना चाहते है जो भारत की सशक्तिकरण और बेहतरी का कारण है। ट्रम्प की दृष्टि में भारत का कृषि बाजार एक विशाल व्यापारिक अवसर है,एक ऐसा क्षेत्र जहां अमेरिकी बीज, कीटनाशक, कृषि मशीनरी और खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां अपने उत्पाद बेच सकती हैं और स्थानीय किसानों को अपने मॉडल में बांध सकती हैं। गांधीजी का स्वराज का सपना आत्मनिर्भर किसान था,लेकिन ट्रम्प की व्यापारिक दृष्टि भारत के गरीब और दो जून की रोटी अपने खेतों में तलाशने वाले किसान को विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर बनाने पर है।
भारत का समग्र विकास बिना ग्रामीण विकास के संभव नहीं है। यह ग्रामीण विकास तभी प्राप्त किया जा सकता है,जब गांधी के ग्राम स्वराज को अपनाया जाएं। गांधीजी की कल्पना का ग्राम स्वराज मानव केंद्रित है,जबकि पश्चिमी अर्थव्यवस्था धन केंद्रित है। विश्व के अधिकांश राजनीतिज्ञ ऊपर से नीचे की ओर योजनाओं को चलाकर विश्व शांति की आकांक्षा की बात करते है,जबकि महात्मा गांधी की सारी योजनाएं नीचे से ऊपर की दिशा में काम करती है। इसलिए उन्होंने कहा था कि स्वतंत्रता नीचे से आरंभ होनी चाहिए। बापू भारत की महानता और सशक्तिकरण को गांवों की मजबूती में देखते थे। जिन्हें अंग्रेजों ने नष्ट करने के कई कोशिशें की थी।
हमारे गांव 1857 के पहले तक नमक,मेवा जैसी चीजों को छोड़कर पूरी तरह आत्मनिर्भर थे और हम कपड़ा,शौरा,अफीम,खांड,मसालें जैसी न जाने कितनी चीजें बाहर भेजते थे। 1836 में ब्रिटिश गवर्नर ने एक अख़बार में लिखा कि भारत का प्रत्येक गांव अपने आप में एक गणतन्त्र है। यह अपनी न्यूनतम जरूरतों के लिए किसी अन्य गांव,यहां तक की पड़ोस पर भी निर्भर नहीं है। एक गांव की मूलतः तीन जरूरतें है,रोटी,कपड़ा और मकान। एक गांव अपने भोजन के लिए अनाज उगा सकता है,रहने के लिए घर बना सकता है,और कपड़े के लिए कपास उगा सकता है। इस प्रकार हर गांव अपने आप में आर्थिक स्वावलम्बी होता है। हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा पोषित आधुनिक सभ्यता की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने अपनी भारत भ्रमण के दौरान यह पाया की किस प्रकार ब्रिटिश आधिपत्य ने भारत के लघु और कुटीर उद्योगों को समाप्त कर दिया है। ट्रम्प भी ब्रिटिश आधिपत्य की राह पर चलते है अपने अपने टैरिफ के दबाव का इस्तेमाल कर रहे है। भारत अपने मेहनतकश किसानों को किसी भी मुक्त व्यापार समझौते से दूर ही रखता है क्योंकि इसे हमारे भोले भाले किसान फंस सकते है और यह हमारी अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है,अंततः कृषि देश की आधी से ज्यादा बढ़ी आबादी की जीविका का आधार है। भारत अपने कृषि क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों से बचाने के लिए वहां से होने वाले कृषि उत्पादों के आयात पर बड़ा टैरिफ लगाता है। अंग्रेजों को भारत की ताकत गांवों में नजर आती थी इसलिए उन्होंने छोटे उद्योग धंधों को नष्ट करके भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चोट करने की कोशिश की थी और बापू आम हिन्दुस्तानी को ग्राम स्वराज की ताकत का एहसास कराने और विश्वास बढ़ाने हजारों किलोमीटर पैदल चलते रहे,उतना जितने में वे दो बार पूरी दुनिया घूम सकते थे।
गांवों को लेकर बापू की स्पष्ट दृष्टि थी की इसकी सम्पन्नता और खुशहाली ही भारत की सभी समस्याओं का इलाज है। वे भारत के कोने कोने में गए और उन्होंने यह पाया की भारत की बहु आबादी ग्रामीण है और उसमें मेहनत और स्वावलम्बन कूट कूट कर भरा है। बापू का सेवाग्राम में रहने का इरादा और संदेश साफ था की शहर के लोगों को ग्रामीण जन से आत्मनिर्भरता,कृषि और पर्यावरण संरक्षण सीखना चाहिए। गांव की सादगी और यहां रहने वाले लोगों की कार्य कुशलता से भारत का स्वर्णिम गौरव पुनः लौट सकता है। 8 अगस्त, 2025 को भारत ने भारत छोड़ो आंदोलन के 83 बरस पूरे कर लिए है। इन वर्षों में भारत ने नित नए आयाम स्थापित किए है और संकल्पित होकर देश निरंतर प्रगति के पथ पर है। करीब दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों की आर्थिक और राजनीतिक गुलामी के कुचक्र से भारतीय जूझते रहे लेकिन उन्होंने अपनी घर की अर्थव्यवस्था को संतुलित रखा । भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और यहीं कृषि अर्थव्यवस्था भी है। यह इसलिए टूट नहीं सकी क्योंकि ग्राम स्वराज भारत के तंत्र के मूल में है और यही ग्राम विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता रहा है । भारत आज़ाद हुआ तो देश की योजनाओं और परियोजनाओं में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दिया और इसे लेकर सभी लोकतान्त्रिक सरकारें गंभीर रही,उन्होंने बापू के ग्राम स्वराज्य के मार्ग को कभी नहीं छोड़ा। ट्रम्प भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चोट करके दोस्त बने रहने चाहते है,यह मुमकिन नहीं है। भारत छोड़ो आंदोलन से अंग्रेज देश से भागने का मजबूर कर दिए गये थे,ट्रम्प की भारत से एक बार फिर ऐसी ही बिदाई तय है। कर्ज से डूबे ब्रिटेन को पुन: खड़ा होने के लिए भारत से मुक्त बाज़ार समझौता करने को मजबूर होना पड़ा। भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार है और रणनीतिक रूप से भी बेहद खास है। ट्रम्प भारत की क्षमता और सामर्थ्य को बखूबी जानते है। अंग्रेजी सरकार के गहरें दबाव के बाद भी भारत छोड़ो आंदोलन तब तक समाप्त नहीं हुआ जब तक अंग्रेज देश छोड़कर जाने को मजबूर नहीं कर दिए गए। अब भारत आज़ाद है और अपने भाग्य का निर्माता खुद है । जाहिर है इस बार भी एक और अंग्रेज ट्रम्प भी भारत से बिदाई तय है।
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गांधी है तो भारत है
ट्रम्प की भारत से बिदाई तय है
- by brahmadeep alune
- August 8, 2025
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