नेतन्याहू का भविष्य और इजराइल का राजनीतिक परिदृश्य
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नेतन्याहू का भविष्य और इजराइल का राजनीतिक परिदृश्य

जनसत्ता
इजराइल की रणनीतिक और भू-राजनीतिक स्थिति जितनी जटिल है, उसकी घरेलू राजनीति भी उतनी ही उलझी हुई है। पश्चिम एशिया के तनाव, ईरान से टकराव, फिलिस्तीन का प्रश्न और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों के बीच इजराइल का राजनीतिक नेतृत्व भी कई तरह के मतभेदों से घिरा है। ताजा चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इजराइल में किसी एक विचारधारा या राजनीतिक गठबंधन के लिए सरकार बनाना आसान नहीं है। यह स्थिति यह भी बताती है कि इजराइल की चुनौतियां उसकी सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी राजनीतिक सहमति और सामाजिक एकता की जरूरत पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। वहीं इजराइल के चुनाव परिणाम ट्रम्प के लिए भी संकेत है कि नेतन्याहू को अमेरिकी समर्थन मिलने के बावजूद वे बहुमत हासिल नहीं कर सके। इससे ट्रम्प की पश्चिम एशिया नीति के सामने नई चुनौती खड़ी हुई है। ईरान, गाजा युद्ध और क्षेत्रीय शांति के मुद्दों पर उन्हें इजराइल की नई राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी होगी।
इजराइल में राजनीतिक दलों की वैचारिकी में यहूदी राष्ट्रवाद, धार्मिक परंपराओं, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय सुरक्षा और फिलिस्तीन के प्रश्न को लेकर गहरे मतभेद है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद और कठोर सुरक्षा नीति की समर्थक है, जबकि आइजेनकोट की याशर पार्टी मध्यमार्गी राष्ट्रवाद, सुरक्षा के साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं में सुधार और सभी नागरिकों के लिए समान जिम्मेदारी पर जोर देती है। इस समय नेतन्याहू सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता है, लेकिन उन्हें सहयोगी दलों की जरूरत है। आइजेनकोट विपक्ष का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे है, पर उनके सामने भी विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों को साथ रखने की चुनौती है।  बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और गादी आइजेनकोट की याशर पार्टी के बाद भी कई दलों की महत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी धर्मनिरपेक्षता, नागरिक अधिकारों और उदार लोकतंत्र का समर्थन करती है। डेमोक्रेट्स सामाजिक समानता और फिलिस्तीन के साथ शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर है। यिसरेल बेतेनु धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथी विचारधारा और धार्मिक दलों के प्रभाव को कम करने पर जोर देती है। शास और यूनाइटेड तोराह जूडिज्म यहूदी धार्मिक परंपराओं और धार्मिक शिक्षा की रक्षा करते है। ओत्जमा येहुदित कठोर यहूदी राष्ट्रवाद और बस्तियों के विस्तार का समर्थन करती है। अरब नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले राअम और जॉइंट लिस्ट इस समय बेहद मजबूत स्थिति में है और उनके लिए समान नागरिक अधिकार, स्थानीय विकास और फिलिस्तीनियों के राजनीतिक अधिकार की मांग केंद्रीय मुद्दे है। इस तरह इजराइल की राजनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, धर्म, यहूदी पहचान और फिलिस्तीन का प्रश्न प्रमुख मुद्दे है।
