जनसत्ता
अठारहवां ब्रिक्स सम्मेलन, लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के निर्माण के संदेश के साथ सम्पन्न हुआ। वैश्विक व्यवस्था में लचीलापन बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नीतियों और रणनीतियों में आवश्यक परिवर्तन की क्षमता है। नवाचार नई सोच, तकनीक और नीतियों के माध्यम से वैश्विक चुनौतियों के समाधान का मार्ग है। सहयोग और स्थिरता का निर्माण देशों के बीच संवाद, विश्वास और साझेदारी को मजबूत करता है। आज वैश्विक तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी परिवर्तन, जलवायु संकट और सुरक्षा चुनौतियों के बीच ये चारों तत्व विश्व शांति, संतुलित विकास और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए है।
ब्रिक्स की इस थीम के पीछे मंशा बहुत स्पष्ट नजर आई की उभरती हुई शक्तियों को बदलती विश्व व्यवस्था में अधिक प्रभावी भूमिका देने की जरूरत है जो संयुक्तराष्ट्र संघ में सुधार में दिखाई देना चाहिए। ब्रिक्स देश आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाकर वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा को प्रभावित कर सकते है। फिर भी ब्रिक्स के सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित, राजनीतिक मतभेद और आर्थिक असमानताएं बड़ी चुनौती है। इसलिए ब्रिक्स विश्व व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की स्थिति में अभी नहीं है, पर उसे अधिक बहुध्रुवीय, प्रतिनिधिमूलक और संतुलित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। ब्रिक्स का साझा घोषणा पत्र जारी हुआ जिसके केंद्र में वैश्विक शांति और संघर्षों का कूटनीतिक समाधान, आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग, निष्पक्ष व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी एवं डिजिटल सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे विषय शामिल किये गये। साझा घोषणा-पत्र को ब्रिक्स देशों और भारत की सफलता माना जा सकता है, क्योंकि सदस्य देशों ने मतभेदों के बीच साझा सहमति कायम की और वैश्विक शांति, बहुपक्षवाद, आर्थिक सहयोग, विकास तथा वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर सामूहिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। भारत के लिए यह सहमति-निर्माण क्षमता, कूटनीतिक प्रभाव और वैश्विक दक्षिण की आवाज को आगे बढ़ाने की उपलब्धि है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह किसी शक्ति-गुट की राजनीति में उलझे बिना अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाएं। ब्रिक्स सम्मेलन के बाद भारत के सामने अब इन कूटनीतिक अवसरों को ठोस उपलब्धियों में बदलने की चुनौती है। रूस, चीन, ईरान और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ बने संवाद को आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग में आगे बढ़ाना भारत के हित में होगा। ब्रिक्स के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, विकास वित्त और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने में भारत सक्रिय भूमिका निभा सकता है। यही दृष्टिकोण भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करेगा और बदलती विश्व व्यवस्था में उसकी भूमिका को अधिक प्रभावशाली बनाएगा।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन का भारत आना महज एक शिखर सम्मेलन में भागीदारी नहीं थी। यह उस समय हुआ है, जब दुनिया शक्ति-संघर्ष, युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और पश्चिम एशिया के तनाव से गुजर रही है। ऐसे समय में रूस, चीन, ईरान और वैश्विक दक्षिण के प्रमुख प्रतिनिधियों का भारत की धरती पर एक साथ आना नई दिल्ली की कूटनीतिक क्षमता और बढ़ती स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण संकेत है। इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए भी यह संदेश गया कि वैश्विक राजनीति में शक्ति के नए केंद्र उभर रहे है। पुतिन की उपस्थिति