जमात-ए-इस्लामी की गिरफ्त में बांग्लादेश
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 जमात-ए-इस्लामी की गिरफ्त में बांग्लादेश

हरिभूमि

  भाषा,सांस्कृतिक अधिकार,धर्मनिरपेक्षता,शिक्षा,मानवाधिकार और लोकतंत्र की बुनियाद पर टिके बांग्लादेश का भविष्य कट्टरपंथ के अंधेरे में घिरता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत के पड़ोस में स्थित यह देश अब कट्टरपंथी  संगठन जमात-ए-इस्लामी की पूरी गिरफ्त में आ चूका है। जमात-ए-इस्लामी राजनीतिक दल से कहीं ज्यादा इस्लामिक मूल्यों पर आधारित एक वैचारिक संगठन है जो समाज के सभी वर्गो तक कल्याणकारी सेवाओं को पहुंचाकर व्यापक प्रभाव कायम कर चूका है। बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान और शेख  हसीना  के बांग्ला प्रथम पर आधारित धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी संविधान को ख़ारिज कर इस्लामिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र का निर्माण का ख्वाब  देखते वाली जमात-ए-इस्लामी के लिए बांग्लादेश की राजनीति का यह अस्थिर दौर वरदान बन गया है।  अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस  और देश की न्यायपालिका के जमात-ए-इस्लामी  को मजबूत करने वाले फैसलों से बांग्लादेश की विविधता के खत्म होने  की आशंका गहरा गई है।

दरअसल जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने का विरोध करती रही है और यहीं कारण है की एक राजनीतिक दल के रूप में इसके प्रभाव को रोकने के लिए इसे वैधानिक रूप से प्रतिबंधित रखा गया था। अब बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट  के द्वारा जमात-ए-इस्लामी पर से वह प्रतिबन्ध हटाने के साथ ही यह सुनिश्चित हो गया है की आगामी आम चुनावों में यह कट्टरपंथी दल एक मजबूत दावेदार के रूप में भागीदारी करेगा और यह स्थिति बांग्लादेश के साथ ही भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा का संकट बढ़ा सकती है। जमात-ए-इस्लामी के उद्देश्य बेहद स्पष्ट है,पाकिस्तान से मजबूत संबंध तथा बांग्लादेश में इस्लामिक मूल्यों पर आधारित व्यवस्था की स्थापना करना। इस संगठन के कई सहयोगी उप-संगठन हैं,जो विभिन्न सामाजिक,छात्र,महिला और धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं। ये उप-संगठन अक्सर जमात की विचारधारा को बढ़ावा देने का कार्य करते हैं। बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी की वास्तविक छात्र शाखा के रूप में कार्य करता है। यह बांग्लादेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सक्रिय है तथा इंटरनेशनल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन और वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ का सदस्य है। कई पूर्व छात्र नेता जमात-ए-इस्लामी में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। इसकी  महिला विंग भी है जो महिलाओं के बीच इस्लामी विचारधारा और सामाजिक कार्यों को बढ़ावा  देने के कार्यो में जुटी हुई है। जमात-ए-इस्लामी का इस्लामिक बैंक भी है। इस्लामी बैंक बांग्लादेश लिमिटेड का उद्देश्य इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित एक कल्याणकारी बैंकिंग प्रणाली की स्थापना करना है। यह बैंक सभी आर्थिक गतिविधियों में समानता और न्याय सुनिश्चित करने,विविध निवेश संचालन के माध्यम से संतुलित और समान विकास प्राप्त करने  तथा विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कम आय वाले समुदायों को वित्तीय सेवाएं प्रदान करने का प्रयास करता है। जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक विचारधारा इस्लामी धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है,इसके संस्थापक नेता अबुल-अला-मौदूदी इस्लामी सरकार और शरिया क़ानून की वकालत करते थे। ऐसा माना जाता है की जमात-ए-इस्लामी के सामाजिक और कल्याणकारी कार्यो से देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों,सेना और प्रशासन में इसकी पैठ है। इसका फायदा राजनीतिक परिणामों में जनसमर्थन के रूप में व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

