सुबह सवेरे
बापू बहुत आसान थे लिहाजा उनका जीवन भी बहुत आसान हो गया था। वे स्वयं की बुनी हुई खादी की साधारण धोती और साधारण चप्पल पहनते थे। सर्दियों में वे साधारण ऊनी शॉल का उपयोग करते थे,उनका भोजन फल,मूंगफली और बकरी का दूध था। लंदन में एक पत्रकार ने पूछा,आप इतने बड़े नेता होकर केवल एक धोती क्यों पहनते हैं? बापू बोले,मुझे तो पूरी दुनिया को ढकने की चिंता है,अपने शरीर को नहीं। असल में बापू ने अपने वस्त्रों को भारत की जनता के साथ एकरूपता के रूप में चुना। वे कहते थे कि जब तक भारत का गरीब किसान या मजदूर आधा नंगा है,तब तक मुझे भी अधिक कपड़े पहनने का कोई अधिकार नहीं। एक बार ट्रेन से सफर के दौरान बापू की एक चप्पल गिर गई। उन्होंने दूसरी भी उतारकर वहीं फेंक दी। जिससे किसी गरीब को दोनों चप्पलें मिल जाएँगी। बापू हमेशा तीसरे दर्जे में सफर करते। वे कहते थे कि मैं वही वर्ग चुनता हूँ जिसमें भारत के सबसे ज़्यादा लोग सफर करते हैं। भोजन को लेकर भी उनका साफ दृष्टिकोण था कि जिस देश में करोड़ों लोग भूखे हैं,वहां मुझे अधिक खाने का कोई अधिकार नहीं। धोती पहनना उनके लिए गरीब और मजदूरों के प्रति सम्मान और स्वदेशी का प्रचार था। आज़ादी के राजनीतिक आंदोलन के प्रणेता होकर भी बापू सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। वे रावण से बड़ा राक्षस अस्पृश्यता को मानते थे,बापू के तमाम प्रयासों के बाद भी भारतीय समाज से इस राक्षस का अंत नहीं हो पाया।
हिंद स्वराज में, महात्मा गांधी ने लिखा कि अगर स्वतंत्रता के साथ सामाजिक प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव नहीं आया तो यह निरर्थक होगी। बापू खुले तौर पर अंतर्जातीय भोज और अंतर्जातीय विवाह का समर्थन करते थे।बापू के लिए अंतर्जातीय भोज और विवाह केवल व्यक्तिगत विकल्प नहीं थे,बल्कि वे इन्हें सामाजिक सुधार का सबसे व्यावहारिक और साहसी साधन मानते थे। बापू के विचार में जब तक लोग एक-दूसरे के साथ बैठकर रोटी नहीं खाएँगे और पारिवारिक रिश्तों में जुड़ाव नहीं होगा,तब तक जाति-भेद केवल नारेबाज़ी से समाप्त नहीं होगा।
आज की स्थिति देखें तो राजनीतिक दल और नेता इस दिशा में सक्रिय पहल करने से बचते हैं। इसका कारण स्पष्ट है कि जातिगत समीकरण उनके वोट बैंक की राजनीति की रीढ़ हैं। यदि वे खुलकर अंतर्जातीय विवाह या भोज का समर्थन करेंगे तो उन्हें परंपरागत समर्थकों की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है। दूसरी ओर, समाज में भी अभी तक उतना सामूहिक साहस विकसित नहीं हो पाया है कि लोग इन प्रथाओं को सामान्य रूप से स्वीकार कर लें। व्यक्तिगत स्तर पर तो कई लोग आगे आ रहे हैं, लेकिन सामूहिक अभियान की कमी है। यही अंतर गांधी के समय और आज के समय को अलग करता है। बापू ने सामाजिक साहस को राजनीति से ऊपर रखा,जबकि आज राजनीति ही सामाजिक साहस को दबा देती है।
