नवभारत
इतिहास गवाह है कि तानाशाहों को जनता कभी माफ़ नहीं करती। तानाशाही भय,दमन,हिंसा और जनता का उत्पीड़न करके खुद को सुरक्षित बनाने की कोशिश करती रहती।ईरान की धार्मिक तानाशाही इस लिहाज़ से और भी खतरनाक रही है,क्योंकि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई ने सत्ता को ईश्वर और धर्म के नाम पर वैध ठहराने की लगातार कोशिश की है। पश्चिम एशिया के इस शिया बाहुल्य देश में असहमति को धर्मविरोध बताकर कुचला जा रहा है,महिलाओं और युवाओं को मौत की सजा दी जारी है और जनता की पीड़ा को ताकत में बल पर अनसुना किया जा रहा है। इन सबके बीच इस सच्चाई से इंकार भी नहीं किया जा सकता की जब तानाशाही धर्म का चोला पहन लेती है,तो विरोध केवल राजनीतिक नहीं रहता,बल्कि नैतिक और मानवीय विद्रोह में बदल जाता है। ऐसे शासन का अंत देर से सही,लेकिन ज्यादा समय तक टलता नहीं है।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई इस समय गंभीर राजनीतिक,सामाजिक और रणनीतिक संकटों से घिरे हुए हैं। यह संकट केवल बाहरी दबावों का परिणाम नहीं है,बल्कि ईरान के भीतर उभर रही असंतोष की लहर ने भी उनके नेतृत्व को चुनौती दी है। महंगाई,बेरोज़गारी,मुद्रा अवमूल्यन और प्रतिबंधों से जूझती अर्थव्यवस्था से जनता बेहाल है। वहीं युवा पीढ़ी और महिलाएं धार्मिक पाबंदियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश से असंतुष्ट हैं, जिसे समय-समय पर उग्र विरोध प्रदर्शनों में देखा जा रहा है। राजनीतिक स्तर पर खामनेई के सामने उत्तराधिकार का संकट भी खड़ा है। उनकी बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य को लेकर अटकलों के बीच यह स्पष्ट नहीं है कि भविष्य में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में होगी। यह अनिश्चितता सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर भी खींचतान को जन्म दे रही है।बाहरी मोर्चे पर ईरान अमेरिका और इज़राइल के साथ टकराव,पश्चिमी प्रतिबंधों और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव से दबाव में है। हमास,हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे गुटों के कमजोर पड़ने से ईरान के प्रतिद्वंदी खुश है।इस समय खामनेई सत्ता में बने हुए हैं,पर उनकी पकड़ पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण और अस्थिर हो चुकी है।
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन हो रहे है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई की सत्ता आज जिस दौर से गुजर रही है,वह उनके पूरे शासनकाल का सबसे कठिन चरण माना जा सकता है। सबसे बड़ी चुनौती ईरान के भीतर बढ़ता जनअसंतोष है। जिस इस्लामिक क्रांति के वैचारिक आधार पर खामनेई की सत्ता टिकी रही,वही विचारधारा आज नई पीढ़ी को आकर्षित नहीं कर पा रही है। युवा वर्ग धार्मिक नियंत्रण,नैतिक पुलिस,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियों और महिलाओं के अधिकारों के दमन से नाराज़ है। महसा अमीनी की मौत के बाद उभरे जन-आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भय के सहारे व्यवस्था को लंबे समय तक नियंत्रित करना संभव नहीं है। आर्थिक संकट खामनेई की सत्ता के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है। अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है। मुद्रा का भारी अवमूल्यन,महंगाई,बेरोज़गारी और घटती क्रयशक्ति ने आम जनता के धैर्य को समाप्त कर दिया है। जब रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल हो जाए,तो वैचारिक नारे जनता को संतुष्ट नहीं कर पाते। आर्थिक विफलता ने शासन की वैधता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।तीसरा अहम संकट उत्तराधिकार का है। खामनेई जीवन के अंतिम चरण में है,स्वास्थ्य ठीक नहीं है और उनके बाद कौन सर्वोच्च नेता बनेगा,यह भी स्पष्ट नहीं है। यह अनिश्चितता सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर ही खींचतान को जन्म दे रही है। रिवोल्यूशनरी गार्ड,धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक धड़ों के बीच शक्ति-संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ रहा है। इतिहास बताता है कि अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में सत्ता परिवर्तन का यही दौर सबसे अस्थिर होता है।बाहरी मोर्चे पर भी खामनेई की मुश्किलें कम नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय अलगाव,परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव,इज़राइल और अमेरिका से टकराव तथा मध्य-पूर्व में प्रॉक्सी युद्धों की बढ़ती लागत ने ईरान को रणनीतिक दबाव में डाल दिया है। ये संघर्ष शासन को ताकतवर दिखाने का साधन तो बनते हैं,लेकिन उनकी कीमत ईरानी जनता को चुकानी पड़ती है और इससे इस देश की जनता नाराज भी है।