1971 में बांग्लादेश के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्यचारों को लेकर यह देश हमेशा आलोचना में रहा है। हालांकि शेख हसीना के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने की कोशिशों को व्यापक सफलता मिली थी। इन सबके बीच जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों ने देश में हिन्दू,बौद्ध और ईसाईयों को निशाना भी बनाया है। जमात-ए-इस्लामी को कुछ कट्टरपंथी और आतंकी संगठनों को भी समर्थन हासिल रहा है जिसमें जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश या जेएमबी तथा हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी बांग्लादेश या हूजी प्रमुख है। हूजी का पाकिस्तान से गहरा संबंध है,इसका गठन 17 बांग्लादेशी मुजाहिदीन द्वारा किया गया था,जो कथित तौर पर अल-कायदा से वित्तीय मदद लेकर अफगानिस्तान से लौटे थे। हूजी का उद्देश्य युद्ध छेड़कर और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की हत्या करके देश में इस्लामी शासन स्थापित करना है। यह ओसामा बिन लादेन और तालिबान से प्रेरणा लेता है। एक समय में,इसने एक नारा जारी किया था,अमरा सोबाई होबो तालिबान,बांग्ला होबे अफगानिस्तान अर्थात्  हम सभी तालिबान बनेंगे और हम बांग्लादेश को अफगानिस्तान में बदल देंगे।

भारत के केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपनी 2007-2008 की वार्षिक रिपोर्ट में भारत में आतंकवादी हमलों में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा,जैश-ए-मोहम्मद और बांग्लादेश स्थित हूजी की भूमिका को स्पष्ट किया था,इन तीनों संगठनों से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी  इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस के साथ घनिष्ठ संबंध हैं। हूजी  के पूर्वोत्तर के राज्यों के कई अलगाववादी संगठनों से हूजी के संबंध रहे है। वैश्विक स्तर पर भी हूजी के भारत,पाकिस्तान,श्रींलंका,चेचन्या,उज्बेकिस्तान,म्यांमार,बांग्लादेश,ईरान, मलेशिया,फिजी,आयरलैंड,यूके,यूएस,फिलीपींस,पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक आतंकी समूहों से सम्बन्ध सामने आये है। जनवरी 2009 से अगस्त 2024 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के रूप में शेख हसीना का कार्यकाल रहा था। उनके 15 साल के प्रधानमंत्रित्व काल में कट्टरपंथी और आतंकी समूहों पर लगाम लगाई गई जिसका फायदा भारत को भी लगातार मिला।

इस समय भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध बेहद खराब है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद सीमा पर तनाव है। कूटनीतिक और सामरिक मोर्चों पर भारत को चीन की नित नई चुनौतियां मिल रही है। देश के अंतरिम नेता मुहम्मद यूनुस भारत विरोधी ताकतों से लगातार हाथ मिला रहे है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाएं सुरक्षा की दृष्टि बेहद संवेदनशील मानी जाती है। शेख हसीना के कार्यकाल में इस समूचे क्षेत्र में भारत विरोधी शक्तियों को न केवल सख्ती से रोक दिया गया था बल्कि उन पर कड़ी कार्रवाई भी की गई थी। लेकिन अब स्थितियां पूरी तरीके से बदल चूकी है। मुहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान और चीन के साथ मिलकर भारत को सामरिक रूप से चुनौती देने वाले कई कार्य किए है। भारत बांग्लादेश में किसी लोकप्रिय सरकार के सत्ता में आने का इंतजार कर रहा है  जिससे दोनों देशों के संबंध सामान्य और मजबूत हो सके।

वहीं बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बेहद बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है जो भारत विरोध के रूप में बार बार सामने आ रहा है। जमात-ए-इस्लामी पर से प्रतिबन्ध हटने से भारत विरोध और अल्पसंख्यकों पर अत्यचारों में तीव्रता आ सकती है।  बांग्लादेश में इस समय जिस तरह से अस्थिर और अप्रत्याशित राजनीतिक हालात बन गये है उससे शेख हसीना की अवामी लीग का सत्ता में लौटना मुमकिन नहीं लगता। अपदस्थ बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना पर आपराधिक मुकदमें दर्ज कर उनकी पार्टी अवामी लीग को भी अप्रासंगिक बना  दिए जाने की सरकारी कोशिशें अंतरिम सरकार के द्वारा लगातार की जा रही है। स्वाभाविक तौर पर इसका फायदा जमात-ए-इस्लामी को मिल सकता है। आम  चुनावों में जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आ सकती है या सत्ता में मजबूत भागीदार हो सकती है। इन दोनों संभावनाओं में बांग्लादेश को संविधानिक परिवर्तनों से गुजरने की आशंकाएं बढ़ सकती है जो अंततः इस देश को तालिबान आधारित सत्ता की धकेल देगी। जाहिर है राजनीतिक बदलाव  के बाद बांग्लादेश में अनिश्चितताएं  लगातार बढ़ी है,भारत के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है।

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