आरक्षण से बचने का पूंजीवादी रास्ता
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आरक्षण से बचने का पूंजीवादी रास्ता

आरक्षण से बचने का पूंजीवादी रास्ता

देश में आरक्षण समाप्त करने या उसे आर्थिक आधार पर लागू करने की मांग को लेकर एक बार फिर प्रदर्शन तेज हो रहे हैं। युवाओं का एक वर्ग मानता है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था खत्म होनी चाहिए और चयन का आधार आर्थिक स्थिति या योग्यता होना चाहिए। लेकिन इस बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जो बेहद दिलचस्प है। आरक्षण खत्म करने के लिए उसे सीधे समाप्त करना जरूरी है, या सरकारी नौकरियों का दायरा लगातार छोटा करते जाना ही पर्याप्त है। 1991 के बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र का विस्तार तेजी से हुआ। यह किसी एक सरकार की नीति नहीं थी। अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों ने अपने-अपने तरीके से निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई, सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश किया और अर्थव्यवस्था में बाजार की भूमिका को मजबूत किया। अंतर जरूर यह रहा कि किस सरकार ने निजीकरण की गति कितनी रखी और किस क्षेत्र को कितनी तेजी से निजी पूंजी के लिए खोला, लेकिन व्यापक दिशा में निरंतरता दिखाई देती है।

अब यह प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक व्यापक दिखाई देती है। सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका कम करने और निजी पूंजी की भूमिका बढ़ाने के पीछे आर्थिक दक्षता, प्रतिस्पर्धा, निवेश और राजकोषीय बोझ कम करने जैसे तर्क दिए जाते हैं। इन तर्कों का अपना आर्थिक आधार है। निजी क्षेत्र ने उत्पादन, सेवाओं और रोजगार के नए अवसर पैदा किए है। लेकिन इसी परिवर्तन का दूसरा पहलू आरक्षण की बहस में पर्याप्त ध्यान आकर्षित नहीं करता। निजी रोजगार बढ़ता है तो सरकारी रोजगार का अनुपात घटता है और सरकारी रोजगार घटता है तो आरक्षण के दायरे में आने वाले अवसर भी कम होते जाते है। आरक्षण भारत में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है। इसका सबसे प्रभावी क्षेत्र सरकारी रोजगार रहा है। सरकारी नौकरी महज नियमित वेतन का साधन नहीं रही, यह सामाजिक सम्मान, आर्थिक स्थिरता, नौकरी की सुरक्षा और राज्य की संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का माध्यम भी बनी। ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए सरकारी नौकरी सामाजिक गतिशीलता का महत्वपूर्ण रास्ता रही है। इसलिए सरकारी क्षेत्र का आकार बदलना आरक्षण के प्रभाव को भी प्रभावित करता है। कल्पना कीजिए कि जिस क्षेत्र में पहले बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां थी, वहां अब नई भर्तियां सीमित हो जाएं। सरकारी उपक्रमों का विनिवेश हो, कई सेवाओं में आउटसोर्सिंग बढ़े और नई नौकरियों का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियां पैदा करने लगें। ऐसी स्थिति में आरक्षण कानून में मौजूद रह सकता है, लेकिन उसके दायरे में आने वाली नौकरियां लगातार कम होती जाएंगी।

आरक्षण समाप्त करने के लिए संसद में आरक्षण खत्म करने वाला कानून लाना जरूरी नहीं पड़ सकता। यदि सरकारी नौकरियां ही कम होती जाएं तो आरक्षण का व्यावहारिक प्रभाव स्वतः सीमित हो सकता है। कानून अपनी जगह बना रहेगा, लेकिन उसके लिए उपलब्ध अवसरों की संख्या घटती जाएगी। इस अर्थ में आरक्षण का भविष्य केवल संविधान और कानून से तय नहीं होगा, यह इस बात से भी तय होगा कि भविष्य की अर्थव्यवस्था में कितनी नौकरियां ऐसी रहेंगी जिन पर आरक्षण लागू होता है।

भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद दूरसंचार, बैंकिंग, बीमा, विमानन, खुदरा, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी और अनेक अन्य क्षेत्रों में निजी पूंजी की भूमिका बढ़ी। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा हुए और अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ। लेकिन इन अवसरों का बड़ा हिस्सा उस संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आता, जो सरकारी सेवाओं में लागू है। इसलिए एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है की रोजगार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन आरक्षण के दायरे में आने वाले रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़े। यहीं निजीकरण और आरक्षण के बीच संबंध को समझना जरूरी है। निजीकरण अपने आप आरक्षण समाप्त नहीं करता, लेकिन वह उस क्षेत्र का आकार कम कर सकता है जिसमें आरक्षण लागू होता है। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। यदि सरकारी क्षेत्र रोजगार का बड़ा स्रोत नहीं रहेगा और निजी क्षेत्र रोजगार का प्रमुख केंद्र बन जाएगा, तो आरक्षण की पारंपरिक व्यवस्था स्वाभाविक रूप से सीमित प्रभाव वाली होती जाएगी।