राजनीतिक स्तर पर खामनेई की वैचारिक पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है। इस्लामिक क्रांति के आदर्श नई पीढ़ी को प्रेरित नहीं कर पा रहे हैं। विरोध को दबाने के लिए सुरक्षा बलों और रिवोल्यूशनरी गार्ड का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन इससे शासन और जनता के बीच दूरी और बढ़ रही है। कुल मिलाकर, ईरान में खामनेई के खिलाफ उभरता विरोध शासन की स्थिरता के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुका है।ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई के लिए तुर्की,सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात आज सबसे बड़े क्षेत्रीय विरोधी माने जाते हैं। इन तीनों देशों का विरोध वैचारिक,रणनीतिक,राजनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर गहरा है।सऊदी अरब खामनेई के लिए सबसे पुराना और वैचारिक प्रतिद्वंद्वी है। ईरान की शिया क्रांतिकारी विचारधारा और सऊदी अरब की सुन्नी नेतृत्व वाली वहाबी व्यवस्था के बीच वर्चस्व की लड़ाई दशकों से जारी है। यमन,इराक,सीरिया और लेबनान जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के प्रॉक्सी संघर्ष इस टकराव को और तीखा बनाते हैं। यूएई खुलकर ईरान विरोधी रुख अपनाता रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम,खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और होरमुज़ जलडमरूमध्य पर प्रभाव को लेकर यूएई को सुरक्षा खतरा महसूस होता है। इज़राइल के साथ यूएई की नज़दीकी भी खामनेई के लिए एक रणनीतिक चुनौती है।तुर्की वैचारिक रूप से अलग होते हुए भी क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर ईरान से प्रतिस्पर्धा करता है। सीरिया,अज़रबैजान और मध्य एशिया में तुर्की और ईरान के हित टकराते हैं। तुर्की स्वयं को सुन्नी मुस्लिम दुनिया के नए नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है,जो खामनेई की महत्वाकांक्षाओं के विपरीत है।इस प्रकार तुर्की, सऊदी अरब और यूएई मिलकर ईरान और खामनेई की क्षेत्रीय शक्ति को लगातार चुनौती दे रहे हैं।
अयातुल्ला अली खामनेई की कमजोर होती सत्ता को अमेरिका और इज़राइल एक बड़े रणनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं। ईरान में बढ़ता आंतरिक असंतोष,आर्थिक संकट और नेतृत्व का वैचारिक क्षरण ऐसी परिस्थितियां बना रहे हैं,जिनसे खामनेई की सत्ता की नींव हिलती दिख रही है। अमेरिका और इज़राइल के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खामनेई का शासन ही ईरान की आक्रामक क्षेत्रीय नीति और परमाणु कार्यक्रम का मुख्य केंद्र रहा है। अमेरिका लंबे समय से ईरान पर प्रतिबंधों,कूटनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय अलगाव की नीति अपनाता रहा है। यदि खामनेई की सत्ता कमजोर या ढहती हैतो वाशिंगटन को उम्मीद है कि ईरान की नीति अधिक नरम हो सकती है और परमाणु समझौते पर नए सिरे से बातचीत का रास्ता खुलेगा। साथ ही मध्य-पूर्व में ईरान समर्थित गुटों की ताकत भी घट सकती है।खामनेई की सत्ता का ढहना अमेरिका और इजराइल के लिए क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने का बड़ा अवसर बन सकता है। ईरान में जैसे-जैसे शासन दमन की नीति को तेज़ कर रहा है,वैसे-वैसे जनता का गुस्सा अयातुल्ला अली खामनेई के खिलाफ और अधिक भड़कता जा रहा है। विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए सुरक्षा बलों,रिवोल्यूशनरी गार्ड और कड़े कानूनों का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन इसका असर उलटा पड़ रहा है। भय पैदा करने के बजाय दमन ने जनता के भीतर गहरे आक्रोश को जन्म दिया है। ईरान में अयातुल्ला अली खामनेई के प्रति बढ़ता जन-असंतोष अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उसके असर सत्ता के सबसे मजबूत स्तंभ रिवोल्यूशनरी गार्ड तक पहुंचने की आशंका बढ़ती जा रही है। अब तक खामनेई की सत्ता का सबसे बड़ा आधार यही बल रहा है,लेकिन जब जनता का व्यापक गुस्सा किसी एक नेतृत्व के खिलाफ केंद्रित हो जाता है,तो सुरक्षा संस्थानों के भीतर भी मतभेद और असमंजस पैदा होना स्वाभाविक है। अमेरिका का लगातार रणनीतिक और आर्थिक दबाव ईरान की स्थिति को और कमजोर कर रहा है। कड़े प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और क्षेत्रीय तनावों ने शासन की आर्थिक व कूटनीतिक गुंजाइश सीमित कर दी है। इससे न केवल जनता त्रस्त है, बल्कि सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर भी यह सवाल उठने लगे हैं कि टकराव की यह नीति कितने समय तक टिकाऊ है।
वर्तमान हालात यह संकेत दे रहे हैं कि ईरान एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है। जब जन-असंतोष बढ़े, सुरक्षा ढांचे में संभावित फूट की आशंका हो और बाहरी दबाव लगातार बना रहेतो सत्ता का किलामजबूत दिखते हुए भी भीतर से खोखला हो जाता है। जाहिर है खामनेई की सत्ता का किला तेजी से दरक रहा है और वह किसी भी समय ढह सकता है।







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