बापू ने जीवनभर जातिवाद और अस्पृश्यता को भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराई माना। उनके लिए मंदिर-प्रवेश,अंतर्जातीय भोज और विवाह केवल प्रतीकात्मक सुधार नहीं थेबल्कि सामाजिक क्रांति के व्यावहारिक साधन थे।इसी दृष्टि से 1946 में उन्होंने घोषणा की किसेवाग्राम आश्रम में विवाह केवल उन्हीं जोड़ों का होगा,जिनमें से एक अस्पृश्य कहे जाने वाले समुदाय सेहो।बापू का उद्देश्यजातिवाद पर सीधा प्रहार करके विवाह संबंध जातियों के बीच की दूरी खत्म करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।बापू चाहते थे कि सेवाग्राम आश्रम सिर्फ उपदेश देने की जगह न रहे, बल्कि समाज-परिवर्तन की एक जीवंत प्रयोगशाला बने।बापू का पारंपरिक हिंदू समाज के कई वर्गों ने इसका विरोध किया।यह कहा गया कि गांधी समाज की प्राकृतिक व्यवस्थाको तोड़ रहे हैं।यह नियम प्रतीकात्मक रूप से बहुत शक्तिशाली था,क्योंकि गांधी जैसी राष्ट्रीय और नैतिक प्राधिकार वाली शख्सियत ने इसे लागू कियाथा।इसने समाज में यह संदेश दिया कि समानता केवल उपदेश से नहीं,बल्कि व्यक्तिगत जीवन और रिश्तों में उतरनी चाहिए।बापू का यह निर्णय उस दौर में अत्यंत साहसिक था। स्वतंत्रता की लड़ाई के बीच भी उन्होंने जातिवाद को उतना ही बड़ा शत्रु माना जितना विदेशी शासन को।उनकी यह सोच आज भी प्रासंगिक है,क्योंकि सामाजिक असमानता केवल राजनीतिक आज़ादी से नहीं मिटतीबल्कि रोज़मर्रा के रिश्तों और व्यवहारों में समानता स्थापित करने से मिटती है।
बापू न केवल अपने बेटे रामदास को एक अलग जाति से विवाह करने की अनुमति दी,बल्कि अपने दूसरे बेटे देवदास ने भी ऐसा ही किया। बापू ने अपनी दत्तक पुत्री लक्ष्मी,जो एक ‘अछूत’ थी,का विवाह भी एक ब्राह्मण लड़के से किया। इसके अलावा, बापू ने अपनी जाति के लिए निषिद्ध कई कार्यों में महारत हासिल करने की कोशिश की। उन्होंने खुद मेहतर,नाई,धोबी,मोचीऔर दर्जी के रूप में काम किया। तत्कालीन समाज की दृष्टि में ये सभी अशुद्धकाम थे। उन्होंने अपने परिवार को जूते बनाने,चमड़े का काम करने,शौचालय साफ करने जैसे कामों में लगाकर जाति आधारित काम की वर्जनाओं को तोड़ने के लिए भी मजबूर किया।बापू अपने आश्रम में बदलाव लाने में कामयाब रहे लेकिन आज़ाद भारत का संविधान उन बदलावों को लाने की अब भी बांट जोह रहा है।सुप्रीम कोर्ट ने बीते वर्ष अक्टूबर को एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था।इस फ़ैसले में राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को जेल के अंदर व्याप्त जातिगत भेदभाव ख़त्म करने का निर्देश दिया गया। दरअसल संविधान में समानता को मौलिक अधिकार बनाने के बाद भी जेल में जाति आधारित कार्य व्यवस्था को व्यवस्थागत तौर पर लागू करने की चेष्टा देखी गई।
एक उन्नीस बीस वर्ष का बिहार का रहने वाला युवक काम करने के लिए राजस्थान चला गया था।वह आईटीआई से डिप्लोमा कर चुका था। जेल जाने से पहले वह एक इलेक्ट्रीशियन के तौर पर काम कर रहा था।वह एक छोटी वर्कशॉप में काम कर रहा था,वहां चोरी की एक घटना हुई थी।उस युवक को हिरासत में ले लिया गया और गिरफ़्तार कर लिया गया।जेल में प्रवेश करते ही क़ैदी से उसकी जाति पूछी जाती है।इस युवक से भी उसकी जाति पूछी गई और उसने बता दी।उसने बताया कि वह अनुसूचित जाति में आता है,जिसके बाद उसे सफ़ाई का काम दिया गया।