विदेश नीति को विवेकानन्द की पब्लिक डिप्लोमेसी से सीखने की जरूरत
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विदेश नीति को विवेकानन्द की पब्लिक डिप्लोमेसी से सीखने की जरूरत

सुबह सवेरे

स्वामी विवेकानन्द ने बहुत पहले यह समझ लिया था कि देशों के बीच संबंध केवल सरकारों से नहीं बल्कि जनता से जनता के बीच बनते हैं। यही पब्लिक टू पब्लिक डिप्लोमेसी का मूल भाव है। 1893 में शिकागो के विश्व धर्म संसद में उनका ऐतिहासिक संबोधन किसी राजनयिक मिशन का हिस्सा नहीं था,फिर भी उसने भारत की छवि को पश्चिमी दुनिया में गहराई से बदल दिया। उनके विचारों ने सीधे अमेरिकी और यूरोपीय जनता के हृदय को छुआ। यह जन-जन के स्तर पर भारत की आत्मा से परिचय था।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि मैं चाहता हूं कि हमारे ढेर सारे युवा हर वर्ष जापान और चीन की यात्रा करें। स्वामी विवेकानन्द का यह कथन केवल यात्रा की इच्छा नहीं था, बल्कि भारत के भविष्य की एक गहरी रणनीतिक दृष्टि थी। उन्नीसवीं सदी के अंत में,जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, विवेकानन्द एशिया की उन सभ्यताओं की ओर भारत का ध्यान आकर्षित कर रहे थे जिन्होंने पश्चिमी औपनिवेशिक वर्चस्व के बावजूद अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखते हुए आधुनिकता को अपनाया। उनके लिए जापान और चीन, भारत के लिए दर्पण की तरह थे। यह दिखाने के लिए कि एक प्राचीन सभ्यता भी आधुनिक,शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बन सकती है। जापान ने मेइजी सुधारों के बाद अपने शिक्षा तंत्र,उद्योग, सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय अनुशासन को आधुनिक बनाया, पर अपनी सांस्कृतिक पहचान नहीं छोड़ी। विवेकानन्द को यह बात गहराई से प्रभावित करती थी कि जापानी समाज ने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाया,पर अपने राष्ट्रबोध और आत्मसम्मान को कमजोर नहीं होने दिया। इसी प्रकार चीन,यद्यपि उस समय राजनीतिक रूप से कमजोर था,फिर भी उसकी सभ्यतागत निरंतरता, सामाजिक अनुशासन और दार्शनिक परंपरा विवेकानन्द को भारत से गहराई से जोड़ती थी।

विवेकानन्द चाहते थे कि भारतीय युवा इन देशों की यात्रा करके प्रत्यक्ष अनुभव करें कि कैसे राष्ट्र खड़े होते हैं,कैसे समाज अनुशासन,शिक्षा और श्रम से शक्ति प्राप्त करता है और कैसे आत्मसम्मान किसी भी देश की असली पूंजी होता है। यह विचार आज के शब्दों में पब्लिक टू पब्लिक डिप्लोमेसी का प्रारूप था,जहां  सरकार नहीं,बल्कि युवा और समाज एक-दूसरे से सीखकर रिश्ते बनाते हैं। वर्तमान भारत के लिए यह दृष्टि और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आज भारत चीन और जापान दोनों से आर्थिक,तकनीकी और रणनीतिक रूप से गहराई से जुड़ा है। चीन दुनिया की फैक्ट्री बन चुका है,जबकि जापान तकनीक,नवाचार और कार्य संस्कृति का प्रतीक है। यदि भारतीय युवा इन समाजों की कार्य-निष्ठा, नवाचार की संस्कृति और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को समझें,तो भारत की मेक इन इंडिया,स्टार्टअप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलें कहीं अधिक प्रभावी हो सकती हैं। इसके साथ ही,एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में,भारत को केवल सैन्य या कूटनीतिक स्तर पर नहीं,बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी अपनी उपस्थिति मजबूत करनी होगी। विवेकानन्द की सोच यही थी कि सभ्यताएं तब मजबूत होती हैं जब उनके लोग एक-दूसरे को समझते हैं,सम्मान करते हैं और साझा भविष्य की कल्पना करते हैं। आज जब भारत वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करना चाहता है और एशिया में अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित कर रहा है,तब विवेकानन्द का यह आह्वान हमें याद दिलाता है कि भारत की असली शक्ति उसके युवा हैं। यदि ये युवा एशिया की महान सभ्यताओं से सीखकर भारत लौटें,तो भारत केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत शक्ति के रूप में भी विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है। यही विवेकानन्द का सपना था की एक जागृत एशिया और एक आत्मविश्वासी भारत।