रूस-भारत संबंधों की निरंतरता का प्रतीक बनी है, जिनपिंग की मौजूदगी भारत-चीन संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करती है, वहीं पेज़ेश्कियन की भागीदारी पश्चिम एशिया, ऊर्जा और संपर्क मार्गों के संदर्भ में भारत की भूमिका को महत्व देती है। इन अलग-अलग हितों और दृष्टिकोणों को एक मंच पर साधना भारत के लिए बड़ा अवसर था, और इस कूटनीतिक परीक्षा को भारत ने बखूबी अंजाम दिया। ब्रिक्स 2026 में ईरान की सक्रिय मौजूदगी अपने आप में दुनिया के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संदेश दे गई। पश्चिम एशिया में तनाव और अमेरिका-ईरान टकराव के बीच राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन का भारत आकर ब्रिक्स मंच पर अपनी बात रखना ईरान की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाता है। इससे अमेरिका को यह संकेत भी मिला है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग नहीं है और उभरती शक्तियों के साथ उसके संबंध महत्वपूर्ण बने हुए है। पेज़ेश्कियन इस उपस्थिति के माध्यम से अमेरिका की दबाव आधारित नीति के प्रति अपना असहमति संदेश देने में सफल रहे। भारत के लिए भी यह अवसर था कि वह ईरान सहित विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करे।
पुतिन, शी जिनपिंग और मसूद पेज़ेश्कियन की उपस्थिति ने भारत को एक साथ रूस, चीन और ईरान के साथ उच्चस्तरीय संवाद का अवसर दिया है। अब भारत की कूटनीति को इस अवसर को व्यावहारिक लाभ और रणनीतिक स्वायत्तता में बदलने पर केंद्रित होना चाहिए। रूस के साथ ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष और व्यापार सहयोग बढ़ेगा वहीं चीन के साथ सीमा पर शांति कायम रखते हुए व्यापार असंतुलन और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ईरान के साथ चाबहार, ऊर्जा, संपर्क और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने के मार्ग पर भारत से मजबूती से अब आगे बढ़ सकता है और ऐसे संकेत भी मिले है। आने वाले समय में भारत अमेरिका और यूरोप के साथ संबंधों को कमजोर किए बिना भारत को सभी शक्ति केंद्रों के साथ संवाद रखने वाली स्वतंत्र कूटनीति पर आगे बढ़ सकता है। यही संतुलन भारत को ब्रिक्स के भीतर प्रभावी भूमिका और विश्व व्यवस्था में अधिक रणनीतिक महत्व दे सकता है।
आज ब्रिक्स विश्व व्यवस्था में एक प्रभावशाली आर्थिक समूह और उभरते बहुध्रुवीय विश्व का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। इसकी आर्थिक क्षमता, विशाल जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन और वैश्विक दक्षिण में बढ़ती स्वीकार्यता इसकी ताकत है। विस्तारित ब्रिक्स विश्व की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सामने सदस्य देशों के राजनीतिक मतभेद, अलग-अलग आर्थिक हित, आपसी अविश्वास और साझा नीतियों पर सहमति बनाने की चुनौती है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था की दिशा में प्रयास जारी है, फिर भी डॉलर आधारित व्यवस्था का मजबूत विकल्प सामने नहीं आया है। ऐसे में ब्रिक्स का प्रभाव आर्थिक और कूटनीतिक क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि सामूहिक रणनीतिक शक्ति के रूप में उसकी भूमिका अभी विकासशील अवस्था में है। वैश्विक संस्थाओं में सुधार, व्यापार, विकास, जलवायु, स्वास्थ्य और तकनीकी सहयोग के मुद्दों पर ब्रिक्स अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। आने वाले समय में उसकी सफलता इस बात से तय होगी कि सदस्य देश अपने आर्थिक सामर्थ्य को कितनी प्रभावी सामूहिक कार्रवाई में बदल पाते है। आयोजन और कूटनीतिक मेजबानी की दृष्टि से ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए बड़ी सफलता रहा, पर ब्रिक्स के सामने इससे कहीं बड़ी रणनीतिक संभावनाएं मौजूद थी। सदस्य देशों के पास डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को चुनौती देने, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को गति देने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने का अवसर था। ईरान के साथ खड़े होकर पश्चिम एशिया के संकट पर अधिक स्पष्ट सामूहिक रुख भी सामने आ सकता था। इन क्षेत्रों में अपेक्षित ठोस प्रगति दिखाई नहीं दी। