सुबह सवेरे
भारत की विभाजन से जुडी हिंसक त्रासदियों के केंद्र में बंगाल था। आज़ादी के बाद भारत के लगभग सभी राज्यों की राजनीतिक संस्कृति समय के साथ बदली,लेकिन बंगाल में ऐसा नहीं हुआ,सत्ता चाहे मुस्लिम लीग,कांग्रेस,कम्युनिस्ट पार्टी या तृणमूल कांग्रेस की रही हो,राजनीतिक संघर्ष अक्सर अत्यधिक टकरावपूर्ण और हिंसक बना रहा। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति केवल चुनावी परिणाम तक सीमित न होकर,उसकी राजनीतिक संस्कृति भी एक बड़ा प्रश्न बन जाती है।
1946 में मुस्लिम लीग की सरकार के नुमाइंदें हुसैन शहीद सुहरावर्दी के दौर में डायरेक्ट एक्शन डे से लेकर नक्सलवाद,वामपंथी कैडर राजनीति और बाद के वर्षों में तृणमूल बनाम भाजपा संघर्ष तक,बंगाल में राजनीति हिंसक और आक्रमक होते हुए सामाजिक प्रभुत्व,संगठनात्मक नियंत्रण और सड़क की ताकत का प्रदर्शन भी बन गई। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और सामाजिक कारण रहे हैं। पहला कारण है विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की गहरी स्मृति। बंगाल ने 1946-47 में जिस भयावह हिंसा को देखा,उसने समाज और राजनीति दोनों को कठोर बना दिया। दूसरा कारण है वैचारिक राजनीति की तीव्रता। बंगाल लंबे समय तक राष्ट्रवाद,समाजवाद,वामपंथ और सांस्कृतिक आंदोलनों का केंद्र रहा। यहां राजनीतिक दल चुनावी संगठन के साथ समाज के भीतर वैचारिक और सामाजिक शक्ति केंद्र भी बन गए।कैडर आधारित राजनीति का बंगाल में बड़ा प्रभाव रहा। वाम मोर्चे के लंबे शासन में पार्टी संगठन गांव-गांव तक फैल गया। पंचायत,यूनियन,छात्र राजनीति और स्थानीय प्रशासन तक राजनीतिक प्रभाव गहरा हुआ। बाद में यही मॉडल तृणमूल कांग्रेस ने भी अपनाया। परिणाम यह हुआ कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद राजनीतिक संस्कृति में बड़ा बदलाव नहीं आया। विरोधी दलों के लिए राजनीतिक जगह अक्सर सीमित होती गई।
राजनीतिक नेतृत्व ने संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया जिससे आम जनता में आर्थिक और सामाजिक निराशा से न निकल पाने को लेकर हताशा का भाव गहरा हुआ। उद्योगों के पलायन,बेरोजगारी और स्थानीय सत्ता संरचनाओं ने राजनीतिक संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया। बंगाल में चुनाव कई बार लोकतांत्रिक उत्सव से अधिक शक्ति प्रदर्शन जैसे दिखाई दिए। यहां सत्ता पक्ष ने हमेशा अपने संगठन को राज्य व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की,जिससे विपक्ष को भय और दबाव का सामना करना पड़ा। प्रशासनिक ढांचे को बंधक बनाकर उसे राजनीतिक हथियार और संसाधन की तरह उपयोग करने की प्रवृत्ति बंगाल में शासन करने वाले प्रत्येक दल की रही है। सुहरावर्दी से लेकर ममता बनर्जी और शुवेंधू अधिकारी तक बंगाल की राजनीति का एक लंबा इतिहास रहा है,जिसमें सत्ता परिवर्तन तो हुए,लेकिन राजनीतिक संस्कृति में हिंसा,संगठनात्मक वर्चस्व और विपक्ष का दमन लगातार देखने में आया और यह क्रम पिछले कई दशकों से जारी है। यही कारण है कि बंगाल हमेशा विपक्ष के लिए कब्रगाह रहा है। बंगाल की राजनीति चुनावी प्रतिस्पर्धा से कहीं ज्यादा वैचारिक संघर्ष,सड़क की शक्ति,कैडर नेटवर्क और राजनीतिक प्रभुत्व का युद्धक्षेत्र भी रही है। यहां जो भी दल सत्ता में आया,उसने शासन के साथ समाज,प्रशासन और स्थानीय ढांचे पर गहरी पकड़ बनाने का प्रयास किया। वहीं विपक्ष को भयभीत करने और हाशिए पर धकेलने के प्रयास लगातार होते रहे।
1946 के प्रांतीय चुनाव इस राजनीतिक संस्कृति की शुरुआती झलक माने जा सकते हैं। उस समय अविभाजित बंगाल में मुस्लिम लीग ने निर्णायक जीत हासिल की और सुहरावर्दी के नेतृत्व में सरकार बनी। पाकिस्तान की मांग को मजबूत करने के लिए मुस्लिम लीग ने जिस प्रकार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दी,उसका सबसे भयावह परिणाम 16 अगस्त 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के रूप में सामने आया। डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में भीषण दंगे हुए,हजारों लोग मारे गए और प्रशासन लगभग निष्क्रिय दिखाई दिया। उस दौर में राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन ने लोकतांत्रिक असहमति को हिंसक टकराव में बदल दिया। 