इसे पूंजीवादी मॉडल के व्यापक संदर्भ में समझना होगा। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन, निवेश और रोजगार में बाजार तथा निजी पूंजी की भूमिका बढ़ती है, जबकि राज्य प्रत्यक्ष आर्थिक गतिविधियों से पीछे हटकर नियामक और सुविधाकर्ता की भूमिका निभाता है। यह व्यवस्था आर्थिक दक्षता, प्रतिस्पर्धा और निवेश को बढ़ावा दे सकती है। लेकिन सामाजिक न्याय का प्रश्न इससे अलग है। बाजार अपने आप ऐतिहासिक सामाजिक असमानताओं को समाप्त नहीं करता।

सरकारी क्षेत्र में नियुक्ति संवैधानिक व्यवस्था और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी होती है। निजी क्षेत्र में नियुक्ति मुख्यतः कौशल, उत्पादकता, बाजार की जरूरत और संस्थान की भर्ती नीति से तय होती है। इसलिए जब रोजगार का केंद्र सरकारी क्षेत्र से निजी क्षेत्र की ओर जाता है, तो रोजगार का सामाजिक चरित्र भी बदलता है। यही वह बिंदु है जहां भविष्य की आरक्षण व्यवस्था को लेकर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। यदि निजी क्षेत्र आने वाले समय में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत बनता है, तो क्या सामाजिक प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी भी निजी क्षेत्र तक पहुंचनी चाहिए, समान अवसर की व्यवस्था पर्याप्त होगी, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सहायता आधारित मॉडल विकसित किया जाएगा या बाजार को ही रोजगार और अवसरों के वितरण का प्रमुख आधार माना जाएगा। ऐसे सवालों के जवाब आसान नहीं है। निजीकरण के समर्थक इसे आर्थिक विकास, दक्षता और प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता मानते हैं। दूसरी ओर सामाजिक न्याय के समर्थकों की चिंता यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के सिकुड़ने के साथ उन संवैधानिक अवसरों का दायरा भी सिकुड़ रहा है, जिनके माध्यम से ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को राज्य की संस्थाओं में प्रतिनिधित्व मिला।

सरकार आरक्षण समाप्त करने की घोषणा न करें, संविधान में आरक्षण बना रहे और राजनीतिक दल आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में अपनी-अपनी राजनीति करते रहें, लेकिन यदि सरकारी रोजगार का क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जाएं और रोजगार का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में चला जाए, तो आरक्षण का प्रभाव क्षेत्र भी छोटा होता जाएगा। यही आरक्षण समाप्ति का संभावित पूंजीवादी मॉडल है, आरक्षण को सीधे हटाना नहीं, बल्कि उस क्षेत्र को छोटा करते जाना जिसमें आरक्षण लागू होता है। इस मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें कोई बड़ा संवैधानिक संघर्ष दिखाई नहीं देता। न आरक्षण समाप्त करने के लिए कानून लाने की जरूरत पड़ती है और न संविधान संशोधन की। आर्थिक संरचना बदलती है, रोजगार का स्वरूप बदलता है और धीरे-धीरे आरक्षण के लिए उपलब्ध अवसरों का संसार छोटा होता जाता है। इसलिए आने वाले समय में आरक्षण की सबसे बड़ी बहस शायद यह नहीं होगी कि आरक्षण रहेगा या नहीं, बल्कि यह होगी कि आरक्षण किन नौकरियों पर लागू रहेगा।

भारत में आरक्षण का मूल संबंध सामाजिक न्याय, समान अवसर और प्रतिनिधित्व से है। इसके विपरीत पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक निर्णयों का प्रमुख आधार बाजार, प्रतिस्पर्धा, लाभ और दक्षता होते है। बाजार सामाजिक असमानताओं को अपने आप दूर नहीं करता, वह प्रायः व्यक्ति की आर्थिक क्षमता और उत्पादकता को प्राथमिकता देता है। भारत में उदारीकरण के बाद जैसे-जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सेवाओं में बाजार की भूमिका बढ़ी, सामाजिक न्याय का प्रश्न भी नई चुनौती के सामने आया। जब व्यवस्था अवसरों को बाजार की कसौटी पर तौलने लगे, तब ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न बहुत पीछे छूट जाते है। आगे बढ़ते भारत की हकीकत पूंजीवाद और निजीकरण है,सरकारी नौकरियों में आरक्षण नहीं ।

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