भारत की वर्तमान विदेश नीति सरकार-से-सरकार पर तो सशक्त दिखती है, लेकिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम पब्लिक टू पब्लिक डिप्लोमेसी लगातार उपेक्षित होता जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि भारत के पड़ोसी देशों में, चाहे वह नेपाल हो,बांग्लादेश,श्रीलंका या मालदीव,सरकारें बदलते ही जनता के मन में भारत के प्रति भावनाएं भी बदल जाती हैं। यह कूटनीति की सबसे बड़ी कमजोरी है। स्वामी विवेकानन्द ने एक सदी पहले यह समझ लिया था कि किसी देश की स्थायी शक्ति उसकी सेनाओं या संधियों में नहीं, बल्कि जनता से जनता के रिश्तों में होती है। जब वे कहते थे कि भारतीय युवाओं को जापान और चीन जाना चाहिए, तो उनका आशय केवल सीखने से नहीं, बल्कि सभ्यतागत सेतु बनाने से था। उनका विश्वास था कि सभ्यताएं तभी सुरक्षित रहती हैं जब उनके लोग एक-दूसरे को जानते,समझते और सम्मान करते हैं। आज भारत पड़ोसी देशों में राजनीतिक रूप से तो सक्रिय है,लेकिन सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर उसकी उपस्थिति कमजोर होती जा रही है। बांग्लादेश में नई पीढ़ी भारत को एक साझी सभ्यता के रूप में नहीं,बल्कि एक बाहरी शक्ति के रूप में देखने लगी है। नेपाल में राजनीतिक दल भारत-विरोधी नारों से सत्ता तक पहुंच जाते हैं क्योंकि आम जनता से भारत का भावनात्मक रिश्ता कमजोर पड़ चुका है। श्रीलंका और मालदीव में भी यही स्थिति बन रही है।

चीन ने इस कमी को बहुत पहले समझ लिया था। उसने कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट, छात्रवृत्तियां,सांस्कृतिक केंद्र,मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक अपनी पहुंच बनाई। पाकिस्तान भी मदरसों,मीडिया और धार्मिक नेटवर्क के माध्यम से जनस्तर पर अपनी विचारधारा फैलाता रहा है। भारत,जो सांस्कृतिक रूप से सबसे समृद्ध शक्ति है,इस मोर्चे पर पीछे रह गया है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भौगोलिक या सैन्य स्थिति नहीं, बल्कि उसकी सभ्यतागत और सांस्कृतिक निरंतरता है। दक्षिण एशिया के देश,नेपाल,बांग्लादेश,श्रीलंका,भूटान और यहां तक कि मालदीव,भारत से ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से गहराई से जुड़े हुए हैं। रामायण, महाभारत, बुद्ध और भक्ति परंपरा इन देशों की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। नेपाल में पशुपतिनाथ,श्रीलंका में बौद्ध विरासत,बांग्लादेश में बंगाली संस्कृति और भूटान में वज्रयान परंपरा भारत की ही सभ्यतागत धारा से निकले स्रोत हैं। इसके विपरीत चीन का प्रभाव इन देशों में सांस्कृतिक नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक है । चीन बंदरगाह बनाता है,ऋण देता है और बुनियादी ढांचे खड़े करता है, लेकिन वह इन समाजों की आत्मा से नहीं जुड़ता। भारत की भाषा, संगीत,सिनेमा,तीर्थ,खान-पान और पारिवारिक मूल्य दक्षिण एशिया की जनता के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। यही कारण है कि भारत,यदि सही ढंग से पब्लिक टू पब्लिक डिप्लोमेसी को अपनाएं तो दक्षिण एशिया में चीन से कहीं अधिक गहरा और टिकाऊ प्रभाव बना सकता है। विवेकानन्द की दृष्टि यही थी,सभ्यताएं हथियारों से नहीं हृदयों से जुड़ती हैं।

विवेकानन्द हमें यह सिखाते हैं कि भारत की शक्ति उसकी आत्मा में है,योग, वेदान्त,लोक-परम्पराएं,भक्ति-संगीत,भाषा और साझा इतिहास। यदि भारत पड़ोसी देशों के युवाओं को भारत की शिक्षा व्यवस्था,आध्यात्मिक परंपरा,कला और समाज से जोड़ता,तो भारत-विरोधी राजनीति इतनी आसानी से पनप नहीं सकती थी। आज की डिजिटल दुनिया में पब्लिक टू पब्लिक डिप्लोमेसी और भी महत्वपूर्ण हो गई है। छात्र विनिमय,तीर्थ-पर्यटन,सांस्कृतिक महोत्सव,मीडिया सहयोग और युवाओं के संवाद मंच भारत की कूटनीति के अग्रिम मोर्चे बन सकते हैं। विवेकानन्द का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है की
राज्य नहीं, जनता रिश्ते बनाती है।


यदि भारत इस सत्य को नहीं स्वीकार करता है तो उसकी राजनीतिक जीतें भी खोखली सिद्ध होंगी। भारत को अपनी विदेश नीति में सरकारों के साथ-साथ जनता से जनता के रिश्तों को केंद्र में लाना होगा। यदि भारत पड़ोसी देशों के युवाओं,छात्रों और समाज के साथ सीधे संवाद और सांस्कृतिक जुड़ाव  बढ़ाएं तो भारत विरोधी भावनाओं की जमीन स्वतः कमजोर होगी। स्वामी विवेकानन्द की यही मूल सीख थी कि सभ्यताएं दिलों से जुड़कर मजबूत होती हैं। आज उनकी यह दृष्टि भारत की सॉफ्ट पावर को पुनर्जीवित कर सकती है। वर्तमान समय में यह अब केवल एक कूटनीतिक विकल्प नहीं,बल्कि भारत की रणनीतिक मजबूरी भी बन चूकी है।

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