जैक ओ’कोनेल अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के अधिकारी रहे थे। उन्हें मध्यपूर्व में अमेरिकी रणनीतिक नीतियों को आकार देने वाले अधिकारियों में गिना जाता है। दिलचस्प तथ्य यह है कि उन्होंने 1950 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान की पंजाब विश्वविद्यालय से इस्लामी कानून में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी और बाद में पाकिस्तान डेस्क से जुड़े रणनीतिक मामलों पर भी काम किया। इससे अमेरिका और पाकिस्तान के पुराने सुरक्षा-संबंधों की गहराई का अंदाजा लगाया जा सकता है।
जैक ओ’कोनेल की पुस्तक किंग्स काउंसिल में पाकिस्तान के सैन्य शासक जिया उल हक़ की जॉर्डन में भूमिका और फिलिस्तीनी संगठनों के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई का उल्लेख मिलता है। इससे पाकिस्तान की फिलिस्तीन नीति की हकीकत का भी पता चलता है। दरअसल 1967 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी शरणार्थी जॉर्डन पहुंचे थे। धीरे-धीरे फिलिस्तीन मुक्ति संगठन जॉर्डन के भीतर एक समानांतर शक्ति केंद्र की तरह उभरने लगा, जिससे जॉर्डन के राजा किंग हुसैन की सत्ता को चुनौती महसूस होने लगी। उस समय ब्रिगेडियर जिया-उल-हक जॉर्डन में पाकिस्तानी सेना के सलाहकार और सैन्य प्रशिक्षक के रूप में तैनात थे। सितंबर 1970 में जॉर्डन और फिलिस्तीनी संगठनों के बीच जो खूनी संघर्ष हुआ, उसे इतिहास में ब्लैक सितंबर के नाम से जाना जाता है। इस संघर्ष के दौरान जिया-उल-हक पर जॉर्डन की सेना को रणनीतिक सहयोग देने और फिलिस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ अभियान संचालन में भूमिका निभाने के आरोप लगे। 11 दिनों तक चले इस संघर्ष में हजारों फिलिस्तीनी मारे गए और अंततः फिलिस्तीनी गुटों को जॉर्डन छोड़ना पड़ा। इजरायल के तत्कालीन रक्षा मंत्री मोशे दयान की वह टिप्पणी आज भी चर्चित है कि राजा हुसैन ने इतने कम समय में जितने फिलिस्तीनियों को मार दिया,उतना इजरायल वर्षों में भी नहीं कर पाया था। यही कारण है कि जिया-उल-हक को पाकिस्तान के भीतर भी फिलिस्तीनी किलर कहा जाता है। बाद में 1977 में वे तख्तापलट के जरिए पाकिस्तान के सैन्य शासक बने।
अब ट्रम्प के दांव के बाद आज यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान भविष्य में अब्राहम अकार्ड का हिस्सा बन सकता है। पाकिस्तान अब भी फिलिस्तीन समर्थक नीति की बात करता है और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने ट्रम्प के प्प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया है। पाकिस्तानी पासपोर्ट पर इजराइल को छोड़कर सभी देशों के लिए मान्य लिखा जाना इसी नीति का प्रतीक माना जाता है की पाकिस्तान फिलिस्तीन का मजबूत समर्थक है। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी फिलिस्तीन के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई थी। मुस्लिम लीग के संस्थापक नेताओं में से एक और भारत विभाजन के जिम्मेदार मौलाना मोहम्मद अली जौहर को यरुशलम स्थित अल अक्सा मस्जिद के परिसर में दफनाया गया था। वे पहले गैर-अरब भारतीय थे जिन्हें यह सम्मान मिला। इन प्रतीकों के कारण पाकिस्तान लंबे समय तक खुद को फिलिस्तीन का स्वाभाविक समर्थक प्रस्तुत करता रहा है।
