नवभारत
ईरान पर अमेरिका और इजराइल के भीषण हमलों को रोकने की क्षमता यदि दुनिया में किसी देश के पास है तो वह रूस है। ईरान और रूस के गहरे रणनीतिक संबंध भी है तथा दोनों देश अमेरिका के प्रतिद्वंदी भी है। रूस यदि अपनी किसी परमाणु पनडुब्बी या नौसैनिक शक्ति को ईरान की रक्षा के संकेत के रूप में क्षेत्र में भेज दे,तो इससे तुरंत रणनीतिक संतुलन बदल सकता है और हमलें रुक सकते है। भौगोलिक दृष्टि से भी रूस और ईरान की दूरी बहुत अधिक नहीं है,इसलिए सैन्य मदद देना रूस के लिए असंभव नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद व्लादिमीर पुतिन इस प्रकार की प्रत्यक्ष सैन्य प्रतिक्रिया से बचते दिखाई दे रहे है जबकि ईरान इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा हैं। इसका एक प्रमुख कारण रूस और इजराइल के बीच मौजूद एक खास किस्म के संबंध है जिसे रणनीतिक भाषा में डी-कन्फ्लिक्शन कहा जाता है।
सैन्य रणनीति में डी-कन्फ्लिक्शन तंत्र एक महत्वपूर्ण तरीका है जो संभावित संघर्ष को पहले ही रोकने के लिए किया गया समन्वय है। यह शब्द मूलतः सैन्य रणनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भाषा से विकसित हुआ,जिसका उद्देश्य युद्ध को रोकना नहीं बल्कि अनजाने टकराव को टालना होता है। रूस और ईरान के बीच सामरिक और राजनीतिक संबंध मजबूत हैं फिर भी रूस अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने की रणनीति अपनाता है।
ऐसा समन्वय पहले भी देखने को मिल चुका है। जब सीरिया के युद्ध में रूस सक्रिय रूप से शामिल था तब भी इजराइल कई बार सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर हवाई हमले करता रहा। इसके बावजूद रूस और इजराइल के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव नहीं हुआ। दोनों देशों ने एक प्रकार का डी-कन्फ्लिक्शन या समन्वय बनाए रखा जिससे उनकी सेनाओं के बीच सीधा संघर्ष टलता रहा। व्लादिमीर पुतिन की सुरक्षा और विदेश नीति को समझने के लिए यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि रूस स्वयं इस्लामी चरमपंथी हिंसा का गंभीर शिकार रहा है। 1990 और 2000 के दशक में चेचन्या और उत्तरी काकेशस क्षेत्र में अलगाववादी और जिहादी समूहों ने कई बड़े हमले किए। इनमें 2002 में मास्को थिएटर बंधक संकट और 2004 में बेसलान स्कूल घेराबंदी जैसी घटनाएँ रूस की सुरक्षा स्मृति में गहराई से दर्ज हैं। इसी अनुभव के कारण पुतिन की नीति आतंकवाद और चरमपंथ के प्रति अत्यंत कठोर रही है। रूस लंबे समय से यह मानता रहा है कि पश्चिम एशिया की राजनीति में कई देश और शक्तियां प्रॉक्सी समूहों का उपयोग करती हैं। इस संदर्भ में रूस को यह भी समझ है कि ईरान ने क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के लिए विभिन्न सशस्त्र संगठनों को समर्थन दिया है। एक ओर वह ईरान के साथ राजनीतिक और सैन्य सहयोग बनाए रखता है दूसरी ओर वह इस बात से भी सतर्क रहता है कि चरमपंथी विचारधाराएं उसके अपने क्षेत्रों विशेषकर काकेशस में फिर से न फैलें। रणनीतिक दृष्टि से काकेशस अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रूस,मध्य एशिया,मध्य पूर्व और यूरोप के बीच संपर्क का मार्ग है। साथ ही यह क्षेत्र तेल और गैस संसाधनों तथा ऊर्जा पाइपलाइनों के कारण भी वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रूस में बड़ी यहूदी आबादी और इजराइल में बड़ी रूसी मूल की आबादी भी दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में एक सामाजिक सेतु का काम करती है। सोवियत संघ के विघटन के बाद बड़ी संख्या में रूसी यहूदी इजराइल,अमेरिका और यूरोप के देशों में चले गए। इसके बावजूद आज भी रूस में लगभग डेढ़ से दो लाख के आसपास यहूदी समुदाय मौजूद है। व्लादिमीर पुतिन के शासनकाल में रूस ने यहूदी समुदाय के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई है। मॉस्को में यहूदी संग्रहालय और सांस्कृतिक केंद्रों का विकास हुआ है और रूस ने इजराइल के साथ भी संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। रूस में यहूदी समुदाय का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है और इजराइल में बड़ी संख्या में रूसी मूल के यहूदी रहते हैं। इससे दोनों देशों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते भी बने हुए हैं। यहीं कारण है पुतिन खामोश है और वे ईरान के कमजोर होने को पराजय की तरह नहीं देख रहे है बल्कि उन्हें इसमें रणनीतिक फायदें ही नजर आ रहे है।
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इजराइल के खिलाफ कभी नहीं जाएंगे पुतिन
- by brahmadeep alune
- March 6, 2026
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