इजराइल की बदलती राजनीतिक स्थितियों के बीच नेतन्याहू और गादी आइजेनकोट  की नीतियों को जानना बेहद दिलचस्प है। दोनों नेताओं के बीच मूल अंतर उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं और शासन शैली में दिखाई देता है। नेतन्याहू की राजनीति राष्ट्रीय सुरक्षा, यहूदी राष्ट्रवाद और धार्मिक दक्षिणपंथी दलों के सहयोग पर आधारित है। वे हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के विरुद्ध कठोर सैन्य नीति के समर्थक है। इसके विपरीत, आइजेनकोट भी इजराइल की सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व देते है, लेकिन उनके राजनीतिक दृष्टिकोण में संस्थागत जवाबदेही, सभी नागरिकों के लिए समान सैन्य या राष्ट्रीय सेवा और कूटनीतिक संवाद को अधिक स्थान मिल सकता है। फिलिस्तीन के मुद्दे पर दोनों के बीच बहुत बड़ा वैचारिक अंतर नहीं है। दोनों हमास के निरस्त्रीकरण और इजराइल की सुरक्षा को जरूरी मानते है। हालांकि पश्चिमी तट में यहूदी बस्तियों के विस्तार और फिलिस्तीनी क्षेत्रों के प्रति नीति में अंतर दिखाई देता है। आइजेनकोट अनधिकृत बस्तियों के विस्तार और वहां होने वाली हिंसा का विरोध करते रहे है।
राजनीति संभावनाओं से भरपूर होती है और नेतन्याहू विपरीत परिस्थितियों में भी सत्ता में बने रहने की कोशिशों को सफल बनाते रहे है। यदि वे जोड़तोड़ करके सत्ता बचाएं रखने में कामयाब रहते है तो गाजा में सैन्य कार्रवाई, फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इजराइली नियंत्रण और ईरान के विरुद्ध कठोर रुख उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में बने रह सकते है। इसका एक बड़ा परिणाम पश्चिम एशिया में तनाव के बने रहने के रूप में सामने आ सकता है। अरब देशों के साथ संबंध सुधारने और क्षेत्र में स्थायी शांति की कोशिशों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। यदि नेतन्याहू फिलिस्तीनियों को राजनीतिक अधिकार देने और स्वतंत्र राष्ट्र की मांग पर कोई ठोस पहल नहीं करते है तो अरब देशों के साथ व्यापक समझौते की राह कठिन बनी रहेगी। नेतन्याहू की वापसी का असर इजराइल के आंतरिक समाज पर भी पड़ सकता है। उनकी राजनीति में धार्मिक राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रभाव अधिक रहा है। इससे धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष यहूदियों के बीच पहले से मौजूद मतभेद गहरा सकते है। अरब मूल के इजराइली नागरिकों के प्रति राजनीतिक अविश्वास बढ़ने का खतरा भी रहेगा।  न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव भी नेतन्याहू की राजनीति का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। न्यायिक व्यवस्था में सरकार के अधिकार बढ़ाने की कोशिशों ने इजराइल में बड़े जनविरोध को जन्म दिया था। सत्ता में लौटने पर ऐसे प्रयास फिर तेज हो सकते है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सरकार की जवाबदेही को लेकर बहस बढ़ेगी।
दूसरी और आइजेनकोट के प्रधानमंत्री बनने पर राजनीतिक स्थितियां अलग हो सकती है। गादी आइजेनकोट का नेतृत्व नेतन्याहू की तुलना में अलग राजनीतिक शैली प्रस्तुत कर सकता है। वे इजराइल के पूर्व सैन्य प्रमुख रहे है और सुरक्षा मामलों की गहरी समझ रखते है। इसलिए उन्हें उदारवादी या कमजोर सुरक्षा नीति का समर्थक मानना उचित नहीं होगा। वे भी हमास की सैन्य क्षमता समाप्त करने और इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के पक्षधर है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी उनका रुख कठोर है। अंतर यह हो सकता है कि वे सैन्य कार्रवाई के साथ राजनीतिक और कूटनीतिक रास्तों को अधिक महत्व दे। आइजेनकोट की सरकार बनने पर सबसे बड़ा बदलाव इजराइल की आंतरिक राजनीति में दिखाई दे सकता है। वे सात अक्टूबर के हमले और सुरक्षा व्यवस्था की विफलता की जांच के पक्षधर रहे है। ऐसी जांच से यह स्पष्ट करने का प्रयास होगा कि खुफिया एजेंसियों, सेना और राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर कहां चूक हुई। इससे प्रधानमंत्री और सरकार की जवाबदेही मजबूत हो सकती है। इजराइल के नागरिकों में भी यह भरोसा पैदा हो सकता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों में राजनीतिक नेतृत्व को जवाब देना होगा। उनकी सरकार धार्मिक संस्थाओं और सैन्य सेवा के प्रश्न पर भी नई बहस शुरू कर सकती है। इजराइल में लंबे समय से यह विवाद है कि धार्मिक शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले युवाओं को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट क्यों दी जाए, जबकि दूसरे समुदायों के युवाओं को सेना में सेवा देनी पड़ती है। आइजेनकोट सभी नागरिकों के लिए सैन्य या राष्ट्रीय सेवा की व्यवस्था के पक्षधर है। यदि उनकी सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो धार्मिक दलों के प्रभाव को चुनौती मिल सकती है। इससे इजराइली समाज में समान जिम्मेदारी की भावना मजबूत हो सकती है, लेकिन धार्मिक समूहों के साथ टकराव भी बढ़ सकता है।