पाकिस्तान यह कहता रहा है की जब तक फिलिस्तीन समस्या का समाधान नहीं होता,तब तक वह इज़राइल को मान्यता नहीं देगा। लेकिन पाकिस्तानी कूटनीति की पड़ताल करने पर वास्तविकता अलग ही नजर आती है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और इजरायल की मोसाद के बीच बैकचैनल संपर्क रहे है। आतंकवाद-रोधी अभियानों से लेकर सामरिक सूचनाओं के आदान-प्रदान तक विभिन्न स्तरों पर गुप्त संवाद की खबरें सामने आती रही है। इमरान खान की सरकार के दौरान नवंबर 2020 में तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के बड़े नेता और व्यवसायी जुल्फी बुखारी को लेकर इज़रायली अख़बार ने दावा किया था कि उन्होंने गुप्त रूप से इज़राइल की यात्रा की तथा उन्होंने अपने ब्रिटिश पासपोर्ट का उपयोग किया। जुल्फी बुखारी ने इस दौरान इज़रायली अधिकारियों तथा मोसाद प्रमुख से मुलाकात की थी। पाकिस्तान से इजरायल को हथियार या गोला-बारूद पहुंचने के तथ्य भी सामने आये है। 2023 में यह खबरें सामने आई थी की ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स के एयरक्राफ्ट ने पाकिस्तान के रावलपिंडी में नूर खान बेस से हथियार और गोला बारूद लेकर उसे ओमान के रास्ते साइप्रस में एक सहयोगी बेस तक पहुंचाया था। हमास के साथ युद्ध के बीच साइप्रस में ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स का अक्रोटिरी बेस इजरायल को गोला-बारूद की आपूर्ति करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य केंद्र के तौर पर उभरा था। इजराइल का प्रमुख सहयोगी अमेरिका है और अमेरिका और पाकिस्तान के मजबूत सम्बन्धों के चलते इसकी संभावनाएं बनी रहती है की पाकिस्तान इजराइल की मदद करें।
असल में पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट,महंगाई,बेरोजगारी और कर्ज का दबाव उसकी राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में अमेरिका और पश्चिमी देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त करना उसकी प्राथमिकता बन चुका है। अब्राहम अकार्ड पाकिस्तान के बहुत फायदेमंद बन सकता है। दुनिया के सबसे धनी देशों में शुमार इस्लामिकदेश संयुक्त अरब अमीरात,बहरीन और मोरक्को जैसे देशों ने जब इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए तो उसके पीछे अमेरिकी रणनीतिक और आर्थिक हित भी शामिल थे। मिस्र को दशकों से अमेरिका की भारी आर्थिक और सैन्य सहायता मिलती रही है। पाकिस्तान की सैन्य प्रतिष्ठान और सत्ता यह जानती है कि यदि भविष्य में वह इजरायल के साथ संबंध सामान्य करता है,तो उसे अमेरिकी समर्थन,पश्चिमी निवेश और आर्थिक राहत के नए रास्ते मिल सकते है।
पाकिस्तान की सेना के अमेरिका से दशकों पुराने संबंध रहे हैं। शीत युद्ध से लेकर आतंकवाद विरोधी अभियानों तक पाकिस्तान लंबे समय तक अमेरिकी रणनीति का प्रमुख साझेदार बना रहा। सीआईए,आईएसआई और क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र के बीच सहयोग ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को बहुत प्रभावित किया है। इसलिए यह संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती कि भविष्य में आर्थिक और सामरिक हित इस्लामी भावनाओं पर भारी पड़े। पाकिस्तान के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। वहां की जनता में फिलिस्तीन के प्रति गहरी सहानुभूति मौजूद है। धार्मिक दल और कट्टरपंथी संगठन इसका तीखा विरोध करेंगे। अचानक इजरायल को मान्यता देना घरेलू अस्थिरता बढ़ा सकता है। इसलिए यदि कोई बदलाव धीरे-धीरे, बैकचैनल संपर्कों और सीमित सहयोग के रूप में सामने आ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में असंभव जैसा कुछ नहीं होता। जिन अरब देशों ने दशकों तक इजरायल का विरोध किया,वे भी अंततः रणनीतिक और आर्थिक कारणों से उसके साथ खड़े है। पाकिस्तान पैसों के लिए अमेरिका के साथ हमेशा खड़ा रहता है और वह इस्लामिक दुनिया को धोखा देता रहा है। जाहिर है फिलिस्तीन को पाकिस्तान से एक और धोखा मिलने की संभावनाएं बढ़ गई है। आने वाले वर्षों में पाकिस्तान सार्वजनिक रूप से फिलिस्तीन का समर्थन करता रहे,लेकिन परदे के पीछे उसकी कूटनीति किसी और दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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