बांग्ला अस्मिता के सामने फिर हार गया पाकिस्तान
article

बांग्ला अस्मिता के सामने फिर हार गया पाकिस्तान

नवभारत
बांग्लादेश के आम चुनावों के परिणामों को लेकर एक बार फिर यह साफ हो गया है कि देश की जनता ने अपनी बांग्ला अस्मिता,भाषायी गौरव और मुक्ति संग्राम की विरासत को प्राथमिकता दी है। 1971 में बांग्लादेश का जन्म ही सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की रक्षा के लिए हुआ था। ऐसे में बीएनपी को व्यापक समर्थन तथा  किसी भी कट्टरपंथी या बाहरी प्रभाव की राजनीति को व्यापक जनसमर्थन न मिलना स्वाभाविक माना जा रहा है। बीएनपी बांग्ला अस्मिता की बात करती है वहीं जमात-ए-इस्लामी,ऐतिहासिक रूप से इस्लामी राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती रही है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान इसकी भूमिका को लेकर बांग्लादेश में लंबे समय तक  विवाद और न्यायिक कार्रवाइयां होती रही हैं। इसलिए चुनावों में इसकी संभावित जीत को केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं,बल्कि वैचारिक दिशा-परिवर्तन के रूप में भी देखा जा रहा था और यह समूचे दक्षिण एशिया को आशंकित कर रहा था।
बांग्लादेश के जन्म से लेकर वर्तमान तक जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक स्थिति उतार-चढ़ाव से गुजरती रही है। 1971 में पाकिस्तान का पक्ष लेने और युद्ध अपराधों के मामलों में कई शीर्ष नेताओं को सजा मिलने के बाद इसका जनाधार प्रभावित हुआ। फिर भी यह देश के कुछ हिस्सों में कट्टरपंथ विचारधारा पर आधारित संगठित कैडर-आधारित संरचना बनाए रखे हुए है। पाकिस्तान से इसके वैचारिक संबंध ऐतिहासिक रहे हैं,क्योंकि मूल संगठन वहीं सक्रिय था। हालांकि आज की राजनीति में बांग्लादेशी जमात स्वयं को राष्ट्रीय संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। इसके बावजूद 1971 की स्मृति के कारण पाकिस्तान से जुड़ाव का प्रश्न बांग्लादेश की राजनीति में संवेदनशील और विवादास्पद बना रहता है। जमात-ए-इस्लामी ने इस बार चुनावों में अपनी छवि बदलने की कोशिश की थी और उसे उम्मीद थी कि 1971 के बाद का सबसे अच्छा प्रदर्शन होगा। जमात को जमीनी स्तर पर समर्थन और बाहर से भी सहयोग की संभावना थी।  जमात गठबंधन ने 70 के आसपास सीटें जीतीं,जो उनकी पिछली स्थिति से सुधार है लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए बहुत कम है। बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी की जड़ें अविभाजित भारत में स्थापित इस्लामी राजनीतिक आंदोलन से जुड़ी हैं,जिसकी स्थापना 1941 में अबुल आला मौदूदी ने की थी। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान इस संगठन के कुछ नेताओं पर पाकिस्तान की एकता के समर्थन और स्वतंत्रता आंदोलन के विरोध के आरोप लगे। स्वतंत्रता के बाद बांग्लादेश में इसे प्रतिबंधित किया गया,किंतु बाद के दशकों में यह पुनः राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हुई और गठबंधन राजनीति का हिस्सा बनी।
चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के प्रति पाकिस्तान प्रायोजित सहानुभूति और समर्थन की धारणा बनाने की खूब कोशिश की गई,भारत विरोध को प्रश्रय दिया गया लेकिन तारिक रहमान की बीएनपी ने उम्मीद से कहीं ज्यादा बड़ी जीत हासिल की। यह चुनाव बांग्लादेश में शेख हसीना के शासन के अंत और जमात के कट्टरपंथ से हटकर बीएनपी के उदार विचारों की ओर झुकाव को दर्शाता है। पाकिस्तान के कुछ राजनीतिक और वैचारिक हलकों में यह आशा जताई जाती रही कि बांग्लादेश में इस्लामवादी ताकतें मजबूत हों। यदि ऐसा होता,तो इसे 1971 के बाद बनी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-धारणा के लिए चुनौती माना जाता। लेकिन चुनावी परिणामों ने संकेत दिया कि बांग्लादेश की जनता अब भी अपनी स्वतंत्र पहचान,भाषा-आधारित राष्ट्रवाद और विकास-केन्द्रित राजनीति को प्राथमिकता देती है। जनता के लिए बांग्ला अस्मिता केवल भाषा का प्रश्न नहीं है,यह सांस्कृतिक स्वाभिमान,लोकतांत्रिक मूल्यों और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी चेतना है। चुनावी नतीजों ने यह संदेश दिया कि बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा का निर्धारण बाहरी उम्मीदें या धार्मिक ध्रुवीकरण नहीं,बल्कि  देश की जनता करेगी।