फिलिस्तीन के प्रश्न पर आइजेनकोट से बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद करना भी उचित नहीं होगा। वे स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना के स्पष्ट समर्थक नहीं है। हमास के निरस्त्रीकरण और इजराइल की सुरक्षा को वे प्राथमिक शर्त मानते हैं। पश्चिमी तट में अवैध बस्तियों के विस्तार और वहां होने वाली हिंसा को लेकर उनका रुख नेतन्याहू की तुलना में अलग हो सकता है। वे अधिकृत बस्तियों और अनधिकृत बस्तियों के बीच अंतर करते है तथा अनधिकृत बस्तियों के विस्तार का विरोध करते रहे है। इससे पश्चिमी तट में तनाव कम करने की कुछ गुंजाइश बन सकती है, लेकिन फिलिस्तीनियों की स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न बना रहेगा। आइजेनकोट के नेतृत्व में इजराइल की विदेश नीति में संवाद और कूटनीति के लिए कुछ अधिक स्थान बन सकता है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ संबंधों में सुधार की संभावना भी रहेगी, खासकर उन मुद्दों पर जहां नेतन्याहू सरकार के फैसलों को लेकर मतभेद रहे है।
आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अलग-अलग विचारधारा वाले विपक्षी दलों को एक साथ कैसे रखते है। अरब दलों के समर्थन या मतदान से दूरी बनाए रखने की स्थिति में उनकी सरकार बन सकती है, लेकिन इजराइल की राजनीति में अरब दलों के साथ सहयोग को लेकर कई विपक्षी नेताओं की अपनी सीमाएं है। इसलिए अल्पमत सरकार बनना संभव तो है, लेकिन उसका स्थिर रहना आसान नहीं होगा। उसे बजट, सैन्य नीति, धार्मिक संस्थाओं और फिलिस्तीन जैसे विवादित मुद्दों पर लगातार राजनीतिक सहमति बनानी पड़ेगी। नेतन्याहू की वापसी से इजराइल में सुरक्षा केंद्रित और धार्मिक राष्ट्रवाद से प्रभावित राजनीति मजबूत हो सकती है। जबकि आइजेनकोट के नेतृत्व में सरकार बनने से जवाबदेही, सैन्य सेवा में समानता और राजनीतिक संवाद को अधिक महत्व मिलने की संभावना है। फिर भी दोनों नेताओं के बीच अंतर को इजराइल की सभी नीतियों में आमूलचूल बदलाव के रूप में नहीं देखना चाहिए।
ताजा चुनाव परिणामों ने इजराइल की राजनीति में यहूदी राष्ट्रवाद और अरब नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच बढ़ते टकराव को नई पहचान दी है। यहूदीवाद को अरबवाद की चुनौती कहना इस बदलाव का एक पक्ष हो सकता है, लेकिन असल मुद्दा इजराइल के बहुलतावादी लोकतंत्र का है। अरब नागरिकों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी यह बता रही है कि वे देश की सत्ता और नीतियों में अपनी हिस्सेदारी चाहते है। अब इजराइल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यहूदी और अरब नागरिकों के बीच मतभेद कम करके राष्ट्रीय एकता मजबूत करने की है। पहचान आधारित राजनीतिक ध्रुवीकरण जारी रहने पर सामाजिक विभाजन और गहरा सकता है। इस राजनीतिक परिस्थिति में नेतन्याहू का भविष्य और इजराइल का लोकतांत्रिक स्वरूप दोनों महत्वपूर्ण मोड़ पर है। बहरहाल, इजराइल के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि देश का भविष्य अब केवल किसी एक नेता की सत्ता पर निर्भर नहीं है। त्रिशंकु संसद और अरब दलों की बढ़ी राजनीतिक भागीदारी के बीच यह तय होगा कि नया नेतृत्व टकराव और विभाजन की राजनीति को आगे बढ़ाता है या सुरक्षा के साथ सामाजिक एकता, जवाबदेही और क्षेत्रीय शांति को प्राथमिकता देता है।

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