1947 में विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा बना और कांग्रेस के नेतृत्व में नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हुई। डॉ बिधान चंद्र राय के नेतृत्व में राज्य में पुनर्निर्माण और औद्योगिक विकास की कोशिश हुई, लेकिन 1960 के दशक तक बेरोजगारी,खाद्य संकट और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। इसी पृष्ठभूमि में नक्सलवादी आंदोलन उभरा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,माकपा और अन्य वामपंथी समूहों ने युवाओं के बीच प्रभाव बढ़ाया,जबकि कट्टर नक्सली धड़े हिंसक रास्ते पर चले गए। इसके जवाब में कांग्रेस सरकार ने कठोर दमनकारी नीतियां अपनाईं। पुलिस मुठभेड़ों,गिरफ्तारियों और राजनीतिक हिंसा का कुचक्र चला। लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर राज्य शक्ति का उपयोग कई बार अलोकतांत्रिक तरीकों से किया गया। इस दौर ने बंगाल में राजनीतिक हिंसा को लगभग संस्थागत रूप दे दिया। 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया। ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वामपंथ ने 34 वर्षों तक शासन किया। भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था जैसे कदमों ने उन्हें ग्रामीण बंगाल में मजबूत आधार दिया। लेकिन समय के साथ वाम शासन ने भी एक विशाल कैडर नेटवर्क खड़ा कर प्रशासन,यूनियनों और स्थानीय संस्थाओं पर कब्जा जमा लिया। राजनीतिक विरोधियों को सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की संस्कृति मजबूत हुई। पंचायत चुनावों में हिंसा,बूथ कब्जाने और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमलों के आरोप लगातार सामने आते रहे। यहां कैडर राज में पार्टी और प्रशासन के बीच की रेखा धुंधली हो गई थी। 2007 का नंदीग्राम हिंसा और सिंगूर विवाद वाम शासन की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली घटनाएं बनीं। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनों पर पुलिस कार्रवाई ने यह धारणा मजबूत की कि सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बाद वाम दल भी विपक्ष को दबाने वाली शक्ति बन चुके थे।
इसी असंतोष के बीच ममता बनर्जी ने मां,माटी,मानुष के नारे के साथ वाम शासन को चुनौती दी और 2011 में ऐतिहासिक जीत हासिल की। शुरुआत में यह परिवर्तन लोकतांत्रिक पुनर्जागरण जैसा लगा,लेकिन समय के साथ तृणमूल कांग्रेस भी वाम दल की राह पर चल पड़ी। तृणमूल शासन के दौरान सिंडिकेट राज,स्थानीय दबंगों की राजनीति,पंचायत चुनावों में हिंसा और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमलों ने लोकतंत्र को रक्तरंजित और कलंकित किया। अब भाजपा की जीत और शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। अब सबसे बड़ी चुनौती इस राज्य में राजनीतिक संस्कृति को बदलने की होगी। नई सत्ता को लोकतांत्रिक होकर पूरे राजनीतिक ढांचे पर प्रभुत्व की स्थापित कोशिशों को खत्म करने की ओर कदम बढ़ाने होंगे। बंगाल की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि यहां विचारधारा बदलती रही, लेकिन राजनीतिक व्यवहार में समानताएं बनी रहीं। मुस्लिम लीग,कांग्रेस,वाम मोर्चा से तृणमूल कांग्रेस तक,हर दौर में सत्ता ने अपने संगठनात्मक ढांचे को इतना मजबूत किया कि विपक्ष के लिए राजनीतिक जमीन सिकुड़ती गई। यही कारण है कि बंगाल में लोकतंत्र अक्सर केवल चुनावों तक सीमित दिखाई देता है,जबकि जमीनी स्तर पर राजनीतिक स्वतंत्रता कई बार दबाव और भय से प्रभावित होती रही है।
हालांकि बंगाल की पहचान को केवल हिंसा और दमन तक सीमित करना भी ठीक नहीं होगा। यह भूमि रवीन्द्रनाथ ठाकुर,सुभाष चंद्र बोस और बौद्धिक बहसों की परंपरा की भी रही है। इसलिए बंगाल के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अपनी राजनीतिक ऊर्जा को हिंसक प्रभुत्व से निकालकर स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा में बदल सके। इसके लिए प्रशासनिक निष्पक्षता,राजनीतिक सहिष्णुता और समाज के भीतर लोकतांत्रिक संवाद की नई संस्कृति विकसित करनी होगी। बंगाल की ऐतिहासिक बौद्धिक परंपरा तभी सार्थक होगी,जब इस राज्य में असहमति को दुश्मनी नहीं,लोकतंत्र की स्वाभाविक शक्ति माना जाए। बहरहाल शुभेंदु अधिकारी से सबसे बड़ी उम्मीद यही हो सकती है कि बंगाल अपनी पुरानी हिंसक राजनीतिक विरासत से बाहर निकले और ऐसा राज्य बने जहां सत्ता परिवर्तन के साथ प्रतिशोध नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन दिखाई दे।
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विपक्ष के लिए कैसे कब्रगाह बन गया बंगाल
- by brahmadeep alune
- May 12, 2026
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