देश में भारत विरोध तथा पाकिस्तान के समर्थन के कट्टरपंथी ताकतों की तमाम कोशिशों के बीच इन परिणामों को इस रूप में देखा जा सकता है कि बांग्लादेश ने एक बार फिर अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय पहचान को पुष्ट किया और यह  संदेश दिया कि उसका भविष्य उसकी अपनी ऐतिहासिक चेतना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय होगा। तारिक रहमान,जो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता हैं,उन्होंने चुनावी रणनीति में कई स्तरों पर मोर्चाबंदी की। करीब सत्रह साल बाद  वतन वापसी के साथ ही उन्होंने पार्टी की संगठनात्मक एकजुटता पर बल दिया,स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय किया,विरोधी मतों का भी आकर्षित करने में सफलता अर्जित की तथा चुनावी मुद्दों को राष्ट्रीय अस्मिता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर सबको चमत्कृत कर दिया। उनकी इस रणनीति ने विपक्षी समीकरणों को प्रभावित किया और चुनावी गणित को बदलकर निर्णायक और ऐतिहासिक सफलता अर्जित कर ली। अंततः किसी भी लोकतंत्र में निर्णायक भूमिका मतदाताओं की होती है। बांग्लादेश के मतदाताओं ने जिस दिशा में जनादेश दिया,उसने यह संकेत दिया कि राजनीतिक समीकरण केवल बाहरी समर्थन से तय नहीं होते,बल्कि ज़मीनी संगठन,नेतृत्व की विश्वसनीयता और स्थानीय मुद्दों की पकड़ अधिक निर्णायक होती है।
अब तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह कट्टरपंथी संगठनों को राजनीतिक मुख्यधारा में नियंत्रित दायरे में रखे,लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाएं रखे तथा 1971 की ऐतिहासिक चेतना और बांग्ला अस्मिता को कमजोर न होने दे। बांग्लादेश की सामाजिक संरचना धार्मिक है,परंतु उसकी राष्ट्रीय पहचान भाषा और मुक्ति संग्राम से निर्मित हुई है। इसलिए किसी भी तरह का वैचारिक ध्रुवीकरण दीर्घकाल में अस्थिरता पैदा कर सकता है।
पाकिस्तान की केंद्रीकृत सत्ता संरचना और उर्दू-प्रधान पहचान के आग्रह के विरुद्ध बंगाली चेतना ने जिस प्रतिरोध को करीब छह दशक पहले जन्म दिया था,उसने दक्षिण एशिया की राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया था। यही कारण है कि बांग्लादेश में होने वाला प्रत्येक आम चुनाव किसी न किसी रूप में 1971 की स्मृति और बांग्ला अस्मिता की कसौटी पर परखा जाता है। भाषा आंदोलन से लेकर मुक्ति संग्राम तक की यात्रा ने यह स्थापित किया कि बंगाली राष्ट्रवाद की जड़ें धर्म से अधिक संस्कृति और लोकतंत्र में हैं। हालिया चुनावों को कुछ हलकों में  पाकिस्तान के लिए अवसर के रूप में भी देखा गया। यह आकलन इस धारणा पर आधारित था कि यदि इस्लामवादी या पाकिस्तान-समर्थक मानी जाने वाली ताकतें मजबूत होती हैं,तो 1971 की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-धारणा को चुनौती मिल सकती है। हालांकि,लोकतांत्रिक राजनीति में बाहरी अपेक्षाओं से अधिक महत्व मतदाताओं की स्थानीय प्राथमिकताओं का होता है। आर्थिक विकास,रोजगार,शासन की पारदर्शिता और राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दे अक्सर वैचारिक नारों से अधिक निर्णायक सिद्ध होते हैं।
बीएनपी की सफलता को कुछ लोग राष्ट्रीय संतुलन की वापसी के रूप में देख रहे हैं। यह व्याख्या इस विचार पर आधारित है कि मतदाताओं ने कट्टर ध्रुवीकरण से दूरी बनाते हुए ऐसी राजनीतिक शक्ति को चुना जो राष्ट्रीय स्वायत्तता और बहुपक्षीय विदेश नीति की बात करती है। लोकतंत्र में जनादेश बहुआयामी होता है,उसमें सत्ता-विरोध,संगठनात्मक मजबूती,नेतृत्व की विश्वसनीयता और स्थानीय गठबंधनों की भूमिका भी शामिल होती है। यह कहा जा सकता है कि बांग्लादेश के हालिया चुनावों ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि 1971 की ऐतिहासिक चेतना आज भी राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करती है। यदि मतदाताओं ने बीएनपी को समर्थन दिया है तो उसमें राष्ट्रीय पहचान के साथ-साथ सुशासन और स्थिरता की अपेक्षा भी निहित है। यही बांग्लादेशी लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत है। तारिक रहमान की ताजपोशी की तैयारियों के बीच बांग्लादेश की जनता ने बताया है कि वह 1971 की ऐतिहासिक स्मृतियों को भूली नहीं है। पाकिस्तान की सेना द्वारा किए गए दमन और अत्याचारों ने बंगाली अस्मिता को कुचलने का प्रयास अब भी लोगों के जेहन में है और आज भी जब राजनीतिक परिस्थितियां  बदलती है,तब मतदाता उसी ऐतिहासिक चेतना को कसौटी बनाते हैं। इन चुनावों में यह संदेश उभरा कि बांग्लादेशी समाज किसी भी ऐसे राजनीतिक प्रभाव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है,जिसे पाकिस्तान समर्थक रुझान के रूप में देखा जाए। जनता ने संकेत दिया है कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्र पहचान से समझौता संभव नहीं है।
दूसरी ओर भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक सहयोग, सांस्कृतिक निकटता और 1971 की साझी स्मृति पर आधारित हैं। चुनावी जनादेश को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि बांग्लादेश की जनता क्षेत्रीय स्थिरता और भारत के साथ सहयोगपूर्ण संबंधों को प्राथमिकता देना चाहती है। जाहिर है अवामी लीग के पतन के बाद भी यह परिणाम बांग्लादेश में केवल सत्ता परिवर्तन नहीं,बल्कि राष्ट्रीय दिशा का संकेत भी है,जहां पाकिस्तान की नीतियों को अस्वीकार और भारत के साथ संतुलित साझेदारी को स्वीकार करने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है।

Leave feedback about this

  • Quality
  • Price
  • Service

PROS

+
Add Field

CONS

+
Add Field
Choose Image
Choose Video