शुरुआत में उसे एहसास नहीं हुआ कि उसे उसकी जाति के कारण नौकरी दी गई थी।उसने बताया कि उसे लगा कि यह वही सज़ा होगी जो नए क़ैदियों को दी जाती है।लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि वह जो काम कर रहा था और जो लोग उसके साथ सफ़ाई कर रहे थेवे भी अनुसूचित जाति से थे।एक दिन जेल में सेप्टिक टैंक टूट गया।फिर उसे शौचालय का सेप्टिक टैंक साफ़ करने को कहा गया।युवक ने पहले कभी ऐसा नहीं किया था।जेल जाने से पहले वह इलेक्ट्रीशियन का काम करता था इसलिए उसे यह भी नहीं पता था कि उस टैंक में क्या करना है।वह ऐसा काम दिए जाने से सदमे में था।महाराष्ट्र,उत्तर प्रदेश,बिहार,पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्य जिनमें दलितों की एक बड़ी आबादी है।इन राज्यों में भी दलितों के अंतिम संस्कार रोक दिए जाने के मामले सामने आते रहते हैं।देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उनकी पत्नी 18 मार्च 2018 को जगन्नाथ मंदिर गए थे। जहां उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया था। इस मामले में राष्ट्रपति भवन के द्वारा असंतोष जाहिर करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
आज़ादी के आठवें दशक का जश्न मना रहे भारत के पास अब बापू जैसा कोई नेता नहीं है जो राजनीतिक नेतृत्व करके अपने आचरण और व्यवहार से सामाजिक क्रांति और बदलावों का अग्रदूत बने और जिसमें परम्परावादी समाज को चुनौती देना का व्यापक साहस हो। लिहाजा समाज का वंचित वर्ग सामाजिक न्याय को अदालतों से प्राप्त करना चाहता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का मानना था कि केवल ब्रिटिश शासन से आज़ादी पर्याप्त नहीं है। जब तक समाज में जातिगत भेदभाव,असमानता और छुआछूत जैसी बुराइयां बनी रहेंगी,तब तक आमजन के लिए आज़ादी का कोई वास्तविक अर्थ नहीं होगा। उन्होंने साफ़ कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है यदि सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं मिलती। इसीलिए वे संविधान सभा में भी लगातार चेताते रहे कि अगर सामाजिक लोकतंत्र स्थापित नहीं हुआ तो राजनीतिक लोकतंत्र भी टिक नहीं पाएगा।आंबेडकर ने यह भी कहा था कि जो दिशा पसंद है उस ओर जाइये लेकिन जाति दैत्य है जो हर जगह आपके आड़े आते रहेगी।हमारे देश में क़ानून तो बहुत हैं लेकिन समस्या सामाजिक मूल्यों की है। देश में अब भी दलितों और आदिवासियों को गैर बराबरी का सामना करते हुए कई समस्याओं से जूझना पड़ता है जबकि समाज का कथित प्रभावी तबका वंचितों को मनुष्यों का और बराबरी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं हैं।इसमें परिवर्तन हो रहा है लेकिन वो बहुत धीमा है। बापू अस्पृश्यता को समाज का राक्षस कहते थे। उन्होंने कई बार कहा था कि अगर भारत जातिवाद से मुक्त नहीं हुआ तो राजनीतिक आज़ादी अधूरी रहेगी।
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गांधी है तो भारत है
इस रावण से तो बापू भी हार गए…!
- by brahmadeep alune
- October 2, 2025
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