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या ब्रिक्स आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव के अनुरूप सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता विकसित कर पाया है। सम्मेलन ने ब्रिक्स की संभावनाओं को सामने रखा, लेकिन कई महत्वपूर्ण काम अभी बाकी है जो स्पष्ट तौर पर एक मजबूत संगठन के तौर पर ब्रिक्स की पहचान में बाधक है।
ब्रिक्स की बढ़ती भूमिका के साथ उसकी आंतरिक चुनौतियां भी कम नहीं है। चीन का बढ़ता प्रभाव कई विकासशील और सदस्य देशों के लिए चिंता का विषय है। सदस्य देशों के बीच व्यापार में गहरी असमानताएं है और भारत-चीन संबंधों की जटिलताएं ब्रिक्स की सामूहिक क्षमता को प्रभावित करती है। ईरान के राष्ट्रपति की उपस्थिति ने पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों को मंच दिया, वहीं सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्र प्रमुखों की अनुपस्थिति ने कई प्रश्न खड़े किए। दूसरी ओर, ब्रिक्स के अनेक देशों के अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसी विविध परिस्थितियां ब्रिक्स के सामने साझा दृष्टिकोण और सामूहिक निर्णय की चुनौती बढ़ाती है। यही स्थिति इस वैश्विक संगठन की उपयोगिता, प्रभावशीलता और भविष्य को लेकर असमंजस पैदा करती है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ईरान की सक्रिय उपस्थिति के बीच सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति पश्चिम एशिया के भीतर मौजूद मतभेदों की ओर संकेत करती है। चीन की आर्थिक क्षमता, विशाल व्यापारिक नेटवर्क, तकनीकी सामर्थ्य और वैश्विक दक्षिण में बढ़ती सक्रियता उसे समूह के भीतर असाधारण वजन देती है। ऐसे में ब्रिक्स के सामने एक बुनियादी प्रश्न यह भी है की यह समान भागीदारी वाला बहुपक्षीय मंच बनेगा या चीन के आर्थिक वजन से प्रभावित समूह। रूस चीन के साथ रणनीतिक रूप से निकट है, ईरान के चीन से गहरे संबंध हैं, जबकि ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य सदस्य अपनी अलग आर्थिक प्राथमिकताएं रखते है। दूसरी ओर भारत ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी गठबंधन बनने से रोकते हुए व्यावहारिक सहयोग का मंच बनाए रखना चाहता है। 2026 के दिल्ली सम्मेलन में भारत ने साझा मुद्रा जैसे मुद्दे को आगे बढ़ाने के स्थान पर राष्ट्रीय मुद्राओं और भुगतान प्रणालियों में सहयोग पर जोर दिया। इसलिए चीन का प्रभाव ब्रिक्स की शक्ति भी है और उसकी सीमा भी। चीन जितना अधिक आर्थिक नेतृत्व करता है, उतनी ही आवश्यकता अन्य सदस्य देशों के लिए सामूहिक निर्णय, संतुलित संस्थागत व्यवस्था और भारत जैसे देशों की स्वतंत्र भूमिका सुनिश्चित करने की हो जाती है। यदि ब्रिक्स इस संतुलन को कायम रखता है तो वह बहुध्रुवीय विश्व का प्रभावी मंच बन सकता है, संतुलन बिगड़ने पर उसके भीतर अविश्वास और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
ब्रिक्स के सामने विकासशील देशों की अपेक्षाएं अब आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर न्यायपूर्ण वैश्विक शासन, विकास वित्त, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक दक्षिण की प्रभावी आवाज तक पहुँच गई है। जी-7 की निगाहें भी ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक क्षमता पर है। फिर भी ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच राजनीतिक मतभेद, आर्थिक असमानताएं और अलग-अलग राष्ट्रीय हित, सामूहिक क्षमता को सीमित करते है। इसलिए ब्रिक्स अभी वैश्विक व्यवस्था का विकल्प नहीं बना है, पर वह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। चुनौती अपेक्षाओं को ठोस परिणामों में बदलने की है।








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